Month: अप्रैल 2018

जिंदगी में फरियाद।

मेरा दर्द याद रहे न रहे मेरे आहों को बस याद रखना।
टूट चुकी थी जैसे मैं खुद को बचाने की कोशिश में।
सैलाब उमड़े थे कितने इन आँखों में बस इन आँखों की फरियाद याद रखना।
टूट चुकी थी फिर भी झुकी नहीं बर्बाद होकर भी तेरे सामने।
फरियाद जिससे की है उसकी कहर जब बरसेगी तो मेरा चेहरा याद रखना।
रजनी अजीत सिंह 30.4.18
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जिंदगी में मासूम की आहें।

मौन हो मासूम की जिंदगी बर्बाद कर होगे जिंदा अपनी नजर में तुम।
मगर मेरी नजरों में जमीर के बिना मरे हुए के समान हो तुम।
लाख कोशिश कर लो खुश होने की पर कभी चैन से नहीं जी पाओगे तुम।
अपने किये कर्मो की सजा से कभी भाग न पाओगे तुम।
उठते – बैठते, जागते – सोते तेरे आँखों में नींद की जगह बेचैनी का आलम होगा कभी चैन से सो ना पाओगे तुम।
उस मासूम की आहें पीछा न छोड़ेगी मौत से बत्तर जिंदगी होगी जिसे चाहकर भी भुला न पाओगे तुम।
रजनी अजीत सिंह 30.4.18
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जिंदगी में प्यार ताकत है।

प्यार तो ताकत है प्यार कीजिए
पर स्वार्थी प्यार से बच के रहिये।
सबसे मिलिये जुलिये प्यार से
पर धोखेबाजों से बच के रहिये।
कत्ल होते देखा है दिल और मुहब्बत का
छिन न ले दुनिया की हर खुशी तेरे जिंदगी से
मुहब्बत के इन सौदागरों से बच के रहिये।
रजनी अजीत सिंह 29.4.18
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जिंदगी में हौसला।

आयेंगे जितने तुफान जिंदगी में हौसला उतना बुलंद होगा।
नेकी कर भूल जाना मेरी आदत है
मगर गुनहगारों को भूले से भी न बख्शा ये भी मेरे आदत में शामिल है।
रजनी अजीत सिंह 28.4.18
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जिंदगी में “रात”

अभी तो हमने जिंदगी को जीने सीखा है।
अभी तो हमने सपनों के साथ अपनों के बीच रहना सीखा है।
शब्दों के साथ उन्मुक्त गगन में उड़ान भरने दे मुझे।
उतर आऊंगी तेरे बीच तेरे सांसो में बसकर
तू सिद्त से आवाज तो दे।
अभी इस” रात” का अंधकार देखा कहाँ है तूफानों में।
चाँदनी “रात” हूँ चाँदनी रात बना रहने दे मुझे।
रजनी अजीत सिंह 28.4.18

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जिंदगी में सांसे थम जाती हैं।

थम जाती है सांसे मेरी धड़कन बढ़ जाती है।
तू कुछ कहे ना कहे सबसे मगर शब्द तेरे दर्दे दिल का हाल ब्यां कर जाती है।
नाजो से पाला है तुझे तेरे आँखों का दर्द कलेजा छलनी कर जाती है।
रजनी अजीत सिंह 28.4.18
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जिंदगी में भाषा का महत्व।

भाषा की परिभाषा करना बहुत ही कठिन है फिर भी कुछ परिभाषा से हम बताते हैं भाषा है क्या?
महाभाष्य का पतंजलि के अनुसार “जो वर्णो द्वारा व्यक्त होती है उसे भाषा कहते हैं।”
इनसाइक्लोपीडिया बिट्रैनिका ने बताया है “ध्वन्यात्मक प्रतीकों की उस ऐच्छिक व्यवस्था को भाषा कहते हैं जिसके माध्यम से एक समाज समूह के के सदस्य रूप में तथा सम्बद्ध संस्कृति के भागीदार के के नाते मनुष्य परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।”
कोई भी भाषा एक निश्चित मानव समाज में बोली जाती है।
भाषा की एक निश्चित व्यवस्था होती है।
भाषा पैतृक सम्पत्ति नहीं होती है।
मनुष्य भाषा का अर्जन करता है।
भाषा अनुकरण द्वारा सीखी जाती है।
भाषा परम्परागत होती है।
भाषा परिवर्तन शील होती है।
इसकी निश्चित भौगोलिक तथा ऐतिहासिक सीमा होती है।
भाषा के व्याकर्णिक सघटना में अन्तर होता है।
ये संयोगा अवस्था से वियोगा अवस्था की ओर बढ़ती है।
बोली और भाषा में अन्तर स्पष्ट करना मुश्किल है।
कोई भी बोली भाषा से उत्पन्न होती है इसलिए हम इसे माँ बेटी का सम्बन्ध होता है ऐसा कह सकते हैं। भाषा चीर परिवर्तनशील है।
जब हम भाषा और लिपि पर विचार करते हैं तो भाषा अपने मूल रूप में ध्वनि पर अधारित है।
रजनी अजीत सिंह
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जिंदगी में कुछ सत्य से वाकिफ होना जरूरी है।

जिनको तज़ुर्बा है उनके लिये सहानुभूति
जिनको नही है उनके लिए जल्दी की उम्मीद है
जो कुवारे है उनके लिए समानुभूति
कृप्या दिल पर ना ले
और दिमाग़ ☺☺☺☺☺
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जिंदगी में हमसफर

शुभप्रभात।

जीवन का सारा मज़ा सफ़र में है मगर एक अच्छे हमसफ़र के साथ।

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सफर आसान हो जाता अगर तुम साथ होते।
जब थक जाते चलते चलते तो एक दूसरे को देखने से थकान मीट जाता।
कुछ तुम कहते कुछ हम कहते कुछ तुम सुनाते कुछ तुम सुनते रास्ते का सफर कट जाता।
यूं ही चलते चलते साथ हम हमसफर बन जाते।
और जिंदगी जीने के सफर में हमसफर के साथ होने से जिंदगी कुछ खास बन जाता।
और कभी न मिटने वाली यादगार लम्हे जो याद करने मात्र से सकूंन दे वो अमिट छाप बन जाता।
रजनी अजीत सिंह 21.4.18

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जिंदगी में एक बेटे और माँ की ममता की कहानी।

एक माँ थी जिसके दो बेटे हैं। वो माँ एक दिन अपने छोटे बेटे को दूध रोटी खिला रही थी तो ऐसे ही स्वभाव बस माँ ने बेटे से पूछा बेटा तुम किससे प्यार करते हो तो उसने जवाब में कहा मैं जाइलो से प्यार करता हूँ, फिर दोबारा पूछा तो बेटा बोला कार्पियो (स्कार्पियो) से प्यार करता है और तीसरी बार विशु बोला पापा गाड़ी से प्यार करता है चौथी बार बोला नाना गाड़ी से प्यार करता हूँ फिर कुछ देर बाद बोला नाना गाड़ी से नहीं पापा गाड़ी से प्यार करता हूँ। आप को बता दूँ इस बच्चे का उम्र मात्र दो साल 10 महीने का था। इस बच्चे का जन्म 20 अप्रैल 2007में हुआ था। इस छोटी सी उम्र में गाड़ी से इतना लगाव था कि सड़क पर जाती गाड़ियों को कुछ को छोड़कर सभी गाड़ियों के नाम बता देता था।

फिर दोबारा माँ ने अपने बेटे से पूछा विशु क्या लेने जाएगा? तो बेटा बोला विशु साइकिल लेने जाएगा।

उसी दिन माँ बाहर जब बेटा खेलने गया था संयोग बस विशु को देखने बाहर गई तो विशु ( सामने के मकान में एक लड़की रहती थी जो फस्ट में पढ़ती थी जिसका नाम प्रियल था।) आयुषी के साइकिल के बराबर में खड़ा कर दीदी दीदी चिला रहा था तभी वो लड़की प्रियल अपनी साइकिल लेने आ गई। विशु के माँ ने उत्सुकता बस देखने के लिए कि बेटा विशु दो पहिए वाली छोटी साइकिल चला पा रहा है कि नहीं उसकी माँ ने उस लड़की से साइकिल मांगी। वे दे नहीं रही थी फिर भी उसकी माँ ने विशु को बैठाया तो विशु दो पहिया की छोटी साइकिल चला लिया। फिर उस लड़की ने अपनी साइकिल ले ली और विशु उदास मन से अपने तीन पहिया के स्कूटर वाली साइकिल से ही धक्का दे दे चलाने लगा।

अभी अपने बेटे के उदास चेहरे को देखकर माँ कुछ सोच ही रही थी कि बगल में मामी और दीदी मेरे बगल के मकान से आ रही थी तो मामी ने विशु के माँ से कहा बेचारे का पैर दर्द करने लगता होगा इसको दूसरी साइकिल दिला देती। विशु की माँ ने बुझे मन से कहा हां दो चार दिन में दिला दुंगी।

विशु के पापा की छोटी सी दवा की कम्पनी है।

अब इधर दिवाली का खर्चा, बड़े बेटे का जाड़े के स्कूल का कपड़ा, स्कूल के पार्टिसिपेट की फीस आदि अनेकों खर्चे थे जिसके कारण वह माँ अपने पति से संकोच बस खुलकर कुछ कह नहीं पा रही थी। फिर भी माँ की अनतर्रातमा पता नहीं क्यों बेचैन हो गया और एक विवश माँ से रहा नहीं गया और अपने पति को फोन लगा दिया। और जिस बात से पत्नी डर कर कह नहीं पा रही थी वही हुआ और पति ने कहा तुम हर चीज के लिए भावुकता में आ जाती हो अगले हफ्ते दिला दुंगा। लेकिन मेरा भावुक मन एक दिन भी इन्तजार कर सका क्योंकि अगले दिन बृहस्पति वार था शायद शनि वार और बृहस्पति वार को लोहा नहीं खरीदा जाता है। विशु की माँ आज भी नहीं जानती कि भावुकता का मतलब सही है या गलत पर उसकी माँ वाकई में भावनाओं में बह जाती है ये तो वो भी अच्छी तरह जानती थी।

अब विशु की माँ का मन विशु के मुंह से निकली बोली की विशु साइकिल लेने जाएगा + मामी की बात +उससको उसकी साइकिल को चलाना आदि बातों ने एक माँ को भावना में बहकने पर मजबूर कर दिया और उसकी माँ ने ठान ली की साइकिल दिलाऊंगी। फिर माँ ने अपने बड़े बेटे से कहा चलो बेटा अपना पिटारी खोलती हूँ देखूं कितना रुपये हैं। अब बड़ा बेटा बोला मेरा मेला देखने के लिए जो पैसा मिला था वो पैसा विशु के साइकिल में लगा दो। और बड़े बेटे को बाक्स लेना था तो माँ बोली तुम्हारा बाक्स तो बड़ा बेटा बोला बाद में ले लेंगे। और उसे याद नहीं था कि उसका पैसा तो मूवी देखने में खत्म हो गया था। जब माँ ने याद दिलाया तो बोला आह! काश! मूवी न देखा होता तो मैं वो पैसा विशु के साइकिल खरीदने के लिए दे पाता।

उन दोनों का आपस में प्यार देख माँ अपनी देवी माँ से प्रार्थना की कि हे माँ बचपन का यही प्यार बड़े होने पर भी कायम रहे जो दुनिया में मिशाल बन सामने आये। एक माँ का सपना ये सपना देवी माँ जरूर पूरा करेगी ऐसा एक माँ का अपनी देवी माँ पर विश्वास था आगे देवी माँ की जो मर्जी।

फिर अन्ततःकुछ पैसा माँ का और कुछ पैसा विशु के पापा का मिलाकर उसी दिन माँ ने साइकिल खरीद दिया। उस माँ को आज बहुत ही खुशी हुई कि विशु अनजाने में भी जो बोला उस लाचार माँ ने पूरा किया। या यूं कहें कि माँ की इच्छा उसकी देवी की सहायता और आशीर्वाद से अपने बच्चे को को साइकिल दिला दी।

उसकी माँ ने अपनी देवी माँ से कहा हे माँ मेरी विनती है आपसे यदि मैं जिंदा हूँ तो तुम्हारा हाथ सदा सिर पर है जो कभी भी इस माँ का काम न रुकने दिया न कमी खलने दी। यदि मैं न भी रहूँ इस दुनिया में तो मेरे बच्चों और मेरे पति पर हमेंशा अपना हाथ उनके सर पर रखना। और उन पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखना। उस विशु की माँ लिखने बैठी थी साइकिल दिलाने का डेट और इतना कुछ लिख बैठी।

अन्त में ये माँ अपने बच्चों और पति से यह कहना चाह रही थी कि इस कलिकाल में भी सच्ची आस्था हो तो चाहे वह माँ हो या देवी माँ जरूर पूरा करती है। और देवी माँ सच्ची आस्था के लिए पूर्ण रूप से विश्वास होना जरूरी है। इस विश्वास की बड़ी कठिन परीक्षा होती है। जो इस विश्वास को बनाए रखता है वही देवी माँ का कृपा पात्र बनता है।

उस माँ को यह नहीं पता कि उसके बच्चे कैसे होंगे लेकिन ये जरूर पता था कि उसके पति का विश्वास बहुत जल्दी डगमगाने लगता है। पर ये माँ हमेशा यही सोचती है कि उसकी देवी माँ जो भी करेगी भले के लिए ही करेगी क्योंकि वह अन्तर्यामी है इस विश्वास के साथ हर सुख दुःख सह लेती है कि इसमें भी भलाई होगा। और अन्ततःउस माँ को देवी माँ विश्वास का फल अच्छा ही मिलता है।

विशु की माँ को डायरी लिखना बहुत ही अच्छा लगता था। अब माँ को लिखते लिखते रात के 12बजकर 30 मिनट हो गए थे इसलिए इस माँ ने लेखनी को विश्राम दे दिया और कहानी खत्म कर देवी माँ का स्मरण कर सोने चली गई।
इस कहानी के समाप्ति के साथ उस छोटे बेटे को जन्म दिन की बधाई हो। देवी माँ की कृपा हमेशा आजीवन बनी रहे यही आशिर्वाद है मेरा।
रजनी अजीत सिंह 20.4.18
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