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      शक्ति – तत्व 

नवरात्रि के विशेष अवसर पर शक्ति तत्व का वर्णन करती हूँ। 

शक्ति से सृष्टि, शक्ति ही प्राण, 

शक्ति से धर्म – कर्म कल्याण। 

शक्ति से भक्ति, शक्ति से ज्ञान, 

शक्ति ही सत्य सिंधु भगवान्।। 

शक्ति ही नभ सागर – संसार, 

शक्ति अग-जग, जप-तप आधार।  

शक्ति से ब्रह्मा – विष्णु – महेश, 

शक्ति ही धरा धरे सिर शेष।। 

शक्ति ही सौर्यशक्ति ही सूर, 

शक्ति ही करती है भय दूर। 

शक्ति ही शंकर के कर का शूल, 

शक्ति जननी जीवन – सुख – मूल।। 

शक्ति हरि हाथ सुदर्शन – चक्र, 

शक्ति से शासन करते शक़। 

शक्ति ही रमा – उमा का रूप, 

महामाया योगिनी अनूप।। 

महालक्ष्मी, भैरवी, विशाल, 

शक्ति ही प्रलय – भयंकर काल। 

शक्ति है चाँद सूर्य की ज्योति, 

शक्ति सागर सरिता जल रेति।। 

शक्ति ही वायु – अन्न – जल-वस्त्र, 

शक्ति ही सुधा, हलाहल अस्त्र। 

शक्ति में जीवन का अमरत्व, 

शक्ति में छुपा शक्ति का तत्व ।। 

          

         

काशी के घाटों का वर्णन। 

घाटों की महिमा

शिव नगरी काशी के गंगा घाटों की महिमा न्यारी है, प्राचीन नगर काशी पूरे विश्व में सबसे पवित्र शहर है, धर्म एवं संस्कृति का केन्द्र बिन्दु है। असि से आदिकेशव तक घाट श्रृंखला में हर घाट के अलग ठाठ हैं, कहीं शिव गंगा में समाये हुये हैं तो किसी घाट की सीढ़ियां शास्त्रीय विधान में निर्मित हैं, कोई मन्दिर विशिष्ट स्थापत्य शैली में है तो किसी घाट की पहचान वहां स्थित महलों से है, किसी घाट पर मस्जिद है तो कई घाट मौज-मस्ती का केन्द्र हैं। ये घाट काशी के अमूल्य रत्न हैं, जिन्हें किसी जौहरी की आवश्यकता नहीं। गंगा केवल काशी में ही उत्तरवाहिनी हैं तथा शिव के त्रिशूल पर बसे काशी के लगभग सभी घाटों पर शिव स्वयं विराजमान हैं। विभिन्न शुभ अवसरों पर गंगापूजा के लिए इन घाटों को ही साक्षी बनाया जाता है। विभिन्न विख्यात संत महात्माओं ने इन्हीं घाटों पर आश्रय लिया जिनमें तुलसीदासरामानन्दरविदासतैलंग स्वामी, कुमारस्वामी प्रमुख हैं। विभिन्न राजाओं-महाराजाओं ने इन्हीं गंगा घाटों पर अपने महलों का निर्माण कराया एवं निवास किया। इन घाटों पर सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति का समन्वय जीवन्त रूप में विद्यमान है। घाटों ने काशी की एक अलग छवि को जगजाहिर किया है; यहां होने वाले धार्मिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गंगा आरती, गंगा महोत्सव, देवदीपावली, नाग नथैया (कृष्ण लीला), बुढ़वा मंगल विश्वविख्यात है। काशी वासियों के लिये गंगा के घाट धार्मिक-आध्यात्मिक महत्व के साथ ही पर्यटन, मौज-मस्ती के दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। घाट पर स्नान के पश्चात भांग-बूटी के मस्ती में डूबे साधु-सन्न्यासियों एवं यहां के निवासियों ने बनारसी-मस्ती के अद्भुत छवि का निर्माण किया है, जिसके अलग अंदाज़ को सम्पूर्ण विश्व देखना, समझना एवं जीना चाहता है।[1]

चौरासी (84) घाट

वाराणसी में लगभग 84 घाट हैं। ये घाट लगभग 4 मील लम्‍बे तट पर बने हुए हैं। इन 84 घाटों में पाँच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्‍हें सामूहिक रूप से ‘पंचतीर्थ’ कहा जाता है। ये हैं असी घाटदशाश्वमेध घाटआदिकेशव घाटपंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिका घाट। असी घाट सबसे दक्षिण में स्थित है जबकि आदिकेशव घाट सबसे उत्तर में स्थित हैं। हर घाट की अपनी अलग-अलग कहानी है। वाराणसी के कई घाट मराठा साम्राज्य के अधीनस्थ काल में बनवाये गए थे। वाराणसी के संरक्षकों में मराठा, शिंदे (सिंधिया), होल्करभोंसले और पेशवा परिवार रहे हैं। वाराणसी में अधिकतर घाट स्नान-घाट हैं, कुछ घाट अन्त्येष्टि घाट हैं। महानिर्वाणी घाट में महात्‍मा बुद्ध ने स्‍नान किया था। कुछ घाट जैसे मणिकर्णिका घाट किसी कथा आदि से जुड़े हुए हैं, जबकि कुछ घाट निजी स्वामित्व के भी हैं पूर्व काशी नरेश का शिवाला घाट और काली घाट निजी संपदा हैं। वाराणसी में असी घाट से लेकर वरुणा घाट तक सभी की क्रमवार सूची निम्न है:-

वाराणसी के घाट
घाट का नाम निर्माता
नवला घाट नगर निगम
असी घाट महाराजा, बनारस
लाला मिश्र घाट महाराजा रीवां
तुलसी घाट महंत स्वामीनाथ
भदैनी घाट नगर निगम
जानकी घाट अशर्फी सिंह
अक्रूर घाट राय शिव प्रसाद
माता आनंदमयी घाट लाला बच्छराज
बच्छराज घाट बाबू शेखर चंद
जैन घाट नगर निगम
निषाद राज घाट नगर निगम
प्रभुघाट निर्मल कुमार
शिवाला घाट पं. बैजनाथ मिश्र
चेतसिंह घाट पंचकोट के राजा
निरंजनी घाट पंचकोट के राजा
दंडी घाट लल्लू जी अग्रवाल
गुलरिया घाट लल्लू जी अग्रवाल
हनुमान घाट महंत हरिहर जी
मैसूर घाट मैसूर राज्य
हरिश्चंद नगर निगम
लल्ली घाट महाराजा बनारस
विजयनगरम घाट महाराजा विजयनगरम
केदार घाट कुमार स्वामी
चौकी घाट नगर निगम
नरवा घाट नगर निगम
सोमेश्वर घाट कुमार स्वामी
मानसरोवर घाट नगर निगम
राजा घाट माधोराव पेशवा
नारद घाट दत्तात्रेय स्वामी
घाट का नाम निर्माता
खोरी घाट कवीन्द्र नारायण सिंह
गंगामहल घाट मथुरा पांडे
पांडे घाट बबुआ पांडे
धोबिया घाट कुमार स्वामी
दिग्पतिया घाट दिग्पतिया स्टेट (बंगाल)
चौसट्ठी घाट उदयपुर के राजा
राणा घाट उदयपुर के राजा
मुंशी घाट श्रीधर मुंशी
दरभंगा घाट महाराजा, दरभंगा
अहिल्याबाई घाट महाराजा, इंदौर
शीतला घाट नगर निगम
दशाश्वमेध घाट नगर निगम
प्रयाग घाट रानी हेमन्द कुमारी देवी
घोड़ा घाट नगर निगम
राजेंद्र प्रसाद घाट नगर निगम
मान मंदिर घाट महाराजा, जयपुर
त्रिपुरा भैरवी घाट महाराजा, बनारस
मीर घाट मीर रुस्तम अली
फूटा घाट स्वामी, महेश्वरानंद
नेपाली घाट नानही बाबू
ललिता घाट नेपाल नरेश
अमरोहागिरी बावली (घाट) बाबू केशव दास
जलसाई घाट नगर निगम
खिरकी घाट महाराजा, इंदौर
मणिकार्णिका घाट महाराजा, इंदौर
बाजीराव घाट महाराजा, इंदौर
सिंधिंया घाट महाराजा, ग्वालियर
संकटा घाट महाराज बड़ौदा
घाट का नाम निर्माता
संकटा घाट, गंगामहल महाराजा ग्वालियर
भोंसला घाट महाराजा नागपुर
नया घाट नगर निगम
गणेश घाट माधोराव पेशवा
अग्निश्वर घाट माधोराव पेशवा
मेहता घाट माधोराव पेशवा
रामघाट माधोराव पेशवा
बाभाजी या मंगलागौरी घाट माधोराव पेशवा
पंचगंगा घाट नगर निगम
बेनीमाधव घाट नगर निगम
दुर्गाघाट नारायण दीक्षित
ब्रह्मघाट नारायण दीक्षित
शीतला घाट महाराजा, बूँदी
लाल घाट नगर निगम
गायघाट नगर निगम
बालाबाई घाट नगर निगम
त्रिलोचन घाट नारायण दीक्षित
गोला घाट नगर निगम
नंदू घाट नगर निगम
पक्का घाट नगर निगम
तेलियानाला घाट नगर निगम
नया घाट नगर निगम
प्रह्लाद घाट नगर निगम
राजघाट नगर निगम
वरुणा संगम घाट नगर निगम

प्रमुख घाट

वाराणसी में कुछ प्रसिद्ध घाट हैं। इनमें कुछ घाटों का धार्मिक व अध्यात्मिक महत्त्व है और कुछ घाट अपनी प्राचीनता तो कुछ ऐतिहासिकता व कुछ कला के लिहाज़ से ख़ासियत रखते हैं।[2]

असीघाट

  • असीघाट वाराणसी के दक्षिणी छोर पर गंगा व असि नदी के संगम पर स्थित है।
  • यह घाट श्रद्धालुओं की आस्था व आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है।
  • यहीं पर भगवान जगन्नाथ का प्रसिद्ध मंदिर है।

तुलसी घाट

  • तुलसीघाट प्रसिद्ध कवि तुलसीदास से संबंधित है।
  • यहाँ गोस्वामी तुलसी दास ने श्रीरामचरित मानस के कई अंशों की रचना की थी।
  • कहा जाता है कि तुलसीदास ने अपना आख़िरी समय यहीं व्‍यतीत किया था।
  • इस घाट का नाम पहले ‘लोलार्क घाट’ था।

हरिश्चंद्र घाट

  • हरिश्‍चंद्र घाट का संबंध राजा हरिश्चंद्र से है।
  • सत्यप्रिय राजा हरिश्चंद्र के नाम पर यह घाट वाराणसी के प्राचीनतम घाटों में एक है।
  • इस घाट पर हिन्दू मरणोपरांत दाह संस्कार करते हैं।

केदार घाट

  • केदार घाट का नाम केदारेश्वर महादेव मंदिर के नाम पर पड़ा है।
  • इस घाट के समीप में ही स्वामी करपात्री आश्रम व गौरी कुंड स्थित है।

दशाश्वमेध घाट

  • यह घाट गोदौलिया से गंगा जाने वाले मार्ग के अंतिम छोर पर पड़ता है।
  • प्राचीन ग्रंथो के मुताबिक राजा दिवोदास द्वारा यहाँ दस अश्वमेध यज्ञ कराने के कारण इसका नाम ‘दशाश्वमेध घाट’ पड़ा।
  • एक अन्य मत के अनुसार नागवंशीय राजा वीरसेन ने चक्रवर्ती बनने की आकांक्षा में इस स्थान पर दस बार अश्वमेध कराया था।[2]

राजेन्द्र घाट

मणिकर्णिका घाट

  • पौराणिक मान्यताओं से जुड़े मणिकर्णिका घाट का धर्मप्राण जनता में मरणोपरांत अंतिम संस्कार के लिहाज़ से अत्यधिक महत्त्व है।
  • इस घाट की गणना काशी के पंचतीर्थो में की जाती है।
  • मणिकर्णिका घाट पर स्थित भवनों का निर्माण पेशवा बाजीराव तथा अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था।

चेत सिंह घाट

बनारस वाराणसी के घाट

बनारस (वाराणसी) हमेशा प्राचीन भारत में धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व के लिए जाना जाता आया है। यह शहर गंगा नदी के तट पर है। गंगा के तट पर नदी तक पोहोचने के लिए कुछ सीढ़िया है। इन्हे घाट कहते है। इस शहर में ८७ घात है। इन घाटो का उपयोग पूजा अर्चना,धार्मिक अनुष्ठानों और यहां तक ​​कि अंतिम संस्कार के अनुष्ठानों के लिए किये जाते है। लोग अक्सर इन घाटो पर नौका यात्रा करते है। यह नौकाएं दशाश्वमेध घाट से हरिश्चंद्र घाट तक ले जाती है। क्युकी यहाँ पानी का स्टार काम है , इन घाटो की चलते हुए भी यात्रा की जा सकती है।

बनारस के सभी घाटो की सूची निम्नलिखित है –

• माता आनंदमई घाट
• अस्सी घाट
• अहिल्या घाट
• आदि केशव घाट
• अहिल्याबाई घाट
• बद्री नारायण घाट
• बाजीराव घाट
• बाउली / उमराओगिरी / अमरोहा घाट
• भंडाइनी घाट
• भोसले घाट
• ब्रह्मा घाट
• बूंदी परकोटा घाट

चौसट्ठी घाट
• चेत सिंह घाट
• दांडी घाट
• दरभंगा घाट
• दशाश्वमेध घाट
• दिग्पतिआ घाट
• दुर्गा घाट
• गंगा महल घाट (मैं)
• गंगा महल घाट (द्वितीय)
• गाय घाट
• गौरी शंकर घाट
• गणेशा घाट
• गोला घाट
• गुलारिआ घाट
• हनुमान घाट
• हनुमानगरधि घाट
• हरीश चंद्र घाट
• जैन घाट
• जलसई घाट
• जानकी घाट
• जतारा घाट
• कर्नाटक राज्य घाट
• केदार घाट
• खिरकिया घाट
• श्री गुरु रविदास घाट
• खोरी घाट
• लाला घाट
• लाली घाट
• ललिता घाट
• महानिर्वाणी घाट


मानसरोवर घाट
• मंगला गौरी घाट
• मणिकर्णिका घाट
• मेहता घाट
• मीर घाट
• मुंशी घाट
• नंदेश्वर घाट
• नारद घाट
• नया घाट
• नेपाली घाट
• निरंजनी घाट
• निषाद घाट
• पुराना हनुमाना घाट
• पंचगंगा घाट
• पंचकोटा
• पांडे घाट
• फूटा घाट
• प्रभु घाट
• प्रह्लाद घाट
• प्रयाग घाट
• राजघाट पेशवा अमृतराओ द्वारा बनाया गया
• राजा घाट / दुफ्फरीन पुल / मालवीय पुल
• राजा ग्वालियर घाट
• राजेंद्र प्रसाद घाट
• राम घाट
• राणा महला घाट
• रेवन घाट
• सक्का घाट
• संकठा घाट
• सर्वेश्वर घाट
• सिंधिया घाट
• शिवाला घाट
• शीतला देवी घाट
• शीतला घाट
• सामने घाट
• सोमेश्वर घाट
• टेलिनाला घाट
• त्रिलोचन घाट
• त्रिपुरा भैरवी घाट
• तुलसी घाट
• वच्छराज घाट
• वेणीमाधव घाट
• विजयनगरम घाट
 


इन घाटो का निर्माण १७ वि सदी में किया गया। इन घाटों में से अधिकांश मराठों , सिंधिया , होलकर और पेशवा के शासनकाल के दौरान बनाया गया है। यह परिवारों अभी भी कुछ घाटो के संरक्षक हैं। कुछ घाट निजी स्वामित्व में हैं ।

ज्यादातर घाटो का प्रयोग आध्यात्मिक और धार्मिक ज्ञान के लिए किया जाता है। परन्तु ये घाट बेहद लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण हैं। फोटोग्राफरों की भीड़ से सारी दुनिया में इस जगह पर आती है। तीर्थयात्रि और योगि सूर्योदय के दौरान उनकी सुबह पूजा प्रदर्शन करने के लिए यहां आते हैं। सूर्यास्त में एक महा आरती (नदी पूजा) की जाती है। यह महा आरती दशाश्वमेध घाट पर की जाती है।

गंगा आरती

 मणिकर्णिका घाट दशाश्वमेध घाट सारनाथ में तिब्बती मंदिर

नीचे दिए गए सूची में हम बनारस के प्रसिद्ध घाटों पर नजर डालते हैं :-

दशाश्वमेध घाट – इस घाट को इस शहर में सबसे प्रसिद्ध घाट कहना है कि गलत नहीं होगा । यह सबसे पुराना घाट माना जाता है और गंगा आरती इसी जगह की जाती है।

मणिकर्णिका घाट – इस घाट पर दाह संस्कार के आयोजित होते हैं। क्योंकियह घाट भी बर्निंग घाट (ज्वलंत) के रूप में जाना जाता है। यह इस घाट पर आग लगातार 2500 वर्ष के बाद से जल रही है यह माना जाता है ।

हरीश चंद्र घाट – यह घाट राजा हरीश चंद्र के नाम पर है। राजा हरसिंहचन्द्र ने हमेशा सच बोलने का संकल्प लिया। लोगो का मानना है की जिन भक्तों यहाँ अंतिम संस्कार किया जाता है, वह मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करते है । इस घाट को “आदि मणिकर्णिका” के रूप में जाना जाता है।

अस्सी घाट – यह घाट अस्सी नदी और गंगा नदी के मिलाप पर है / यह घाट दूर दक्षिण कोने पर है। यहाँ एक शिवलिंग है जो एक पीपल वृक्ष के नीचे है। यहाँ लोगों को भगवान शिव की पूजा में देखा जाता है।

तुलसी घाट – यह घाट प्रसिद्ध कवि और संत तुलसीदास के नाम पर है। कार्तिक (अक्टूबर-नवम्बर) के हिंदू महीने में, एक कृष्ण पूजा समारोह यहां आयोजित किया जाता है।

चेट सिंह घाट – यह स्थान महाराजा चेट सिंह १८ वीं सदी में अंग्रेजों से लड़ाई की जगह है।

दरभंगा घाट – महान वास्तुकला का एक आदर्श उदाहरण दरभंगा घाट है जो बिहार के शाही परिवार द्वारा 1990 के दशक में बनाया गया एक महल है है। यह बिहार के तत्कालीन वित्त मंत्री नारायण मुंशी द्वारा 1912 में पुनः बनाया गया था।

मैन मंदिर घाट – जयपुर के महाराजा मान सिंह ने १६०० में इस घाट का निर्माण किया। इस घाट पर पूर्ण राजपूत वास्तुकला से बना एक महल है। सवाई जयसिंह द्वितीय ने १७३० में यहाँ एक खगोल विज्ञान वेधशाला बनायीं थी ।

सिंधिया घाट – यह घाट जलती मणिकर्णिका घाट के पास है, परन्तु यह एक शांत जगह है। यह सिंधिया (शिंदे) के परिवार संरक्षण में है। यहां सबसे बड़ा आकर्षण आंशिक रूप से पानी में डूबा एक शिव मंदिर है।

भोसले घाट – यह घाट मराठा शैली का विशिष्ट नमूना है। यहाँ एक भव्य पत्थर के घरों के निर्माण मराठो के काल में किया गया।

दत्तात्रेय घाट – यह घाट दत्तात्रेय नाम के एक ब्राह्मण संत के पदचिह्न के कारण जाना जाता है। इस घाट के पास संत को अर्पित एक छोटा सा मंदिर है।

पंचगंगा घाट – यह जगह है, जहां पांच नदियों गंगा, यमुना, सरस्वती, किराना, और धूतपाप का मिलाप है। यह जगह औरंगजेब ने बनवाये आलमगीर मस्जिद के लिए जाना जाता है।

राजघाट – इस घाट को आदि केशव घाट के रूप में जाना जाता है क्युकी यहाँ आदि केशव विष्णु मंदिर है। यह माना जाता है की श्री विष्णु ने पहले बनारस में यहां अपने कदम डाले।

इन घाटो के अलावा यहाँ केदार घाट, मानसरोवर घाट, मीर घाट , ललिता घाट आदि जैसे अन्य प्रसिद्ध घाट भी है। आगंतुकों और श्रद्धालुओं को इन घाटों का दौरा करने और उनकी सुंदरता , अद्भुत माहौल , रोशनी और रंगीन भीड़ अनुभव करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है । आत्मा की खोज या आध्यात्मिकता या भी शौकिया फोटोग्राफि में रुचि रखने वाले लोगों के लिए बनारस घाट का दौरा आवश्यक है। बनारस घाट हर किसी के लिए कुछ करने की पेश करता है। 

काशी के विभिन्न घाटों का इतिहास बहुत पुराना और रोचक है। उम्मीद करती हूं ये ज्ञान आप को अच्छा लगा होगा। 

रजनी अजीत सिंह 

चेत सिंह घाट, वाराणसी

  • चेत सिंह घाट एक क़िले की तरह लगता है।
  • चेत सिंह बनारस के एक साहसी राजा थे जिन्‍होंने 1781 ई. में वॉरेन हेस्टिंगस की सेना के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी।

पंचगंगा घाट

राजघाट

  • राजघाट काशी रेलवे स्टेशन से सटे मालवीय सेतु (डफरिन पुल) के पा‌र्श्व में स्थित है।
  • यहां संत रविदास का भव्य मंदिर भी है।

आदिकेशव घाट

  • आदिकेशव घाट वरुणा व गंगा के संगम पर स्थित है।
  • यहाँ संगमेश्वर व ब्रह्मेश्वर मंदिर दर्शनीय हैं।
  • इसके अलावा गायघाट, लालघाट, सिंधिया घाट आदि काशी के सौंदर्य को उद्भाषित करते हैं।[2]


वाराणसी के घाट की चित्र वीथिका


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमि


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऊपर जायें प्राचीन घाट (हिंदी) काशी कथा। अभिगमन तिथि: 10 जनवरी, 2013।
  2. ↑ इस तक ऊपर जायें:2.0 2.1 2.2 वाराणसी के घाट(हिन्दी) जागरण यात्रा। अभिगमन तिथि: 17 फ़रवरी2011

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काशी विश्वनाथ मन्दिर, 1915

नाम:

श्री काशी विश्वनाथ, विश्वेश्वर

निर्माता:

महारानी अहिल्या बाई होल्कर

निर्माण
काल :

देवता:

शिव

वास्तु
कला:

हिन्दू वास्तुकला

स्थान:

वाराणसीउत्तर काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर पिछले कई हजारों वर्षों से वाराणसी में स्थित है। काशी विश्‍वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्‍ट स्‍थान है। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्‍नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्यसन्त एकनाथरामकृष्ण परमहंस, स्‍वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्‍वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ हैं। यहिपर सन्त एकनाथजीने वारकरी सम्प्रदायका महान ग्रन्थ श्रीएकनाथी भागवत लिखकर पुरा किया और काशिनरेश तथा विद्वतजनोद्वारा उस ग्रन्थ कि हाथी पर से शोभायात्रा खुब धुमधामसे निकाली गयी।महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभा यात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है। [1]

निर्माण

वर्तमान मंदिर का निर्माण महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा सन 1780 में करवाया गया था।[2]. बाद में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा 1853 में 1000 कि.ग्रा शुद्ध सोने द्वारा बनवाया गया था।[3].

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हिन्दू धर्म में कहते हैं कि प्रलयकाल में भी इसका लोप नहीं होता। उस समय भगवान शंकर इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आने पर इसे नीचे उतार देते हैं। यही नहीं, आदि सृष्टि स्थली भी यहीं भूमि बतलायी जाती है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने का कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होने सारे की रचना की। अगस्त्य मुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थी और इन्हीं की अर्चना से श्रीवशिष्ठजी तीनों लोकों में पुजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाये।

महिमा

सर्वतीर्थमयी एवं सर्वसंतापहारिणी मोक्षदायिनी काशी की महिमा ऐसी है कि यहां प्राणत्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। भगवान भोलानाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवगमन से छुट जाता है, चाहे मृत-प्राणी कोई भी क्यों न हो। मतस्यपुराण का मत है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवंम दुखों परिपीड़ित जनों के लिये काशीपुरी ही एकमात्र गति है। विश्वेश्वर के आनंद-कानन में पांच मुख्य तीर्थ हैं:-

  • दशाश्वेमघ,

  • लोलार्ककुण्ड,

  • बिन्दुमाधव,

  • केशव और

  • मणिकर्णिका

और इनहीं से युक्त यह अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। 

कहते हैं देवताओं में सबसे महान देवता ‘महादेव’ हैं जिनका किसी देवता के साथ कोई जोड़ नहीं है. भगवान शंकर जितने गुस्से वाले हैं उतने ही भोले हैं ये तो सब जानते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि भोले नाथ का सबसे प्रिय नगर कौन सा है ? उस नगर का नाम है काशी, जिसे भगवान शिव का सबसे प्रिय नगर कहा जाता है. इस बात को स्पष्ट रूप से कई पुराणों और ग्रंथों में भी किया गया है.

काशी में ही भगवान शिव का प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग, काशी विश्वनाथ स्तिथ है. यहां वाम रूप में स्थापित बाबा विश्वनाथ शक्ति की देवी मां भगवती के साथ में स्थापित है. आज हम आपको काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ी कुछ बातें बताने जा रहे हैं जो शायद आपको नहीं पता हों..

1. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग को दो भागों में बांटा गया है. दाहिने भाग में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजमान हैं. दूसरी ओर भगवान शिव वाम रूप (सुंदर) रूप में विराजमान हैं. इसीलिए काशी को मुक्ति का मार्ग भी कहा जाता है.

2. देवी भगवती के दाहिनी ओर विराजमान होने से मुक्ति का मार्ग केवल काशी में ही खुलता है. यहां इंसान को मुक्ति मिलती है और दोबारा गर्भधारण नहीं करना होता है. भगवान शिव खुद यहां तारक मंत्र देकर लोगों को मुक्त करते हैं. अकाल मृत्यु से मरा मनुष्य बिना शिव अराधना के मुक्ति नहीं पा लेता है.

3. यहां श्रृंगार के समय सारी मूर्तियां पश्चिम मुखी होती हैं. इस ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ में ही विराजते हैं, जो अद्भुत है. ऐसा दुनिया में किसी मंदिर में देखने को नहीं मिलता है.

4. विश्वनाथ दरबार में गर्भ गृह का शिखर है. इसमें ऊपर की ओर गुंबद श्री यंत्र से मंडित है. तांत्रिक सिद्धि के लिए ये सबसे सही जगह माना जाता है. जहां श्री यंत्र-तंत्र साधना को आसानी से पाया जाता है.

5. बाबा विश्वनाथ के दरबार में तंत्र की दृष्टि से चार प्रमुख द्वार शांति द्वार, कला द्वार, प्रतिष्ठा द्वार, निवृत्ति द्वार हैं. इन चारों द्वारों का तंत्र में अलग ही स्थान है. पूरी दुनिया में ऐसा कोई जगह नहीं है जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान होने के साथ तंत्र-मंत्र के द्वार भी हो.

6. बाबा का ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में ईशान कोण में स्थित है. इस कोण का मतलब होता है, सभी तरह की विद्या और हर तरह की कला से भरा पूरा दरबार है. तंत्र की 10 महाविद्याओं का अद्भुत दरबार, जहां भगवान शंकर का नाम ही ईशान है.

7. मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण की तरफ है और बाबा विश्वनाथ का मुख अघोर की तरफ है. इससे मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवेश करता है. इसीलिए सबसे पहले बाबा के अघोर रूप का दर्शन होता है. यहां से अंदर जाते ही सारे पापों का नष्ट होना शुरु हो जाता है.

8. भौगोलिक दृष्टि से बाबा त्रिशूल पर विराजमान हैं, ऐसा माना जाता है. मैदागिन क्षेत्र जहां कभी मंदाकिनी नदी और गौदोलिया क्षेत्र जहां गोदावरी नदी बहती थी. इन दोनों के बीच में ज्ञानवापी में बाबा खुद विराजते हैं. मैदागिन-गौदौलिया के बीच में ज्ञानवापी से नीचे है, जो त्रिशूल की तरह ग्राफ पर बनता है. इसीलिए कहा जाता है कि काशी में कभी प्रलय नहीं आ सकता.

9. बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजमान है. वह दिनभर गुरु रूप में काशी में घूमते हैं. रात के नौ बजे जब बाबा का श्रृंगार और आरती की जाती है तो वह राज वेश में होते हैं. इसीलिए शिव को राजराजेश्वर भी कहते हैं.

10. बाबा विश्वनाथ और मां भगवती काशी में प्रतिज्ञाबद्ध हैं. मां भगवती अन्नपूर्णा के रूप में हर काशी में रहने वालों को पेट भरती हैं. वहीं, बाबा मृत्यु के बाद तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं. बाबा को इसीलिए ताड़केश्वर भी कहते हैं.

11. बाबा विश्वनाथ के दर्शन से ही इंसान के सभी पाप धुल जाते हैं. शिवरात्रि में बाबा विश्वनाथ औघड़ रूप में भी विचरण करते हैं. उनके बारात में भूत, प्रेत, जानवर, देवता, पशु और पक्षी सभी शामिल होते हैं.

12. ये मान्यता है कि जब औरंगजेब इस मंदिर का विनाश करने के लिए आया था, तब मंदिर में मौजूद लोगों ने यहां के शिवलिंग की रक्षा करने के लिए उसे मंदिर के पास ही बने एस कुएं में छुपा दिया था, और वह कुआं आज भी मंदिर के आस-पास कहीं मौजूद है.

13. कहानियों के अनुसार, काशी का मंदिर, वह वास्तविक मंदिर नहीं है. काशी के प्राचीन मंदिर का इतिहास कई साल पुराना है, जिसे औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था. बाद में फिर से मंदिर का निर्माण किया गया, जिसकी पूजा-अर्चना आज की जाती है। 

14. काशी विश्वनाथ मंदिर को एक बार फिर इन्दौर की रानी अहिल्या बाई होल्कर ने बनवाया था. मान्यता है कि 18वीं सदी में खुद भगवान शिव ने अहिल्या बाई के सपने में आकर इस जगह उनका मंदिर बनवाने को कहा था.

15. रानी अहिल्या बाई के मंदिर निर्माण करवाने के कुछ साल बाद महाराज रणजीत सिंह ने मंदिर में सोने का दान किया था. कहा जाता है कि महाराज रणजीत ने लगभग एक टन सोने का दान किया था, और उस सोने से मंदिर के छत्रों पर सोना चढाया गया था.

16. मंदिर के ऊपर एक सोने का छत्र लगा हुआ है. इस छत्र को चमत्कारी माना जाता है और इसे लेकर एक मान्यता प्रसिद्ध है. अगर कोई भी भक्त इस छत्र के दर्शन करने के बाद कुछ भी मांगता है तो उसकी वो मनोकामना जरूर पूरी होती है.। 

आशा करती हूं काशी पर दोनों भागों को पढकर आपको अच्छा लगा होगा। 

       काशी वासी

             रजनी अजीत सिंह 

काशी नगरी की चर्चा भाग-1 

वाराणसी पर बहुत कुछ लिखने को सोच रही थी क्योंकि मैं काशी की वासी हूँ और काशी जिसे माना जाता है कि भोले बाबा के त्रिशूल पर यह नगरी बसी हुई है और उसकी ही चर्चा न करूँ तो लेखनी उठाना अपने आप से बेमानी करना हो जाएगा।  परन्तु समय अभाव के कारण नहीं लिख पा रही थी। 

काशी का इतिहास

वाराणसी (बनारस), १९२२ ई

गंगा तट पर बसी काशी बड़ी पुरानी नगरी है। इतने प्राचीन नगर संसार में बहुत नहीं हैं। हजारों वर्ष पूर्व कुछ नाटे कद के साँवले लोगों ने इस नगर की नींव डाली थी। तभी यहाँ कपड़े और चाँदी का व्यापार शुरू हुआ। कुछ समय उपरांत पश्चिम से आये ऊँचे कद के गोरे लोगों ने उनकी नगरी छीन ली। ये बड़े लड़ाकू थे, उनके घर-द्वार न थे, न ही अचल संपत्ति थी। वे अपने को आर्य यानि श्रेष्ठ व महान कहते थे। आर्यों की अपनी जातियाँ थीं, अपने कुल घराने थे। उनका एक राजघराना तब काशी में भी आ जमा। काशी के पास ही अयोध्या में भी तभी उनका राजकुल बसा। उसे राजा इक्ष्वाकु का कुल कहते थे, यानि सूर्यवंश[1] काशी में चन्द्र वंश की स्थापना हुई। सैकड़ों वर्ष काशी नगर पर भरत राजकुल के चन्द्रवंशी राजा राज करते रहे। काशी तब आर्यों के पूर्वी नगरों में से थी, पूर्व में उनके राज की सीमा। उससे परे पूर्व का देश अपवित्र माना जाता था।

आर्य

महाभारत पूर्व मगध में राजा जरासन्ध ने राज्य किया और काशी भी उसी साम्राज्य में समा गई। आर्यों के यहां कन्या के विवाह स्वयंवर के द्वारा होते थे। एक स्वयंवर में पाण्डव और कौरव के पितामह भीष्म ने काशी नरेश की तीन पुत्रियों अंबाअंबिका और अंबालिका का अपहरण किया था। इस अपहरण के परिणामस्वरूप काशी और हस्तिनापुर की शत्रुता हो गई। महाभारत युद्ध में जरासन्ध और उसका पुत्र सहदेव दोनों काम आये। कालांतर में गंगा की बाढ़ ने पाण्डवों की राजधानी हस्तिनापुर को डुबा दिया, तब पाण्डव वर्तमान इलाहाबाद जिला में यमुना किनारे कौशाम्बी में नई राजधानी बनाकर बस गए। उनका राज्य वत्स कहलाया और काशी पर मगध की जगह अब वत्स का अधिकार हुआ।

उपनिषद काल

बनारस का तैल चित्र, १८९०

इसके बाद ब्रह्मदत्त नाम के राजकुल का काशी पर अधिकार हुआ। उस कुल में बड़े पंडित शासक हुए और में ज्ञान और पंडिताई ब्राह्मणों से क्षत्रियों के पास पहुंच गई थी। इनके समकालीन पंजाब में कैकेय राजकुल में राजा अश्वपति था। तभी गंगा-यमुना के दोआब में राज करने वाले पांचाल में राजा प्रवहण जैबलि ने भी अपने ज्ञान का डंका बजाया था। इसी काल में जनकपुर, मिथिला में विदेहों के शासक जनक हुए, जिनके दरबार में याज्ञवल्क्य जैसे ज्ञानी महर्षि और गार्गी जैसी पंडिता नारियां शास्त्रार्थ करती थीं। इनके समकालीन काशी राज्य का राजा अजातशत्रु हुआ।[1] ये आत्मा और परमात्मा के ज्ञान में अनुपम था। ब्रह्म और जीवन के सम्बन्ध पर, जन्म और मृत्यु पर, लोक-परलोक पर तब देश में विचार हो रहे थे। इन विचारों को उपनिषद् कहते हैं। इसी से यह काल भी उपनिषद-काल कहलाता है।

महाजनपद युग

युग बदलने के साथ ही वैशाली और मिथिला के लिच्छवी में साधु वर्धमान महावीर हुए, कपिलवस्तु के शाक्य में गौतम बुद्ध हुए। उन्हीं दिनों काशी का राजा अश्वसेन हुआ। इनके यहां पार्श्वनाथ हुए जो जैन धर्म के २३वें तीर्थंकर हुए। उन दिनों भारत में चार राज्य प्रबल थे जो एक-दूसरे को जीतने के लिए, आपस में बराबर लड़ते रहते थे। ये राह्य थे मगधकोसलवत्स और उज्जयिनी। कभी काशी वत्सों के हाथ में जाती, कभी मगध के और कभी कोसल के। पार्श्वनाथ के बाद और बुद्ध से कुछ पहले, कोसल-श्रावस्ती के राजा कंस ने काशी को जीतकर अपने राज में मिला लिया। उसी कुल के राजा महाकोशल ने तब अपनी बेटी कोसल देवी का मगध के राजा बिम्बसार से विवाह कर दहेज के रूप में काशी की वार्षिक आमदनी एक लाख मुद्रा प्रतिवर्ष देना आरंभ किया और इस प्रकार काशी मगध के नियंत्रण में पहुंच गई।[1] राज के लोभ से मगध के राजा बिम्बसार के बेटे अजातशत्रु ने पिता को मारकर गद्दी छीन ली। तब विधवा बहन कोसलदेवी के दुःख से दुःखी उसके भाई कोसल के राजा प्रसेनजित ने काशी की आमदनी अजातशत्रु को देना बन्द कर दिया जिसका परिणाम मगध और कोसल समर हुई। इसमें कभी काशी कोसल के, कभी मगध के हाथ लगी। अन्ततः अजातशत्रु की जीत हुई और काशी उसके बढ़ते हुए साम्राज्य में समा गई। बाद में मगध की राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र चली गई और फिर कभी काशी पर उसका आक्रमण नहीं हो पाया।

आधुनिक काशी राज्य

आधुनिक काशी राज्य वाराणसी का भूमिहार ब्राह्मण राज्य बना है। भारतीय स्वतंत्रता उपरांत अन्य सभी रजवाड़ों के समान काशी नरेश ने भी अपनी सभी प्रशासनिक शक्तियां छोड़ कर मात्र एक प्रसिद्ध हस्ती की भांति रहा आरंभ किया। वर्तमान स्थिति में ये मात्र एक सम्मान उपाधि रह गयी है। काशी नरेश का रामनगर किला वाराणसी शहर के पूर्व में गंगा नदी के तट पर बना है।[2] काशी नरेश का एक अन्य किला चेत सिंह महल, शिवाला घाट, वाराणसी में स्थित है। यहीं महाराज चेत सिंह जिनकी मा राजपुत थी क्को ब्रिटिश अधिकारी ने २०० से अधिक सैनिकों के संग मार गिराया था।[3] रामनगर किला और इसका संग्रहालय अब बनारस के राजाओं का एक स्मारक बना हुआ है। इसके अलावा १८वीं शताब्दी से ये काशी नरेश का आधिकारिक आवास बना हुआ है।[4] आज भी काशी नरेश को शहर में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।[5] ये शहर के धार्मिक अग्रणी रहे हैं और भगवाण शिव के अवतार माने जाते हैं।[6] ये शहर के धार्मिक संरक्षक भी माने जाते हैं और सभी धामिक कार्यकलापों में अभिन्न भाग होते हैं।[7]

काशी नरेशों की सूची

काशी नरेशों की सूची

राज्य आरंभ

राज्य समाप्त

मनसा राम

१७३७

१७४०

बलवंत सिंह

१७४०

१७७०

चैत सिंह

१७७०

१७८०

महीप नारायण सिंह

१७८१

१७९४

महाराजा उदित नारायण सिंह

१७९४

१८३५

महाराजा श्री ईश्वरी नारायण सिंह बहादुर

१८३५

१८८९

लेफ़्टि.कर्नल महाराजा श्री सर प्रभु नारायण सिंह बहादुर

१८८९

१९३१

कैप्टन महाराजा श्री सर आदित्य नारायण सिंह

१९३१

१९३९

डॉ॰विभूति नारायण सिंह

१९३९

१९४७

डॉ॰विभूति नारायण सिंह भारतीय स्वतंत्रता पूर्व अंतिम नरेश थे। इसके बाद १५ अक्टूबर १९४८ को राज्य भारतीय संघ में मिल गया। २००० में इनकी मृत्यु उपरांत इनके पुत्र अनंत नारायण सिंह ही काशी नरेश हैं और इस परंपरा के वाहक हैं।

संक्षेप में वाराणसी (- काशी – बनारस)  का इतिहास कैसा और काशी नगरी कैसी लगी? अवश्य बताऐं।  

काशी वासी

रजनी अजीत सिंह 

~ 🌺🌺माँ 🌺🌺

माँ तुम अतुलनीय हो। 

मुझे लाया धरा पर है तुमने ओ माँ। 

ह्दय की गहरी तुम संवेदना हो। 

न पाया किसी को तुम सा ओ जग में। 

कोख के अन्दर समाया मुझे माँ। 

जीना सीखाया तुमने मुझे माँ। 

अन्तर्मन से लिखा है तुम पर। 

अस्तित्व समाया है तुझमें ओ माँ। 

छूट न जाये कहीं अंगुली तेरा। 

छोड़ न जाना इस जग में मुझे माँ। 

तड़प – तड़प के न जी पाऊंगा माँ। 

रखना मुझे आंचल के छांव में माँ। 

         देवराज 

           A. K. Shahi
              

रींग सेरेमनी, जन्म दिन की बधाई 22.7.17.

आज मेरे भाई का जन्मदिन है। और आज ही उसका रींग सेरेमनी और गोदभराई है। उसमें ही हम और हमारे दोनों बेटों के साथ बनारस से दिल्ली बाई प्लेन का सफर किया। 

🎂🌺🎂🌺🎂🌺🎂🌺🎂🌺🎂🌺

  जन्म दिन की बधाई हो

🌞🌞🌙🌌🌒🌌🌙🌌🌒🌙🌞🌞

 जगत में सूरज, चाँद – तारे जब तक चमकता  रहे। 

नेहा के संग तुम्हारे जिंदगी की बगिया महकता रहे। 

आज के दिन नेहा के जिंदगी में  तुम आये, और तुम्हारे  जिंदगी में नेहा आयी।

दोनों की जिंदगी में खुशियों की बरसात हो गई। 

और हमारे परिवार में हम लोगों के लिए भी खुशियों की बहार आ गयी । 

                   रजनी सिंह 
 

🎆💐रींग सेरेमनी 🎇💐

नितेश    

                                                          संग

                    नेहा 

                  स्पेशल 

खुशबू

             


देख तमाशा लकड़ी का 

हे लकड़ी! तू बन लकड़ी, अब देख तमाशा लकड़ी का, 

अब देख तमाशा लकड़ी का, अब देख तमाशा लकड़ी का। 

गर्भवास से बाहर निकला, झूले पालना लकड़ी का। 

पांच वर्ष की उम्र हुई, तब हाथ खिलौना लकड़ी का। 

हे लकड़ी…………………………. ।

बीस बरस की उम्र भई, तैयारी हुई ब्याह करने की। 

बांध सेहरा घोड़ी चढ़ गया, तोरण मांइया लकड़ी का। 

हे लकड़ी……………………..………।

चालिस बरस की उमर हुई, फिकर लगी है बुढ़ापे की। 

साठ बरस की हुई  उमर, तब हाथ सहारा लकड़ी का। 

हे लकड़ी…………………………….. ।

अस्सी बरस की उमर हुई, तैयारी भई अब चलने की। 

चार जना मिल तुझे उठाया, विमान बनाया लकड़ी का। 

हे लकड़ी……………….…………. ।

गंगा तट पर जाकर रख, स्नान कराया गंगा का। 

नीचे लकड़ी ऊपर लकड़ी चिता बनाया लकड़ी का। 

हे लकड़ी…………………………… ।

अधम आध शरीर जला, तब ठोकर मारा लकड़ी का। 

होरी फूंक दियो फिर, टुकड़ा डाला लकड़ी का। 

हे लकड़ी……….………………….. ।

हे लकड़ी तू बन लकड़ी, देख खेल बना सब लकड़ी का। 

ढोलक लकड़ी, बाजा लकड़ी, सितार बना है लकड़ी का। 

हे लकड़ी……………………………… ।


घर अकेला हो गया 

आज मैं मुनव्वर राना की शायरी शेयर करती हूं जो शायद पढकर अच्छा लगे। 

           शायरी से मुहब्बत करने वाले हर आदमी के नाम। 

ऐसा लगता है कि जैसे खत्म मेला हो गया, 

उड़ गई आंगन से चिड़िया घर अकेला हो गया। 

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जब भी कश्ती मेंरी सैलाब में आ जाती है, 

माँ दुआं करते हुए ख्वाब में आ जाती है। 

रोज मैं लहू से उसे खत लिखता हूँ, 

रोज उंगली मेरी तेजाब में आ जाती है। 

दिल की गलियों से तेरी याद निकलती ही नहीं, 

सोहनी फिर इस पंजाब में आ जाती है। 

रात भर जागने का शिला है शायद, 

तेरी तस्वीर- सी महताब में आ जाती है। 

एक कमरे में बसर करता है सारा कुनबा, 

सारी दुनिया दिल-ए – बेताब में आ जाती है। 

जिंदगी तू भी भिखारिन की रिदा ओढ़े हुए, 

कूचा – ए रेशम ओ कमख्वाब में  इ जाती है। 

दुःख किसी का हो छलक उठती हैं मेरी आँखें। 

सारी मिट्टी मेरे तलाब में आ जाती है।