लेखक: रजनी की रचनायें

जिंदगी का सच्चा एहसास

मैं तुम्हें भूलाकर सम्हलना भी चाहूँ तो नहीं सम्हल सकती।
तुमने मुझे कुछ कहा होता तो कोई गम न होता पर तुमने तो मेरे एहसास को ही रौंद डाला जो जज्बात और एहसास मेरे रुह से जुड़ा था उसे भी शर्मसार कर दिया।
जिंदगी में सबसे ज्यादा गुरुर था तुम पर, पर वही गुरुर कभी न भरने वाला जख्म दे कभी चाहकर भी न सम्हलने का पाठ पढ़ा दिया।
जो किसी से न कहा वो भी शेयर किया तुझसे दोस्त समझर कितने रिश्तों का एहसास पाया था तुझसे रुह की गहराइयों से।
पर तुम्हे तोड़ते वक्त किसी रिस्तों का ख्याल न आया क्यों? क्यों कि तुमने मेरे रिश्ते को रुह की गहराइयों से नहीं चाहा था।
मैं तो तेरे शब्दों से ” Aapko sirf apni chinta hai..sirf khud ka sochna hai” आहत थोड़ा नराज होने का अभ्यास कर रही थी कि मुझे कोई मना लेगा, पर मनाना तो दूर सब कुछ तोड़कर कभी न भूलाने वाला रिश्तों का सम्बोधन उपहार में दे गया ” भाई” ।
तुमने तो बस So good bye didi कहकर चल दिया पर तुझे नहीं पता है कि हमने तो अपने जिंदगी में खुश रहने के एहसास को ही अलविदा कह दिया है क्योंकि इन रिश्ते का एहसास कभी किसी और के लिए नहीं जगा पाऊंगी, शायद जिंदगी में कभी भी नहीं, शायद क्या? पक्का कभी भी नहीं, इस जीते जिंदगी तो कभी भी नहीं, कभी भी नहीं मेरे “बटे”मेरे “भाई ” मेरे “दोस्त” कभी भी नहीं।
रजनी अजीत सिंह 12.11.2019

शिद्दत

तुझे बड़ी शिद्दत से चाहा था
पर क्या पता था तेरी चाहत शिद्दत बनकर ही रह जायेगी।
ये शिद्दत शब्द का नयाब तोहफा हमने अपने आप को दिया है
जो दिल में हमेशा हमराज बनकर रह जायेगी।
रजनी अजीत सिंह 12.11.2019

खामोशी

दिल सोचता है क्यों जब मन बस में ही नहीं है।
खलती कमी क्यों ऐसे ये खुद को पता नहीं है।
आँखो से क्यों हुआ बारिश जब कोई दर्द ही नहीं है।
मन हर बात क्यों समझाये जब समझकर भी समझता ही जो नहीं है।
हर तरफ क्यों खामोशी छायी जब गम भी अब नहीं है।
रजनी अजीत सिंह 15.102019

My great Fother

1. The great father of mine…
A soldier by profession and heart…
A synonym of bravery, sacrifice and kind…
Dedicated his life to his mother earth…
Fought 3 wars for India…
1962, 65 and 71…
Evertyime for his beloved countrymen…
For their safety, security and mirth…
I am his little girl…
With pouch Full of dreams….
Want to light many lamps in my countrymen…
Through my words as their beam😊😊Rajani Ajit singh 6.3.18

मेरे बाबू जी थे बहुत महान,
आर्मी के वे सैनिक थे।
सारा जीवन अर्पित कर मान बढ़ाया भारत की।
रग रग में वीरता और साहस भरा था,
साक्षात मूर्ति थे वो त्याग और बलिदान की।
अपने देश के आन के खातिर लड़ाई लड़ी,
1962,1965, 1971तीनो बार ही
चाइना और पाकिस्तान की।
उनकी छोटी बेटी मैं हूँ,
चाहूं देश के लिए कुछ कर जांउ।
अपने शब्दों से ही अपने
देशवासी के मन में जोश कुछ भर जांऊ।
रजनी अजीत सिंह 13.3.2018

Dear Maa

Dear MAA…
Said something, you must have before leaving…
Not you, but the memories I wouldn’t be craving…
Can’t Complaint to you dear maa..
It’s Just a reflection of my constant failing…
My heart wrenches thinking of my guilts…
Mustn’t you have thought before this spilt..
May be if you’d thought maa..not this grief would I be suffering…
Bound was…this moment to come…
Like the darkest night…making Rajni numb…
Remorse of this would always be…
It was…it is and will always be…
It was…it is and will always be…
Love, for the hold of which..
I lost,rejected, forgotten it..
Nor you, neither the love… remains with me today…
O maa ! You didn’t understand this..I’m sorry to say..
Despite this darkness, I have lit..
The candle of my heart and to knit…
A soft bed for my dears…
With loud smiles and silent tears….

जाने से पहले कुछ तो कही होती
जिंदगी में माँ से शिकायत शब्दों से श्रद्धांजलि स्वरूप-

जाने से पहले कुछ तो कही होती,
साथ न सही बातें तो साथ होती।
शिकायत भी नहीं कर सकती,
कुछ खामियां मुझमें ही थी।

खामियों को सोचकर दिल परेशान है होता ।
जाने से पहले कुछ तो सोचा होता,
शायद सोचा होता,
तो जाने का अवसर नहीं आया होता।

ये अवसर तो आना ही था,
रजनी के लिए अंधेरा बनकर।
अफशोश “जिदंगी” में “रात”
कमी बनकर खलती रही,
खली है, खलेगी , और खलती रहेगी।

जिस प्यार को अपना कहने के खातिर,
भुलाया, ठुकराया, गंवाया है प्यार।
अब न प्यार ही रहा न तू ही रही।
जननी बनकर जब तू ही न समझ सकी रात को।

“रात “होकर भी अंधेरे में दिल के दीए
को जला रौशनी है किया।
ताकी सब सुखी के साथ निद्रा
में ही आराम का एहसास करे,
वर्ना ये आराम शब्द का एहसास
किसने किया होता।

रजनी सिंह( 29.10.97)

हिंदी दिवस

हिंदी हम सबकी गौरव की भाषा, तभी तो बनी हमारी राज्य भाषा।

जन जन में जब प्रिय बने तब हिंदी देश की स्तम्भ बने।

हर वर्ष चौदह सितम्बर को हिंदी दिवस मना, लोगों की मातृभाषा बन हमें जागरुकता का पाठ पढ़ाती।

हिंदी है तो वतन है इस आशा की ज्योति जगाती।

पूरी दुनिया में डंका बजती क्योंकि हम हिंदी भाषी हैं।

जब बने हिंदी हमारी राज्य भाषा से राष्ट्र भाषा तब ये सम्मानित हो, हम सबकी यही अभिलाषा है।

आओ हम सब शपथ ले सदा मने हिंदी दिवस का हर दिन ही जलसा।

काश्मीर से कन्याकुमारी तक राष्ट्र भाषा हिंदी हमारी है, साहित्य की ये फुलवारी है।

अंग्रेजी से लड़े जंग ये सम्मान की अधिकारी है।

जन जन में मशहूर हो क्यों कि हिंदी ही पहचान हमारी है।

हिंदी ऐसी भाषा है जो सपने हमें दिखाती, सुख दुःख लिख कर एक नया सृजन कराती।

बिना हिंदी के हिंदुस्तान की कल्पना नहीं हो सकती हमारी है, क्योंकि सारे जग की लाडली भाषा हिंदी हमारी है।

हिंदी दिवस के अवसर पर मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

रजनी अजीत सिंह 14.9.2019

हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा नहीं बल्कि केवल ये राज भाषा और मातृ भाषा ही है।

इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं –

राष्ट्रभाषा- वह भाषा जो एक पूरे राष्ट्र अथवा देश द्वारा समझी, बोली जाती है; तथा उस राष्ट्र की संस्कृति से संबंधित होती है। यह पूरे देश की होती है।

राजभाषा- राज अर्थात् शासन के द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली भाषा। यह सरकार की भाषा होती है, अतः यह केन्द्र सरकार एवं राज्य सरकार के आधार पर एक ही अथवा भिन्न-भिन्न भी हो सकती है।

भारत में अधिकांश लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हैं. देश की सर्वाधिक जनसंख्या हिंदी समझती है और अधिकांश हिंदी बोल लेते हैं. लेकिन यह भी एक सत्य है कि हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है ही नहीं ये हमारी मातृ भाषा है।

हिंदी को राजभाषा का दर्जा 14 सितंबर, 1949 के दिन मिला था. तब से हर साल यह दिन ‘हिंदी दिवस’ के तौर पर मनाया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे एक वजह है. आइए जानते हैं इससे जुड़ी अहम बातें.
हिंदी भारतीय गणराज की राजकीय और मध्य भारतीय- आर्य भाषा है. 2001 की जनगणना के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि लगभग 42.20 करोड़ लोग इसकी 50 से अधिक बोलियों में से एक इस्तेमाल करते हैं.

1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आंकड़े मिलते थे, उनमें हिंदी को तीसरा स्थान दिया जाता था.
हिंदी की प्रमुख बोलियों में अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली, हरियाणवी, कुमांऊनी, मागधी और मारवाड़ी भाषा शामिल हैं.

कैसे हिंदी बनीं राजभाषा-

साल 1947 में जब अंग्रेजी हुकूमत से भारत आजाद हुआ तो उसके सामने भाषा को लेकर सबसे बड़ा सवाल था. क्योंकि भारत में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती है. 6 दिसंबर 1946 में आजाद भारत का संविधान तैयार करने के लिए संविधान का गठन हुआ. संविधान सभा ने अपना 26 नवंबर 1949 को संविधान के अंतिम प्रारूप को मंजूरी दे दी. आजाद भारत का अपना संविधान 26 जनवरी 1950 से पूरे देश में लागू हुआ.

लेकिन भारत की कौन सी राष्ट्रभाषा चुनी जाएगी ये मुद्दा काफी अहम था. काफी सोच विचार के बाद हिंदी और अंग्रेजी को नए राष्ट्र की भाषा चुना गया. संविधान सभा ने देवनागरी लिपी में लिखी हिन्दी को अंग्रजों के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी।
देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि इस दिन के महत्व देखते हुए हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाए. बतादें पहला हिंदी दिवस 14 सितंबर 1953 में मनाया गया था।

जिंदगी की हर खुशी लुटा आयी हूँ।

जिंदगी की हर खुशी तुझ पर लुटा आयी हूँ।
अपनी हस्ती को भी मिटा प्यार से सबको गले लगा आयी हूँ।
उम्र भर की जो कमाई थी इज्जत की दौलत, वो अपने कुटुम्ब पर लुटा आयी हूँ।
आज शब्दों से जो लेखनी चलायी, आँखों में गंगा बहा लायी हूँ, आग बहते हुए पानी में लगा आयी हूँ।
तूने कहा था क्या? हटा दूँ मैं वो डरावनी यादें, तूने चाहा था भूला दूँ मन में बसी उनकी मेरे प्रति नफरतें।
हाँ बदल डाला मैंने कितनों की तदवीरें, पर नहीं बदल सकती उनकी तकदीरें।
आज शब्दों से जो कागज पर लेखनी चलायी,
तो आँखों में गंगा बहा लायी हूँ, आग बहते हुए पानी में लगा आयी हूँ।
तेरे खूशबू से बसा मेरा जीवन उसे मैं भुलाती कैसे?
दुःख में भी खिलाया जो अपने हाथों से निवाला, उस प्यार के मिठास को झुठलाती कैसे?
मुझे जो हमेशा मेरे रिश्ते में देते रहे गाली उसके मन में छुपी नफरतों को नकारती कैसे?
आज जो शब्दों से कागज पर लेखनी चलायी है, तो आँखों में गंगा बहा लायी हूँ ।
आग बहते हुए पानी में लगा आयी हूँ।
जिस प्यार को दुनिया से छुपाये रखा, उसे ताउम्र गले से लगाए रखा।
उनकी नफरत भरी निगाहें, मुँख से निकले बद्दुआंऔर तानों के बीच भी अपना इमान बनाये रखा।
जिनका हर लफ्ज़ चुभा है दिल में शूलों की तरह, वो याद है मुझे पैगाम-ए-जबानी की तरह।
मुझे जो प्यारे थे जी जान की तरह, तुझे दुनियां के निगाहों में बसने के लिए जो लिखे थे नज्म।
पास रहकर भी साल-हा-साल लिखे थे तेरे नाम के खत, कभी दिन में तो कभी रात को उठकर लिखे थे।
तेरे प्यार गये, तेरे खत भी गये, तेरी यादें भी गयी, तेरी तस्वीरें भी गयी, तेरे लिफाफे भी गये।
एक युग खत्म हुआ, स्याही से लिखने के फसानें भी गये, सोसल प्लेटफॉर्म पर मैसेज कर लाइक कमेन्ट के चलन भी आ गये, पर तेरा प्यार न लिख पाये इस जहाँ में।
आज शब्दों से जो कागज पर लेखनी चलाई, तो आँखों में गंगा बहा लायी हूँ, आग बहते हुए पानी में लगा आयी हूँ।
कितना बेचैन था नैनो का नीर, आँखों से बहने के खातिर, जो भी अश्रुधारा बहा था वो उन्हीं के लिए बहनें को बेकल था।
प्यार अपना भी तो गंगा की तरह निर्मल था, तभी तो तन्हाई में भी मिलन की खुशियाँ दिल में उतर आयी थी।
आज शब्दों से जो कागज पर लेखनी चलायी, तो आँखों में गंगा बहा लायी हूँ, आग बहते हुए पानी में लगा आयी हूँ।
रजनी अजीत सिंह 6.7.2019

पतझड़ का मौसम जान सखी

पतझड़ का मौसम आया सखी, जो पुरातन पत्तों को झाड़ गया।
पर आस लगी फिर भी तरु की, जीवन डाली को थाम सखी,
पतझड़ का मौसम जान सखी।
पुरातन पत्ते टूट गये, मरकत के साथी छूट गये।
अटके विश्वास के तरु पर दो प्रीत पात,तुफानी पवन से लड़ करके,
जीवन डाली को थाम सखी, पतझड़ का मौसम जान सखी।
लुक छिपकर आयेंगी बहार सखी, तरु पर पल्लव भी आयेगा।
फल फूल सभी लग जायेगा, बदलते ऋतु के साथ,
मौसम भी बदल जायेगा।
प्रकृति के नियमों को जान, समय की यही है माँग सखी।
बसंत ऋतु फिर आयेगी, कू कू कोयल गायेगी,
फिर मधुर गीत सुनायेगी, जीवन में खुशियाँ छायेंगी।
पतझड़ का मौसम जान सखी, जीवन डाली को थाम सखी।
रजनी अजीत सिंह 9.9.2019

मित्रता दिवस

साथ बैठकर जब कुछ गप-शप करतें हैं तो मित्रता जीने का सलीका सीखा ही जाती है।
कोई कितना भी बत्तमीज क्यों न हो मित्रता तमीज का पाठ पढ़ा ही जाती है।
एक दूसरे का साँस बनकर साथ निभाने का हुनर मित्रता बता ही जाती है।
सबकुछ छोड़कर बातें आज हो जाये मन की कुछ तुम कहो कुछ हम कहें।
मित्र हर राज से वाकिफ हो ये भी जरूरी है, बात करने की चाहत हृदय की आज के दिन क्यों अधूरी हो?
दूर होकर भी मन के बहुत करीब होते हैं, गम में चाहे जितने डूबे हों मित्र अपनी ऊल- जलूल बातों से खुशी विखेर ही जाते हैं।
आज के दिन ये आस हमारी पुरी हो, कृष्ण सुदामा सा मित्रता हमारी हो।
मित्रता दिवस के अवसर पर मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।
रजनी अजीत सिंह 4.8.2019
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