Month: मार्च 2017

अनुमान नहीं, अनुभव की कुछ पंक्तियाँ 

अश्रु  से नहीं मेरी पहचान थी कुछ 

दर्द से परिचय तुम्ही ने तो कराया 

छू दिया तुमने ह्रदय की धड़कनों को 

गीत का अंकुर तुम्ही ने तो उगाया 

मूक मन को स्वर दिए हैं बस तुम्ही ने 

उम्र भर एहसान भूलूगीं नहीं मैं 


मैं न पाती सीख यह भाषा नयन की 

तुम न मिलते उम्र मेरी व्यर्थ होती 

सांस ढ़ोती शव विवश अपना स्वयं ही 

और मेरी जिंदगी किस अर्थ होती 

प्राण को विश्वास सौंपा बस तुम्ही ने 

उम्र भर एहसान भूलूगीं नहीं मैं 


तुम मिले हो क्या मुझे साथी सफर में 

राह से कुछ मोह जैसा हो गया है 

एक सूनापन की जो मन को डसे था 

राह में गिरकर कहीं वह खो गया है 

शोक को उत्सव किया है बस तुम्ही ने 

उम्र भर एहसान भूलूगीं नहीं मैं


यह ह्रदय पाहन बना रहता सदा ही 

सच कहूं यदि जिंदगी में तुम न मिलते

यूं न फिर मधुमास मेरा मित्र होता 

और अधरो पर न यह फिर फूल खिलते 

भग्न मंदिर फिर बनाया बस तुम्ही ने 

उम्र भर एहसान भूलूगीं नहीं मैं 

तीर्थ सा मन कर दिया है बस तुम्हीं ने 

उम्र भर एहसान भूलूगीं नहीं मैं 

  

शिष्य की बड़ी असमर्थता है धन्यबाद देने में। किन शब्दों में बांधे धन्यबाद? क्यों कि शब्द भी गुरु के ही दिये हुए हैं। मूक ही निवेदन हो सकता है। लेकिन फिर भी कहने का कुछ मन होता है। बिन कुछ कहे भी रहा नहीं जाता। 

                       तो एक ही उपाय है कि गुरु की प्रतिध्वनि गूंजे। जो गुरु ने कहा है, शिष्य उसे अपने प्राणों में गुंजाए। जो गुरु ने बजाया है, शिष्य की प्राण – वीणा पर भी बजे। यही धन्यबाद होगा यही अभार होगा। अर्थात जो सुगंध गुरु से मिली है, वह बांट दी जाय। यही एक उपाय है गुरु से उऋण होने का। 


अनुमान नहीं, अनुभव “ओशो” 

अनुमान नहीं अनुभव की कुछ पंक्तियाँ लिख रही हूँ –

अगर अकेला होता मैं तो 

शायद कुछ पहले आ जाता 

लेकिन पीछे लगा हुआ था 

संबंधों का लम्बा तांता 

कुछ तो थी जंजीर पांव की 

कुछ रोके था तन का रिश्ता 

कुछ टोके था मन का नाता 

इसीलिए हो गई देर

कर देना माफ विवशता मेरी 

धरती सारी मर जाएगी 

अगर क्षमा निष्काम हो गई 

मैंने तो सोचा था अपनी 

सारी उमर तुझे दे दूंगा 

इतनी दूर मगर थी मंजिल 

चलते – चलते शाम हो गई। 

प्रेम 

अनन्य प्रेम में होना प्रेरणा है। यह ज्ञान को जीवन में उतारने के खातिर विश्वास पैदा करता है। अनन्य प्रेम का प्रत्यक्ष चिन्ह है एक अमिट मुस्कान। 

प्रेम को प्रेम ही रहने दो। उसे कोई नाम न दो। 

जब तुम प्रेम को नाम देते हो, तब वह एक सम्बन्ध बन जाता है, और सम्बन्ध प्रेम को सीमित करता है। 

तुम मेंऔर मुझमें प्रेम है उसे रहने दो। 


जब प्रेम चमकता है, यह सच्चिदानन्द है। 

जब प्रेम बहता है, यह अनुकम्पा है। 

जब प्रेम उफनता है, यह क्रोध है। 

जब प्रेम सुलगता है, यह ईष्र्या है। 

जब प्रेम नकारता है, यह घृणा है। 

जब प्रेम सक्रिय है, यह सम्पूर्ण है। 

जब प्रेम में ज्ञान है, यह “मैं” हूँ। 

   9मार्च 2017

आज का दिन मेरे लिए खास है्क्यों?क्यों कि आज मेरा जन्मदिन है। खुशी इस बात का है कि मैं आज के ही दिन जन्म ली हूं। 12 बजते ही मोबाइल फोन पर बधाई मिलने शुरू हो जाएगा। गिफ्ट भी मिलेगें, मन्दिर जाएगें, घूमने जाएंगे वैगरह वैगरह खुशियाँ मनाएँगे। आज ऐसे ही मुस्कुराती हुई खुशी से जन्मदिन मनाते – मनाते 41 साल की हो गई, यानी 41साल बीत गया है। खुशी इस बात की है कि मैं 41साल की होगई। दुःख इस बात का है कि इकतालिस साल का अनमोल समय बिना किसी उपलब्धि के गुजार दिया

कविता
आई थी इस दुनिया में कुछ नाम कमाने के लिए।

नाम क्या कमायी रजनी रात के अंधेरे में सारी उम्र खो गई।

अभी तो बचपन का दामन पकड़े ही थे।
कि कम्बख्त बुढ़ापे के दस्तक आने ही लगे।

अभी तो बिता बचपन बड़े हुए।

जिम्मेदारी का बोझ लिए जीने लगे हम ऐसे ही।

अभी तो रजनी कुछ न किया चलने चलाने की बात तब कैसे करें।

बचे जीवन जो हैं तो अपना नाम रौशन कर लो।

वर्ना रात के अंधेरे में बचा जीवन भी खो जाएगा।

और रह जाएगा बस केवल अंधेरा ही अंधेरा।

इसलिए कुछ करके रजनी जीवन के हसीन पलो को कैद कर लो।

अपनी खुशियों को अपने रिश्तों को अपने पलू से बांध लो।

क्या पता कौन कहां, कब और कैसे बिछड़ जाए।

जन्म दिन की ढ़ेर सारी खुशियों के साथ आपकी रजनी अजीत सिंह

           महिला दिवस (8.3.17)

आओ महिला हम सब मिलकर महिला दिवस मनायेें।
कुछ जीवन में करने खातिर सोयी शक्ति जगायें।

दुर्गा बन उपकार करेंगे, रण चण्डी बन रण में लड़ेगें हम।
कहीं काली बन दुष्टों का रक्त पान करेंगे हम।

कहीं पालनहारी बनकरके सबका पालन कर लेगें हम।

कहीं कल्याणी बन करके जगत कल्याण करेंगे हम।

कहीं अनुसुईया, सीता बन पतिबरता धर्म निभाएगें हम।

कहीं रानी लक्ष्मीबाई, तो कहीं सावित्री बन जाएगें हम।

कहीं आम औरत बनकरके ही जीवन का फर्ज निभाएगें हम।

आओ महिला दिवस मनाकर आज कुछ अच्छा करने का संकल्प लेकरके भारत का मान बढ़ायें हम।

रजनी सिंह

~क्या मिटने वाले बेकार मिट जाते हैं? (26.8.97)

क्या मिटने वाले बेकार मिट जाते हैं?

क्या बेकार जाती हैं उनकी कुर्बानियां? 

क्या तपस्वी की तपस्या वेकार हो जाते हैं? 

क्या झूठ से जीतने वाले हार नहीं जाते हैं? 

क्या असत्य से पराजित होने वाले जीत नहीं जाते हैं? 

क्या फिर असत्य पराजय का मुँह नहीं देख पाते हैं? 

ये कोई प्रमाण दे दे सत्य हमेशा हार जाता है। 

मुझे तो अब तक ये प्रमाण मिल पाया है। 

सत्य का राह कठिन है लेकिन, 

अन्त समय वही मंजिल पाता है। 

जिसने सत्य को गले लगाया, 

जिसने सत्य का राह दिखाया। 

वही मंजिल तक पहुंचाने में राह दिखा पाते हैं। 

            सत्य की राही रजनी सिंह  

एक बहुत ही अच्छे परिवार की चहेती माँ को श्रद्धांजलि। (3.3.17)

सबकी चहेती थी , किसी की मां तो किसीकी दादी थी। 

सबके लिए अनमोल रत्न थी, हर रिश्ते ने आज एक रिस्ता खो दिया। 

थी तो बहन की सास पर, अपनी भी चहेती थी। 

और कुछ ज्यादा नहीं लिख पा रही, ना जा पा रही। ये कैसी मजबूरी, सोचा उन्ही के विचारों को याद कर, इसी से श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ।  

बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि हमने इतनी सुन्दर विचारों वाली प्यारी अम्मा को खो दिया है। उनका सुन्दर विचार था_

“गिलास का हमेशा भरा पोरसन देखो खाली नहीं। 

खाली पोरसन देखोगे तो भरा कभी  देखी नहीं पाओगे। 

अम्मा को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि सुमन। 💐💐🌹🌹🌼🌹🌼🌹🌸🌹🌸🌹🌸🌹🌸🌹🌸

                 रजनी सिंह 


~आने वाले कल में सब असम्भव सम्भव होगा। (27.8.97)

आने वाले कल में सब असम्भव सम्भव होगा।असत्य काअन्धकार हटाने से सत्य का प्रकाश छा जाएगा। 

जैसे सावित्री ने सत्यवान का प्राण बचा वापस लाया था। 

वैसे ही किसी सावित्री का सत्यवान वापस आ जाएगा।  
जैसे अर्जुन के प्रण के खातिर दिन भी ठहर गया था। 

वैसे ही किसी भक्त के खातिर दिन भी ठहर जाएगा। 

जैसे राम के तीर सभी को मार फिर वापस आ जाता था। 

वैसे ही किसी वीर योद्धा का तीर तरकस में वापस आ जाएगा। 

जैसे वाल्मीकि भटके थे राह दिखाने  से ही वापस आ पाए थे। 

वैसे ही  भटके हुए व्यक्ति राह दिखाने से वापस आ पायेगें। 

यही साधना  मेरी है यही प्रयत्न मेरा है। 

जब ये कथन सत्य होगा तब प्रकाश आ जाएगा। 

जब असम्भव सम्भव होगा तभी ये मन सुख पाएगा।  

जब प्रयत्न सफल होगा तभी साधना पूरा हो पायेगा।

नहीं तो सदियों – सदियों तक यही संघर्ष चलता जाएगा। 

हम मिटेगें कोई और आयेगा राह वो भी दिखाकर ही जाएगा। 

देखे कब तक मिटेगें मिटने वाले, देखे कब तक जीतेंगे जीतने वाले। 

देखे कब तक असत्य का राज्य चलेगा। 

देखे कब तक सत्य पराजित होता चलेगा, 

स्वार्थ समर में अपने लिए। 

                  रजनी सिंह