महीना: अप्रैल 2018

जिंदगी में चौकट पर बैठी है शाम।

चौकट पर बैठी है शाम
दिल में हजारों तमन्ना लिए
हुई है बेकरार माँ हर शाम।
जब बच्चे सही सलामत लौट आए
तो दौड़कर गले लगाती है माँ हर शाम।
यदि हो जाए थोड़ा सा भी देरी
तो तड़प उठती है अनहोनी से
चौकट पर बैठी माँ हर शाम।
तब कहीं चैन आता है जब चूमती माथा है
चौकट पर बैठी माँ हर शाम।
रजनी अजीत सिंह 20.4.18
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जिंदगी में बाबूजी की यादें।

मेरे बाबू जी थे बहुत महान, आर्मी के वे सैनिक थे, सारा जीवन अर्पित कर मान बढ़ाया भारत की।
रग रग में वीरता और साहस भरा था, साक्षात मूर्ति दिखते थे वो त्याग और बलिदान की।
अपने देश के आन के खातिर लड़ाई लड़ी 1962,1965, 1971दोनों बार ही चाइना और पाकिस्तान की।
उनकी छोटी बेटी मैं हूँ मैं चाहूं देश के लिए कुछ कर जांउ अपने शब्दों से ही अपने देशवासी के मन में जोश कुछ भर जांऊ।
मेरे बाऊजी एक बहुत वीर सैनिक थे उन्होंने हमें हर हथियार चलाने सीखाया था ताकि हम अपनी सुरक्षा स्वयं कर सके। हमारे बाबूजी अब्दुल हम्मीद का नाम सुना होगा उन्ही के बैच के थे वो शहीद हो गए तो उनका नाम अमर हो गया। हमारे बाबूजी हम बेटियों को बेटे से अधिक मानते थे और हर सिचुएशन में यदि हथियार साथ न हों तो आने वाले समस्या से कैसे निपटे ये भी अच्छी तरह से सीखाया था। आज वो इस दुनिया में नहीं रहे पर भूतपूर्व सैनिक के रूप में हमेशा हमारे देश और हमको गर्व है।
रजनी अजीत सिंह 19.4.18
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जिंदगी में चुप रहकर भी बहुत कुछ कह गई।

हमेशा बोल कर ही बोला जाए ये ज़रूरी तो नहीं।

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दर्द से भरी बंद आँखें चुप रहकर
भी बहुत कुछ कह गई।
तमाम लोगों से जैसे कह गई
तमाशा बनाते बहुत देखा है इन आँखों ने
हैवानियत के हथे जाने कितनी बेटी बलि चढ़ी।
और उसमें एक मैं भी शामिल हो गई।
उसकी दर्द भरी मासूम सी आँखें जैसे कह रही हो,
है कोई ऐसा धर्म, मजहब ईश्वर कहो या अल्लाह
जो इंसान की हैवानियत जब जगती है
तो उस हैवानियत को खत्म कर सके
जवाब होगा शायद नहीं।
फिर चाहे जिसका राज हो क्या फर्क पड़ता है
उसकी मासूम सी दर्द भरी आँखें
मानव को मानव ही बने रहने का पाठ पढ़ा गई
और चुप रहकर भी बहुत कुछ
दानवों को भी जैसे कुछ सीखा गई।
रजनी अजीत सिंह 19.4.18

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हर घर में बेटी रूप में चंडी का अवतार होना चाहिए।

इस कलयुग में अब ऐसा चमत्कार होना चाहिए।
बेटी के रूप में अब हर घर में चंडी का अवतार होना चाहिए।
नारी ही दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती जरूरत पड़ने पर काली का अवतार है ये भान होना चाहिए।
न्याय न्याय सब चिल्ला रहे इसी न्याय बीच अन्याय भी है न्यायी और अन्यायी की पहचान होना चाहिए।
अबला अबला कहकहकरके नारी की शक्ति न आंकी है यदि नारी जागी और सबल हुई है तो अब राक्षसों का संहार होना चाहिए।
रजनी अजीत सिंह 18.4.18
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बेरोजगार।

ये आज कल मसरूफ़ियत भी अजीब सी हो गयी है हम लोगों को. काम कुछ न भी हो तो भी बिज़ी रहते हैं। ज़रा पड़ताल तो करें।

Collab करें -YQ Didi के साथ।

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बेरोजगार हैं मगर फुर्सत नहीं है हमे क्यों
कि कुछ कर गुजरने की चाहत है बेरोजगारी ने हमारे सपनों को छिना है पर हौसला बुलंद है कि हमें कुछ कर दिखाना है।
रोजगार पाकर भी हर क्षेत्र में राजनीति खेलने से लोगों को फुर्सत नहीं।
और हमें दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए कोशिश करने से फुर्सत नहीं।
रास्ते में लाख बाधाएं आये पर मंजिल को पाना है।
चिलचिलाती धूप हो,घनघोर बरसात हो, आंधी हो या तुफान हो हम बेरोजगारों को रोटी का जुगाड़ करने से फुर्सत नहीं।
अमीरों को हर महंगी वस्तु खरीदने से फुर्सत नहीं और गरीबी ओ चीज है जिसे जरूरत के समान की तरफ भी देखने की फुर्सत नहीं क्यों कि मेहन कर पेट पाल ले वही बड़ी बात है।
रजनी अजीत सिंह 16.4.18

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जिंदगी में कुछ अनकही सी बातों की यादें।

हर रोज अपने काम को खत्म कर तेरी यादों के झुरमुट में और कुछ अनकही सी बातों से परेशान हो जाती हूँ।
मैं तो बहुत कुछ कह जाती हूँ लेखनी से अपने दर्द को पर तुम्हें क्या दर्द है कभी बताने की कोशिश ही नहीं की और जितना मैं जानती हूँ वो बर्बाद दुनिया की वजह नहीं बन सकती।
मेरी लेखनी से निकले शब्द तो कितने को काल्पनिक तो कितनो को अपनी कहानी लगी। पर सच कहूँ तेरे शब्द मुझे बहुत घाव देते हैं बस यूँ समझ लो कहना भी मुश्किल और चुप रहना भी मुश्किल इस मुश्किल वक्त में क्या अपने कुछ शब्दों से मरहम लगा पाओगे। किसी ने क्या खूब मुहावरा बनाया है- भई गति सांप छुछुन्दर केरी उगलत बने न निगलत केरी।
इस गति से क्या मुझे निजात दिलाने की कोशिश करोगे या बस बड़ी बड़ी बातें करके दर्द को बढ़ाते ही जाओगे। मैंने इस हाल में भी मुस्कुराना सीख लिया है क्या जिंदगी में कुछ और भी सीखना हो तोड़ने सीखा जाना क्यों कि तेरी” रात “बहुत भोली है कुछ समझती नहीं कुछ समझती है तो सबकी खुशी के लिए अपनी खुशियों की बलि जो चढ़ाना सीख लिया है। जब-जब जी आँखों से गंगा की धारा बहने वाली होती है तो शब्दों को जोड़ने की कोशिश करती हूं ताकि दर्द को भूला सकूं। मैं क्या हर लिखने वाला यही करता है जब कुछ कर नहीं पाता तो शब्दों से ही
दर्द ब्यां कर जाता है चाहे समाज का हो या फिर अपना।
रजनी अजीत सिंह 15.4.18
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जिंदगी खामोश।

यदि मैं खामोश हो गई तो क्या मेरी नादान सी बातों को कभी भूला पाओगे।
जितना दर्द हमने सहा है खामोश होकर क्या मेरा दर्द महसूस कभी कर पाओगे?
जानती हूँ तेरे जिंदगी में मेरी बातों का कोई अहमियत नहीं, मैं न सही मेरी बातें तुम्हारे साथ है झूठा ही सही क्या ये एहसास करा पाओगे।
मैं फिक्र करती हूं तो थोड़ी सी तुम भी कर लिया करो क्या इतनी सी खुशी मुझे दे पाओगे।
अपनी जिंदगी में मैं भी बहुत बीजी हूँ पर रिश्तों में प्यार जताने या फिक्र करने के लिए बीजी लाइफ से कोई वास्ता है क्या मुझे इतना समझा पाओगे।
रजनी अजीत सिंह
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जिंदगी में बारिश की उपमा।

ज़िंदगी बेचारगी नही है
ज़िंदगी आवरगी नही है
जीना है तो खुल के जियो
ये मिलती दुबारा नही है
💝Open for Collab💝
#अनदेखाकरते
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Manisha Gurjar Ranju Jaiswal #YourQuoteAndMine
Collaborating with Sanjay Chaudhary
जिंदगी के मेरे बहते आँसू, बारिश की बौछार सी है।
अपने चाहने वालों ने देखा तो मोती की उपमा हो गई।
पराये रूपी पत्थर के लोगों ने देखा तो पानी की उपमा हो गई।
तुमसे मिली एहसास ने समझा तो ये आँसू नदी की उपमा हो गई।
जब प्यार करने वाले ने देखा तो हर सवाल का जवाब और खून की आँसू की उपमा हो गई।
ता उम्र तरसती रही प्यार रुपी मंजिल को। जब खुद के गिरते आँसू को समझा तो जीने की वजह और हमराज हो गई।
रजनी अजीत सिंह 10.4.18

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