जिदंगी में “मेरा हमराह”

कभी – कभी मैं खो जाती हूँ चुपके से तेरे ख्यालों में।
तो यकीन नहीं होता कि ईश्वर ने तुम्हें मेरे लिए बनाया है।
तुम्हारा आकर्षक व्यक्तित्व, तुम्ही सवेंदनशीलता,खुशियों को बिखेरती तुम्हारी मजेदार बातें,
सबकुछ दोहराता है दिल अकेले में,
तब मुश्किल से विश्वास होता है कि मुझे अजनबी चेहरों के इस भीड़ में,
मेरी माँ ने तुम्हें तलाशा है मेरे लिए जिंदगी के सफर का हमराह……
कभी कभी जिंदगी जब यादों के सफर में खो जाता है, तो याद आता है वो बीता पल।
जब पहले पहल हमने जाना था एक दूसरे को….
दिल में एक हलचल सी पैदा होती है…
और छा जाता है जिंदगी के सफर में खुशियाँ ही खुशियाँ….
और मिल जाता है जिंदगी को खुशी से जीने का हसीन वजह और तेरा सम्बल रुपी सहारा….
रजनी अजीत सिंह 20.9.18
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जिंदगी में “सवाल और जवाब”

कुछ सवाल मैं अपने आप से करना चाहती हूँ।
तेरी खामोशी से परेशान हो जवाब भी खुद ही ढूंढना चाहती हूँ।
क्यों इतना प्यार दे हक जताया, क्यों सोयी चेतना को फिर से जगाया?
क्यों मेरे अंधेरे जीवन में रौशनी फैलया?
जब पढ़ना ही नहीं था मेरे जिदंगी के एहसास को, तो क्यों लिखने का विश्वास जगाया।
पल में रोना पल में हँसना मेरी आदत थी फिर तुमने मेरी मुस्कान को अपने खुशी की वजह क्यों बनाया?
अब मैं अपने आपके सवालों से बिखर रही हूँ।
पर जवाब न पाने से मैं परेशान हो घूट रही हूँ।
जिंदगी इसी का नाम है साहब जो मैं सब भूलकर आगे बढ़ रही हूँ।
सब कुछ हारकर भी जिंदगी मेरी बेहतर है इस एहसास के साथ खुशी से जी रही हूँ।
रजनी अजीत सिंह 16.9.18
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हिंदी दिवस

न पोयम बनाती हूँ न स्टोरी सुनाती हूँ,
आज हिंदी दिवस पर थोड़ा सा कविता बनाती हूँ और कहानी सुनाती हूँ।
न अंग्रेज हूँ कि अंग्रेजी है मुझे आती, न फ़ास की रहने वाली की फे़च है आती।
हम हिन्दुस्तानी ठहरे अच्छे से हिन्दी लिख, पढ़ और बोल लेते हैं।
आजकल हिन्दुस्तान भी इंग्लिश बोलने के खातिर मशहूर है होता।
कोई इंग्लिश को अपनी गर्लफ्रेंड बना लेता। मैं ठहरी हिन्दुस्तानी हिन्दी को माँ बना लेती।
अंग्रेजों की हुकूमत अंग्रेजी भाषा बोलने सीखाना था।
मगर मुझे हिन्दुस्तान में हिन्दी मशहूर हो कैसे ये सीखना सीखाना है।
मेरे हिन्दुस्तान की गलियों गलियों में तमन्ना है हिन्दी बने सबकी मातृ भाषा।
मगर भारतीय तो ऐसे हैं जो इंग्लिश बोलना सीखता सीखलाता है।
सजा कितनी बड़ी मिली गांव शहर से बाहर निकलने की।
मेरी माँ हिन्दी सीखाती थी अब मैं बच्चों से इंग्लिश पढती और सीखती सिखाती हूँ।
हिन्दी दिवस पर चन्द घंटों के खातिर इंग्लिश पर हिन्दी भारी है पड़ती।
मैं तो देखती हर रोज भारतीयों को अपनी संस्कृति और खाना भी नहीं भाता।
भारतीय अपने बच्चों को पाश्चात्य संस्कृति और पीजा, वर्गर और चाइनीज खाना खाने है सिखाता।
बस इतना सा इल्तिजा है हिंदुस्तानी लोगों से की हिन्दुस्तान से मुझे इंग्लिशतान न करना।
हर हिन्दुस्तानी को गर्व से हिन्दुस्तानी होने का पाठ पढाती हूँ।
रजनी अजीत सिंह 14.9.18

जिदंगी में “सुहाग की निशानी”

माथे की बिंदी मांगो का सिन्दूर,

हाथों की चूड़ियाँ पैरो की पायल।

क्या ये मात्र सुहाग की निशानी है।

नहीं ये सब प्यार के निशानी है जो,

प्यार के अटूट बंधन में बांधती है।

रजनी अजीत सिंह 12.9.18
तीज की हार्दिक शुभकामनाएं

जिदंगी में “चेहरे की चमक”

छीन ली थी दुनिया ने मेरे चेहरे की चमक,
और उपहार दिया था बनावटी हंसी दौलत से खरीदकर।
पर सबको क्या पता खुशी, चैन, सकूंन और चेहरे की चमक दौलत से नहीं,
ब्लकि अपनत्व के एहसास रुपी दो शब्दों से ही चेहरों पर खुशी बन छा जाता है,
और हमेशा के लिए अपना सुखद एहसास छोड़ जाता है।
रजनी अजीत सिंह 9.9.18

जिंदगी में “हाल मन का”

सच अजीब हाल है मन का भी,
सबकुछ कह देने के बाद भी,
ये मन असमंजस में रहता है।
हर हाल का जिक्र मन तुमसे करने को कहता है।
मन कहता है खो जाऊँ अतीत की परछाइयों में।
जब तुम्हारे अनोखे रिश्तों का खिस्सा लेकर सोचती हूँ
तो मेरा मन हँस पड़ता है।
जो बात न करूं तो मेरी विवशता आँसू बन बहने लगता है।
मेरी यादें, वादे, सपने, ख्वाहिशें, गिला, शिकवा – शिकायत,
सब प्यार के एहसास के आगे अर्थहिन लगने लगता है।
और अगले पल दूर होकर भी पास होने का अपनापन महसूस करने लगती हूँ।
अधूरी बातें, अधूरा परिचय, सब कुछ ब्यां कर जाने का अधूरा प्यार का एहसास,
इन आँखों के सकून के लिए ये मन जाने कहाँ कहाँ भागता है
और ये मन आँखों को भा जाने वाला जाने क्या क्या सपना दिखाता है।
सच अजीब हाल है मन का भी,
सब कुछ कह देने के बाद भी ये मन असमंजस में रहता है।
रजनी अजीत सिंह 5.9.18
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जिदंगी में “कुछ सवाल”

कुछ सवाल मैं अपने आप से करना चाहती हूँ।
तेरी खामोशी से परेशान हो जवाब भी खुद ही ढूंढना चाहती हूँ।
क्यों इतना अपनापन दे हक जताया, क्यों खोयी चेतना को फिर से जगाया?
क्यों मेरे अँधेरे जीवन में रौशनी फैलाया?
कहीं डायरी में शब्द सीमट रह गया होता तो अच्छा होता।
जब पढ़ना ही नहीं था जिदंगी के एहसास को,तो क्यों लिखने का विश्वास जगाया।
अब मैं अपने आप के सवालों से विखर रही हूँ।
सवाल का जवाब तुझसे पूछना चाहती हूँ, पर सवाल का जवाब न पाने से घूट – घूट कर जी रही हूँ।
कहना तो बहुत कुछ चाहती हूँ तुझसे, पर बेबस ओठों को सी रही हूँ।
क्यों ऐसा विश्वास है मन में कि एक फरिश्ता फिर इन ओठों पर खुशी के गीत सजा जायेगा।
रजनी अजीत सिंह 7.9.18
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जिंदगी में “सोच रही थी बैठ अकेली”

सोच रही मैं बैठ अकेली, कितना जीवन में सुख – दुःख झेली।
खुशियों के बीते पल से मैं उर के छाले सहलाती हूँ।
मैं अपना मन बहलाती हूँ!
नहीं खोजती मीठे बोल के मरहम,धीरज धर धर मैं बन गई कुछ निर्मम।
अपने उर के घावों को नैनो के जल से नहलाती हूँ।
मैं अपना मन बहलाती हूँ!
सह – सह कर जब आहत होती, तब मन से आह निकल जाती है।
मानुष का वो निर्मम छाती, तब क्यों नहीं फट जाती है।
मैं अपना मन बहलाती हूँ!
थक हार माँ के चरणों में, कुछ आस लगा गिर जाती हूँ।
अपने मन के दुर्बलता को फिर से सबल बनाती हूँ।
मैं अपना मन बहलाती हूँ!
रजनी अजित सिंह 14.8.18
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जिंदगी में “हाँ ये सच है”

हाँ ये सच है कि मैं तुम्हें एक पल के लिए भी भूलना नहीं चाहती हूँ।
तुम्हारी और अपनी खुशी के लिए तुम्हें अपनी बातों से पकाती हूँ।
पर यह भी सच है जब मैं तुमसे बात न करने की हठ करती हूँ तो मैं अपने आप को सताती हूँ।
सोना तपता है तब कुंदन बनता है यही सोच हौसला रख अपने होठों पर मुस्कान बिखेर अपना मन बहलाती हूँ।
हाँ सच है कि मैं नशा करती हूँ, सारे नशा में मुझे सबसे बड़ा नशा लेखनी से शब्दों को खेल खेलकर लिखने का है, जो लिखकर हर जख्म को सहलाती हूँ।
हाँ सच है कि मैं इस काबिल भी न थी कि मैं अपने आप को दुनिया के लिए लिख पाती, पर माँ ने धुव्र सा अटल तारा का मिलन चाँद से करवाया, मैं उस तारे को अपने शब्दों से संदेश पहुँचाती हूँ।
हाँ सच है कि शतरंज की चाल सा जिंदगी में मुझे जब सब मात देते थे तब मुझे बहुत गुस्सा आता था, पर तुम्हारा प्रोत्साहन भरे दो शब्दों का जब साथ होता था तो मैं न जाने कैसे शांत हो जाती थी। और सबकुछ भुलाकर दुश्मनों का भी भला करने के लिए आगे बढ़ जाती थी।
हां सच है कि मेरा कोई सच्चा दोस्त नहीं था जो मुझे समझ सके, सब अपने मतलब के लिए दोस्ती करते थे। मुझे अब खुशी देने के बहाने दर्द देने वाले रिश्तों की जरूरत नहीं क्यों कि मेरे सारे रिश्ते मेरे प्यार के एहसास से जुड़ गए जिससे मैं खुश हो जाती हूँ।
रजनी अजीत सिंह 4.9.18
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