जिंदगी में “हसीन वादियाँ”

हसीन वादियों में वो सबका साथ बहुत ही मन को लुभाते हैं।
वो साथ, वो बातें, वो तकरार, वो प्यार, भुलाने से भी नहीं भूला पाते हैं।
यही जिंदगी है हर हाल में खुशियाँ ही खुशियाँ पा जाते हैं।
वो पहाड़ के शिखर पर बादल का आ जाना।
कहीं बरस जाना कहीं उड़ जाना।
ठीक मन की भावनाओं जैसा लगता है ये बादल।
रजनी अजित सिंह 16.6.18

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वाराणसी से हिमाचल की यात्रा ।

गर्मि की छुट्टियाँ चल रही थी। गर्मी के मौसम में गर्मी तो पड़ती ही है सो हम लोगों ने घूमने का प्लान बनाया जहां ठंडा मौसम हो। तो हम लोगों ने हिमाचल का प्लान बनाया। हिमाचल की राजधानी शिमला है। सो हम लोग 9 लोगों का प्लान बना। 13.6.18 को वाराणसी से बाई प्लेन का टिकट था। वाराणसी से छे लोगों जाना था जिसमें माँ – पापा, हम दो और हमारे दो बच्चों को वाराणसी से जाना था 13 तारीख को जब दिल्ली पहुंचे तो वहां से बाई रोड जाना था।तो एक गाड़ी क्रेटा जो बड़ा भाई चला रहा था और दूसरी लैंड रोवर छोटा भाई चला रहा था जिसे बड़ा भाई ने 10जून को पापा के मैरिज एनवर्सरी पर गिफ्ट किया था। सो दिल्ली से बड़ा भाई – भाभी और छोटा भाई और हम सभी चल पड़े हिमाचल की ओर एक रात हम लोगों ने चंडीगढ़ में बिताया फिर हिमाचल में मीना बाग रतनारी काटेज में रूकना तय हुआ था सो हम लोग वहां पहुंचे। चूकी हमारी मदर को स्लिप डिस्क था सो पहाड़ी रास्ता और ऊंचाई को देखकर सब लोगों का चिंता का विषय बन गया कि माँ ऊपर कैसे चढ़ेगी। पर कहा जाता है न की जहां चाह वहां राह। मां ने भी हिम्मत किया और दोनों उनके बेटे श्रवन की तरह एक हाथ पकड़ कर चल रहा था और दूसरा हर कदम पर जहां ऊंची ऊंची सीढ़ी और रास्ते थे वहां पीढ़े के माध्यम से चढ़ाया और उतारा भी। जब माँ ऊपर चढ़ गयी तब सबके जान में जान आयी। इसी बीच माँ ने बीच बीच में सबको डांट भी लगाया।

जब हम ऊपर पहुंचे तो सबको जगह बहुत अच्छा लगा। लकड़ी से बने मकान थे जो मन को भा जाने वाला था। वहां सेव के बगीचे थे जिस पर फल लगे हुए थे जो पेड़ पर चार चाँद लगाये हुए थे। सारे पेड़ों को सफेद नेट से ढ़का गया था हम लोगों ने अनुमान लगाया कि धूप से बचने के लिए ढ़का गया है पर हम लोगों ने काटेज में जो खाना बनाता था उससे पूछा तो बताया कि ओला से बचाने के लिए ऐसा किया गया था। दूर से पिक लेने के बाद देखने में लगता था जैसे बर्फ पड़ा हो।

काटेज में पुराने पीतल के थाली और हंडे में होलकर इतने अच्छे से सजाया गया था और उसमें लाईट की भी व्यवस्था की गई थी की उसकी खूबसूरती देखने बनती थी।

माँ कोअपने पुराने दिन याद आ गया जब माँ पहले उसी बर्तन में खाना पकाया करती थी। माँ को सबसे पंसद आया कि उन्होंने पुरानी चीजों को कितना सहेजकर रखा है। हम लोगों के यहाँ लकड़ी के फर्नीचर बनाने में गढ़ाई का काम ज्यादा होता है पर वहां पेड़ के जड़ से, लकड़ी गुटके से डाईनींग टेबल, सोफे, और सारे फर्नीचर बने थे। जो छोटे छोटे गुटके जो हम लोग बेकार समझ फेक या जला देते हैं उससे से भी लकड़ी के ट्रे बने हुए थे उसके ओरिजनल खुबसूरती के क्या कहने थे। हम लोगों ने फेमिली के साथ खूब इंजॉय किया। बेडमींटन, तमोला, कैरम तास वैगरह खूब गेम खेला। परिवार के साथ बिताए लम्हे कितने हसीन होते हैं उसका वर्णन नहीं कर सकती।
रजनी अजित सिंह 14.6.18

जिंदगी में “ईद मुबारक हो ।

ईद की खुशियां ईद मनाने वाले जाने और न जाने कोई।

हम तो जाने बस इतना ही ईद गले मिलना और मिलाना।

सेवईयां खा मुँह मीठा कर हिन्दू मुस्लिम भाई भाई कहलाना।

देखो इस रिश्तों को आप निभाना,भोजन बुला के हमें खिलाना, ईद का चाँद मत हो जाना।

ढेर सारी शुभकामनाएं के साथ ईद मुबारक हो।
रजनी अजित सिंह 15.6.18
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जिंदगी में बचपन की यादें।

इन हसीन वादियों में भी तेरे बचपन का साथ भी आज बहुत रुला गई।
आज खाली बैठी तो तेरी बचपन से लेकर आज तक सारी यादें तड़पा गई।
कोई क्यों इतना दूर होकर भी पास का एहसास दे जाता है। कोई पास होकर भी दूर हो जाता है।
तेरे कहे अनुसार चुपरहकर हर दर्द को छुपाना भी सीख लिया।
बस नहीं सीखा तो आँखों के उमड़ते सागर को रोकना।
इतनी खता तेरी यादें आने पर हो ही जाती है।
सोचने से क्या होता है होता वही है जो मंजुरे खुदा होता है।
रजनी अजीत सिंह। 14.6.18

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जिंदगी में जन्मदिन की बधाई।

आज के दिन से हर खुशी तेरे जीवन में आए।
चाँदनी लेकर ये रात सुहानी आए।
मेरी दुंआ है आपके जिंदगी में हर खुशीयों की सौगात आए।
मेरी बातें और मेरे प्यार भरे एहसास
हर रात आपको लोरी गाके सुलाए।
ये बँधन इतने प्यारे और मीठे हो
की आप सोते हुए भी सदा मुस्कुराएं।
आँख खुले तो कोयल की मीठी कूक सी
मेरे शब्दों की गूँज तेरे कानो में जाए।
“रजनी” का जन्म दिन की बधाई हो जब ऐसा संदेशा जाए।
तो आप सदा ही फूलों की तरह खिल खिला मुस्कुराएं।

रूचि जन्म दिन की बहुत बहुत मुबारक हो।
रजनी अजीत सिंह 12.6.18

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जिंदगी में “सच्ची मुहब्बत”

सच्ची मुहब्बत को हमेशा कुछ न कुछ मिलता है।
मीरा को मोहन के साथ का हमेशा होने का एहसास मिलता है।
राधे को श्याम से पहले राधे श्याम नाम का होने के साथ का एहसास मिलता है।
मुझे सबके खुशियों में खुश होने का सदा एहसास मिलता है।
रजनी अजीत सिंह 11.6.18
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जिंदगी में “प्यार हर रिश्तों में”

प्यार कहते हैं किसे ये कहना मुश्किल है।
सदियों से प्यार हर रिश्तों में पाया है हमने।
कहीं जननी – सूत का प्यार तो कहीं भाई बहन का प्यार
या यूं समझे की हर रिश्तों में प्यार।
मगर प्रेमी – प्रेमिका तक सीमित कर छोड़ा है सबने।
कोई कहता प्यार क्या है?
कोई कहता ये प्यार का एहसास क्या है?
कोई कहता जज्बात और रिश्तों का भाव क्या है?
मैं इन सारे सवालों का जवाब एक ही देकर कहती हूँ।
हर रिश्ते को प्यार से निभाने की कला ही सच्चा प्यार और
खूबसूरत प्यार का एहसास है।
कृष्ण का यशोदा नंद के के प्रति सुखद एहसास भी प्यार ही था।
कृष्ण का सुभद्रा और द्रोपदी के प्रति सुखद रिश्तों का आभास भी प्यार ही था।
रुक्मिणी और राधा के प्रति अनुराग भी प्यार ही था।
मानती हूँ हर प्यार का अपना एक जगह है पर नाम और एहसास तो प्यार ही था।
जिस प्यार में त्याग और समर्पण एक दूसरे के खुशी के लिए पनपता है
सही मायने में प्यार उसी का नाम है।
रजनी अजीत सिंह 8.6.18
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जिंदगी में “प्यार की कद्र क्या?

खड़ा किया जिसने पर्वत जैसा वर्षों और सदियों से तुफान के बीच अडिग प्यार को।
प्यार की कसौटी पर जांचा है जिसने संघर्षों के बीच भंवर में।
प्यार ने आज ललकारा है उन तजुर्बे को।
जहाँ प्यार की शाख झुकी नहीं वक्त के मंसूबों से।
प्यार की गठरी उठाये फिरती हूँ बाजारों में।
ऐसा अटूट सच्चा प्रेम देख लाज आ जाये आज के जवानों को।
जो निभाता था, गुर्राता था प्यार के एहसास न होने पर भी तूफानों में।
आज कांप रहा है एक प्यार भरे सच्चे रिश्ते को निभाने में।
कोई प्यार निभा दिया या प्यार तोड़ दिया
बीच रास्ते छोड़कर।
हमने रास्ता बना दिया प्यार में नया रिस्ता जोड़कर।
अब मैं तजुर्बे के उन आँखों से पूछती हूँ जिसने तेरी आँखों में प्यार का एहसास देखा था।
वो एहसास जिंदगी के हर मोड़ पर पूछेगी
बता तेरी नजरों में कद्र क्या थी मेरी?
कद्र क्या थी मेरी?
रजनी अजीत सिंह 6.6.18
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जिंदगी में “स्वाभिमान”

झुकने की आदत इसलिए डाला ताकि अंहम न आ जाये।
पर झुकते झुकते अब दिल डरता है कि झुकने की आदत से कहीं स्वाभिमान न चला जाये।
सुना तो है फल लगने पर डाली का झुकना प्रवृत्ति है।
पर ये आँखें जो करीब से देखती है कि ज्यादा फल लगने से बिना सहारा की डाली टूट जाती है।
रजनी अजीत सिंह 7.6.18
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जिंदगी में आनलाइन रहने की तरक्की।

उसके बातों का शिलशिला विल्कुल चाँद सितारों जैसा लगता है।
दिन में सोचो तो धुंधला सा आफलाइन होने जैसा लगता है।
रात में सोचो तो चमकीला सा आनलाइन होने जैसा लगता है।
अब तो लगता है अमेरिका और भारत में दिन रात का कोई फर्क ही नहीं क्यों कि भारत ने भी रात को जगकरआनलाइन रहने की तरक्की कर ली है।
😁रजनी अजीत सिंह 😁
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