माँ की ममता बोल पड़ी 26.6.17समय9.30 pm

माँ की ममता बोल पड़ी, शब्दों से रस ये  घोल चली। 

सब कुछ तोड़ो नेह न तोड़ो तुम माँ का स्नेह न छोड़ो।

नेह का धागा होय कमजोर, खींचने से टूट जाय रे। 

एक बार टूट जाय तो, फिर कभी न जुड़ पाय, जो जुड़े गांठ पड़ जाय रे। 

ओ शब्दों की माला मेरा ये सन्देश पहूंचावो रे। 

तुम मोती मैं धागा ये बात समझ अब जावो रे। 

इस मोती की कीमत तब  जब धागा से जुड़े और माला बन जाय रे। 

पोथी पढ़ पढ़,  लिख-लिख शोर मचाये, 

ढाई अक्षर प्रेम का ना पढ़ पाय रे। 

मान सम्मान देने  की बात ही छोड़ो, 

माँ की बात समझ भी ना पाये, बस थोड़ा सा झुक जोवो रे। 

माँ की ममता बोल पड़ी शब्दों से रस ये घोल चली।  

 🌺🌺🌺🌺रजनी सिंह 🌺🌺🌺🌺

ये हमने WhatsApp पर पढ़ा जो मुझे ज्ञान से भरा हुआ लगा जिसे मैं आप से लिखकर सांझा करती हूं। 

*तेरी बुराइयों* को हर *अख़बार* कहता है,

और तू मेरे *गांव* को *गँवार* कहता है   //
*ऐ शहर* मुझे तेरी *औक़ात* पता है  //

तू *चुल्लू भर पानी* को भी *वाटर पार्क* कहता है  //
*थक*  गया है हर *शख़्स* काम करते करते  //

तू इसे *अमीरी* का *बाज़ार* कहता है।
*गांव*  चलो *वक्त ही वक्त*  है सबके पास  !!

तेरी सारी *फ़ुर्सत* तेरा *इतवार* कहता है //
*मौन*  होकर *फोन* पर *रिश्ते* निभाए जा रहे हैं  //

तू इस *मशीनी दौर*  को *परिवार* कहता है //
जिनकी *सेवा* में *खपा*  देते थे जीवन सारा,

तू उन *माँ बाप*  को अब *भार* कहता है  //
*वो* मिलने आते थे तो *कलेजा* साथ लाते थे,

तू *दस्तूर*  निभाने को *रिश्तेदार* कहता है //
बड़े-बड़े *मसले* हल करती थी *पंचायतें* //

तु  अंधी *भ्रष्ट दलीलों* को *दरबार*  कहता है //
बैठ जाते थे *अपने पराये* सब *बैलगाडी* में  //

पूरा *परिवार*  भी न बैठ पाये उसे तू *कार* कहता है  //
अब *बच्चे* भी *बड़ों* का *अदब* भूल बैठे हैं // 

तू इस *नये दौर*  को *संस्कार* कहता है  *….🙏🏻….//*

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          “कर्म” एक ऐसा रेस्टोरेंट है ,

               जहाँ ऑर्डर देने की 

                  जरुरत नहीं है 

             हमें वही मिलता है जो 

                 हमने पकाया है।

          

            जिंदगी की बैंक में जब 

             ” प्यार ” का ” बैलेंस ” 

                 कम हो जाता है 

             तब ” हंसी-खुशी ” के

           चेक बाउंस होने लगते हैं।
                 इसलिए हमेशा 

                 अपनों के साथ 

           नज़दीकियां बनाए रखिए ।

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  जिंदगी पहेली 25.6.17( समय 1.30 pm) 

जिंदगी एक पहेली है, 

दुःख भी एक सहेली है। 

कांटो के संग पली है, 

फूल बन खिली है। 

माँ के यादों के बीच, 

आशा – निराशा के झूलों में झूली है। 

उन्ही के संस्कारों को लोरी समझ, 

दूसरे को खुशी दे, भावनाओं में बह चढ़ी सूली है। 

अपने तो सुख के साथी हैं, 

सुना है “रात “के साथी चाँद तारे हैं। 

कितनों के साथी कविता और लेखनी है। 

पर “रजनी” के साथी माँ के संस्कार, 

विचार और यादें हैं, जिनके साथ जीना है। 

इनके संस्कारों के साथ मौत भी जिंदगी है। 

इनके संस्कार को भूल सुख में  न जीना है।

दूजे के सुख के लिए ओठों को सीना है। 

माँ के संस्कारों के बीच ऐसे ही जीना है। 

             माँ  की अपनी 

                  रजनी सिंह 



ईद 25.6.17


ईद की खुशियां ईद मनाने वाले जाने और न  न जाने  कोई।

 हम तो जाने बस इतना ही ईद गले  मिलना और मिलाना। 

 सेवईयां खा मुँह मीठा कर हिन्दू मुस्लिम भाई भाई कहलाना।  

देखो इस रिश्तों को आप निभाना,भोजन बुला के हमें खिलाना,   ईद का चाँद मत हो जाना। 

                 ढेर सारी शुभकामनाएं के साथ ईद मुबारक हो। 

                   रजनी सिंह 

     भ़मित (confused) 

भ़मित रहत मन चैन न पाए, 

किस्मत रुलाये पर मन ना रो पाये। 

कौन मेरा अपना जिसके लिए रोऊं। 

संसार में सबका दाम लगा हुआ है। 

जो जब चाहे कीमत देके ले जाता है। 

पर न मुझे कीमत देने का न लेने का शौक ही नहीं। 

जो प्यार से और शब्दों से न बाँधा जा सके। 

बस स्वार्थ में प्यार से और शब्दों से बाँधे।  

वैसे लोगों से और रिश्तों से मेरा कोई नाता नहीं। 

न आज है न कल रहेगा न कभी होगा। 

जिंदगी में बहुत कुछ मिलेगा और बहुत रिश्ता मिलेगा। 

लेकिन मेरे जैसा प्यार देने वाला भ़मित पागल दोबारा नसीब न होगा।

             (Confused ) भ़मित रजनी सिंह 😢

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                       अनकहा प्रेम

तू रोती जब मंजिल पाकर,मैं खोकर फिर रोता हूँ।

कुछ पाने की जिद थी तेरी
सफर बीच में छूट गया,
आँखों से सैलाब बहे पर,
तेरा दिल ना भीग सका,
तेरी दुनियाँ आसमान में, मैं धरती पर रहता हूँ,
तू रोती जब मंजिल पाकर,मैं खोकर फिर रोता हूँ।

आँखों में कई ख्वाब तुम्हारे,
मेरी आँखों में तुम थे,
तेरी मंजिल तुझे बुलाये,
मेरी मंजिल तो तुम थे,
तू भागी दिल साथ में भागा,तन्हां फिर भी हँसता हूँ,
तू रोती जब मंजिल पाकर,मैं खोकर फिर रोता हूँ।

खिली हुयी तेरी सूरत पर,
आज उदासी कैसी है,
कल तक सपने आँखों में थे,
आज बिरानी कैसी है,
बोल तुझे क्या गम है,जो भी पास मेरे मैं देता हूँ,
तू रोती क्यों मंजिल पाकर,मैं खोकर फिर रोता हूँ।

देर लगा दी तूने कितनी,
इतनी बात बताने में,
मैं थी पागल बोल सकी ना,
रोका ना तुम जाने में,
कहाँ है मंजिल कैसी दुनियाँ,बिन धागे की मोती हूँ,
मेरी दुनियाँ तुममे पगले, याद में तेरी रोती हूँ।

खुद को अब वो रोक ना पाये,
दो दिल साथ में गरज उठे,
एक डाल के बिछड़े पंक्षी,
एक दूजे में सिमट गए,
सावन की बरसात हुई आंसू से तन-मन धोता हूँ,
वो रोती बेजान लिपट,मैं जान को पाकर रोता हूँ।
!!!मधुसुदन!!! 

आज मन उदास और परेशान है तभी मुझे मधुसूदन जी की कविता पढ़ने को मिल गयी। जिसे अपने ब्लॉग पर डालने से न रोक पायी। 

 काव्य वास्तव में है क्या? (भाग-1)  23.5.17 

आज मैं महादेवी वर्मा की बुक सन्धिनी के कुछ अंश को बताना चाहूंगी। बहुत दिनों पहले का पढ़ा है कुछ त्रुटि हो तो क्षमा चाहूंगी। 

              महादेवीवर्मा मेरी  फेवरेट कवियित्री रही हैं इसलिए उनके अनुभव को लिखूंगी। और मेरा ज्ञान हर नये कवि  कवियित्री को समर्पित है जो यह नहीं समझ पाते कि काव्य का और उनके द्वारा लिखित कविता का पहले जैसा ही  महत्व है। कोई भी कवि या कवियित्री लिखने के साथ ही फेमस नहीं होते हैं उसके लिए वक्त चाहिए। 

  1.     पहले मैं बताती हूँ काव्य वास्तव में है क्या है? काव्य वास्तव में मानव के सुख दुःखात्मक संवेदनो ऐसी कथा हैं, जो उक्त संवेदनों को सम्पूर्ण परिवेश के  साथ दूसरी की अनुभूति का विषय बना देती है। किन्तु यह ग्रहण करने वाले बुद्धि की सहयोग की भी विशेष अपेक्षा रखता है। किसी विक्षिप्त व्यक्ति के सुख दुःखात्मक संवेदन उसी रुप में किसी दूसरे व्यक्तियों की अनुभूति का विषय नहीं बन पाते। क्यों कि संवेदन की सारी तीव्रता के साथ भी उसका बौद्धिक विघटन संवेदन की संश्लिष्टता को  विघटित कर देता है। परिणामस्वरूप उसके सुख दुःख से वांक्षित तादात्म्य न होने के कारण श्रोता या दर्शक या पढ़ने वालों के हृदय में सदा विपरीत भाव उदय हो जाते है यथा उसके हंसने पर करुणा रोने पर हंसी आ जाती है। 
  2. अब मैं बताती हूँ काव्य दूसरे अर्थ में क्या है? काव्य समुद्र की अतल गहराई से उठी हुई तरंग समुद्र के सतह से भी ऊपर उठ जाती है। उसके तटों की सीमाओं का भी उल्लंघन कर जाती है। परन्तु रहती वह समुद्र की ही है। काव्य की दृष्टि से दर्शन इन पूर्व रागों की कड़ियाँ काटता है, विज्ञान उनकी उपयोगिता अनुपयोगिता की परीक्षा करता है। परन्तु काव्य और अधिक गहरे स्नेहिल रंग चढ़ा कर हर कड़ी की आत्मीय स्वीकृति देता है। काव्य की पूर्णता  में अनेक पूर्व रागो का संस्कार प्रतिफलित होता है। 

समझने की दृष्टि से लेख थोड़ा बड़ा हो रहा है इसलिए अब काव्य की अनुभूति और कल्पना का काव्य में क्या स्थान है भाग-2 में  बताऊँगी।

 पेश है महादेवी वर्मा की कविता – – सन्धिनी महादेवी वर्मा द्वारा लिखी गई   पुस्तकों में से एक है। जिसकी कुछ पंक्तियाँ पेश है – 

इस एक बूँद आँसू में 

 चाहे सम़ाज्य बहा दो 

वरदानों की वर्षा से 

यह सूनापन विखरा दो। 

इछाओं के कम्पन से 

  सोता एकांत जगा दो, 

आशा की मुस्कराहट पर, 

मेरा नैराश्य लुटा दो। 

चाहे जर्जर तारों में, 

अपना मानस उलझा दो। 

इस पलकों के प्यालों में, 

सुख का आसव छलका दो, 

मेरे बिखरे प्राणों में 

सारी करुणा ढुलका दो, 

अपनी छोटी सीमा में 

अपना अस्तित्व मिटा दो। 

पर शेष नहीं होगी यह 

मरे प्राणो की क़ीडा, 

तुमको पीड़ा में ढूंढा, 

तुम में ढूढ़ूगी पीड़ा। 

                रजनी सिंह 

    जिंदगी में सन्देश 23.6.17

    प्रिये कहाँ सन्देश भेजूँ? 

    मैं प्यार का कैसे सन्देश भेजूँ? 

    एक सुध नहीं है प्यार के उनकी, 

    दूसरा प्यार है पहचान मनकी। 

    प्यार का उपहार दूँ या अश्रुकण अवशेष भेजूँ। 

    प्यार पथ के तुम विधाता, 

    प्यार ढूँढे प्यार को अपने। 

    अमर अपना प्यार है, 

    अब पूछने को क्या शेष भेजूँ? 

    नयन पथ से मिल स्वपन में, 

    प्यास में घुल, खिल प्यार में। 

    “रजनी “तुझ में खो गई सजन, 

    अब दूत को किस देश भेजूँ? 

    बस गया छवी रूप का धन, 

    खो गया घनसार कण बन। 

    प्रेम मिलन के देश में अब प्राण को किस देश भेजूँ? 

    लिख रहे अब प्रेम शब्द, पल पल का, 

    प्यार में मिटते श्वास चल के, 

    किस तरह अब प्यार लिख अब। 

    सहज करुणा की कथा सविशेष भेजूँ। 

                      रजनी सिंह