आँखों के आँसू मोती बन गये

कभी आँखों से आँसू यूँ ही बह जाया करते थे।

पर अतीत ने सबक सिखाया तो आँखों के आँसू बेशकीमती मोती बन गये।

कई रोगों ने लाइलाज केंसर का रुप धारण कर लिया।

जिसका इलाज किमो थैरेपी नहीं था बल्कि अपने ही अंगो का काटे जाने की बारी था।

ताकि आँखों का आँसू वेशकीमती मोती ही बना रहे आँखों का नीर नहीं।

इसलिये अपने कुटुम्ब रुपी कश्ती उफनते सिंधु मे उतर जाने दिया ।

क्या पता कि लहरों से टकराकर उस पार किनारा मिल जाये।

मैंने कुटुम्ब रुपी मरूभूमि को अकारण ही जल से सींचा।

सोचा शायद सूखा पौधा फिर से पल्लवित हो जायें।

मैंने एक अन्यायी से टकराकर दूसरे अन्यायी की सेवा निश्चल मन से किया।

क्या पता मुरझाए कुटुम्ब रूपी कली फिर से खिल जाये।

अपने से ज्यादा फर्ज और नियति पर भरोसा किया।

क्या पता मेरा संदेह क्षंण भर में क्षीण हो जाये।

मैंने सम्भावनाओं को विश्वास से बढ़कर तौला।

क्या पता आशाओं की चिंगारी रिश्तों का नया इतिहास रच दे।

हमेशा कुल देवी देवता के चरणों में सिर नवाया।

क्योंकि सालों से उसके चरणों के सिवा मुझसे मस्तक कहीं और न नवाया जाये।

फर्क देखो तेरे भक्ति के साक्षी कुल देवी देवता हैं।

लाखों की तैयारी मेरी थी वहां तेरे चहेतों ने हजारों में निपटाने का काम किया।

ये तो खुशीयों की बारात थी वाह रे फैसन प्यार की लाली चुनर भी न ओढ़ाया गया।

डर लगता है लोगों कहीं रुखसत के वक्त दो गज कफन भी नसीब न हो।

और इस मजबूरी को भी आजकल का फैसन न बनाया जाये।

रजनी अजीत सिंह 22.5.20.20

अपमान और न्याय

यू हीं अपमान का घूँट पी रहा हूँ,
मैं न्याय के लिए जी रहा हूँ।
टूटे फूटे घर में पड़ा हूँ,
अपने पाँव पर खड़ा हूँ।
छोटा होकर भी यकीनन,
हो चला तजुर्बे में बड़ा हूँ।
न्याय के लिए जी रहा हूँ,
यूं ही अपमान का घूँट पी रहा हूँ ।
अन्याय की एक दुनियां यहाँ है,
जुल्म करने से बाज आते कहाँ हैं।
दर्द भरे इस जिंदगी का,
खत्म होता नहीं राह जहाँ है।
बिच्छुओं सा वो डंक मारे,
राजा होकर रंक बना रे।
मैं न्याय के लिए जी रहा हूँ,
मैं अपमान का घूँट पी रहा हूँ ।
सच का जब अवाज उठाता हूँ,
अपनो के बीच असहाय पाता हूँ।
अपनो के हम इस जहाँ में,
दर्द की खुटियाँ गाड़ता हूँ।
सबका झूठ हम जानकर भी,
सच का दम ना भर पाता हूँ।
मैं न्याय के लिए जी रहा हूँ,
यूँ ही अपमान घूँट पी रहा हूँ ।
रजनी अजीत सिंह 5.5.2020

शब्दों का आइना

जो पास न आता था अपने संयुक्त परिवार के रिश्तों में अब सोसल प्लेट फार्म पर ग्रुप में रिस्तों को निभाने का जमाना है।
ऐसे लोग जो परिवार का कोई आ जाये तो घर में रहकर भी रोटी खिला न सके, अब मीठा बातों से आनलाइन होकर पेट भरने का आया जमाना है।
माना की हम अनाड़ी हैं हम पर ऐसे खिलाड़ियों से दूर रहने का आया जमाना है।
माना की बहुत जिम्मेदारियों का बोझ था नयी नवेली जब आई थी।
पढ़ाई भी जरूरी है बच्चे पीछे न रह जाएं एक कमरे में रहकर।
सच कहा तो एहसानों को भुला कर नाता तोड़ लिया सबसे ऐसे अपने मुँह मियां मिठ्ठू बनने वालों से मुझे टकराना है।
सफाई की फोबिया में किसी को भूखा सुला दो किसी को प्यासा।
भूख से बिलखते चोट खाये जो अपने से ही उसे खिलाकर हँसाने का ये मेरा हुनर पुराना है।
ऐसे लोगों की बातों से चिढ़ाकर कमजोर करने से मेरा हौसला टूट नहीं सकता।
हौसला रखने वालों की कभी हार नहीं होती ये कविता मेरा लिखा पुराना है।
विजय पताका मुझे लहराते जाना है।
कोई जो आ जाये मुझे उसे खाना बनाकर खिलाना है।
जो मां बाप को भी सताने से बाज नहीं आते उससे भी इंसानियत का नाता निभाना है।
कैसे सेवा में गुजारे वो दिन हमने बच्चों के मुँह का निवाला छिनकर,
क्या बताऊँ गुजरे दिनों की कहानी हर कदम कदम पर सबका एक फसाना है।
अरे सोसल प्लेट फार्म पर रिस्तें निभाने वाले।
जीत हमारी होगी क्योंकि हमने अपने कुल और कुटुम्ब का साथ निभाया है।
अब तुमसे सामाजिक दूरी बनाकर तुझ जैसा कोरोना जैसे महामारी को हराने का आया जमाना है।
मतभेद मिटाया हमने अपने संस्कारों को निभा कुटुम्ब में एकता लाने के खातिर।
खून से जो सींचा था उस बाप को भी छोड़ दिया दूसरे के सहारे पर।
गलतियां जो की तुम लोगों ने हमें उनको न भुलाना है।
ये भारतीय संस्कृति का न्याय है तेरे बच्चे भी तुम्हें उसी जगह पर लाना है।
तूझे नहीं तेरे गुरुर को मिटा देंगे हमने ये आज ठाना है।
हम दम्पति मिलकर करेंगे प्रयास कह रही “रजनी” फिर से कुटुम्ब रुपी गुलिस्ताँ को फूलो से सजाना है।
सीता का लक्ष्मण जैसे देवर से ही सूर्पनखा का कान नाक कटवाना है।
रजनी अजीत सिंह 27.4.2020

कोरोना दहसत और धरती की सुंदरता।

ओ दिनचर्या मेरी कहाँ गयी जिम्मेदारियां तेरी।

तेरे करोना के दहसत से वो दिनचर्या खो सी गई।

वो भागमभाग की जिंदगी और दहसत में भी धरती को देखने का मजा लुभाती है मुझे।

वो सुबह सुबह उठकर न चाहते हुए भी मशीनी संसाधनों के बीच खो गया था वो खुशनुमा पल।

जो सीने पर कहीं न कहीं छुपकर अंदर ही अंदर कृपाण चलाती थी दिनचर्या के बीच।

अब धरती के गोद में बैठकर ओ सुहानी हवा, पक्षियों का सुबह शाम कलरव अक्सर मेरे हृदय को भा जाती है।

और न चाह कर भी मेरी लेखनी पन्नो पर शब्दों से घसीटती है कुछ बताने के लिए।

तेरे विज्ञान के निर्माण ने हौले-हौले करके सैलाब सा ला दिया है जग में।

पर मेरी जिह्वा कोरोना के दहसत में भी उससे गुफ्तगू करते हुए जिंदगी पानी के धारा में मीन की तरह उछाह से भर जाती है।

वो चहचहाती चिड़िया, वो फुदकती गिलहरियों का पेड़ पर बार बार चढ़ना उतरना जैसे बहुत कुछ कह रही हो इकरार में।

मेरी आँखे झुक जाती है कोरोना के दहसत के बाद भी प्रकृति के द्वारा संदेश दे जाना उसका, जो जाने कितनों को खा जाया करता है रोज।

आधुनिकता के धर्म के कोंण में आज तेरी क्रूर मुस्कान का तांडव सहमे सहमें देखती हूँ।

बस सबक सीखने के लिए इतना दिन स्वागत किया तेरा घर में रहकर भारतीय संस्कृति अनुसार।

अब सुधर जायेंगे सुधरने वाले मेरा निवेदन है अब तू भारत से मुँह मोड़ ले।

अब थक गयी घर में रहकर अभी तक बुहान से आये अतिथि समझकर स्वागत करते करते।

ऐसा न हो मैं भी तेरे कक्रूर हँसी से तुझे सबक सिखलाऊं तेरा सम्मान भूलकर।

इसलिए अब भारत के खातिरदारी का दुरुपयोग कर संस्कारों का परीक्षा न ले।

दो चार दिन ही अतिथि देवो भवः अच्छा लगता है।

नहीं जाओगे तो अभी नौरात्रि में दुर्गा रुप का सत्कार देखा है। अब चंडी रुप का संघारे भी देखेगा।

रजनी अजीत सिंह २३,४,२०,२०

कोरोना वायरस

जीतेंगे इस बार भी संक्रामक से जंग।
हिंदू – मुस्लिम, आपस में भाई भाई।
देश परदेश का भेद भुलाकर के,
कोरोना के निदान हेतु दूर होकर भी चलो कोशिश करें एक संग।
रजनी अजीत सिंह २२.३.२०२०
#वायरस

परिभाषित

तुम मेरे हर रिस्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
भावों से परिपूर्ण वह जादू की छड़ी हो।
जो मिल जाता है तो हजारों तार सज के जलजाते हैं,
वो खुशियों की तुम लड़ी हो।
जब करूणा का सार उमड़ता है तो तुम वहाँ फूलझड़ी हो।
स्पंदित हो हर एक के जीवन में प्राण फूंक देने के लिए,
तुम्हारी जिंदगी जैसे खड़ी हो।
तुम हमारे हर रिश्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
जहाँ तुम बस्ते हो, हाँ तुम्हारी रात को वहीं खुशी मिलती है,
तभी तो तेरी रात चाँद तारो से जड़ी है,
तभी तो तुम रात की खुशियों की घड़ी हो।
तुम हमारे हर रिस्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
तुम खुश रहो तो तुम्हारी रात जागकर कभी सोकर तेरी जिंदगी में,
खुशियों के खातिर जैसे हर वक्त तेरे गले पड़ी हो।
तुम मेरे हर रिस्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
रजनी अजीत सिंह 22,4.2019
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#जिंदगी
#yqbaba
#yqhindi
#yqdidi

मेरा नाम दुर्गा सा लिया जायेगा

जब नारी सम्मानित होगी, बरबस मुझे याद किया जायेगा।जहाँ कुटुम्ब और देश बचाना होगा, वहाँ मेरा नाम दुर्गा सा लिया जायेगा।माना ऐसा कुछ ना कर पायी, जो सम्मान के काबिल हो।मैं तो दासी बनी रही करम से, कुटुम्ब में खुशियाँ बचाने के खातिर।लेकीन था मालूम नहीं इस गलती के खातिर ही सारी उम्र भटकने वाला मुझको शाप दिया जायेगा।तुलसी, मीरा मैं सीता थी जिसके आँगन की, उसने ही भर दिये अंगारे पवित्र गंगा सी बहू बेटी के आँचल में।हाँ मैं अब नारी बन कहती हूँ, मैं ही कलयुग की सीता हूँ, मैं ही मीरा मैं ही द्रोपदी, मैं ही सती सावित्री हूँ।मैं कल्कि को पाने खातिर नया इतिहास रचाऊँगी।सीता की अग्नि परीक्षा जो ले पहले उसे तपन का एहसास कराऊँगी।कलयुग का अन्त करने के खातिर कल्कि का अवतार हुआ है।या रावण भेष धर सीता को फिर छलने आया है।सीता पर दाग लगाने से पहले कल्कि को भी उसी आग में जलकर अग्नि परीक्षा देना होगा।नहीं तो अपने कर्मों का भोग मानव से बने दानव को भोगना होगा।पीड़ा देकर भी स्वार्थी मानव ने क्या खूब है रास रचाया।आँख भरी तो भी सत्ता के मद में झूम के गाया और खूब है नाम कमाया।जैसे मैं जी ली कैसे भी, क्या अब भी इस तरह जीया जायेगा।जब भी किसी का आत्म सम्मान है टूटा मेरी आँखें बरबस ही बरसी हैं।तड़पा है जब कोई बेगुनाह तो मेरा मन बिन पानी की मछली सी तड़पी है।लिखने को तैयार नहीं थी अपने मन की व्यथा को।शब्द दर्द का पहला अंकुर दुःख है मेरा जीवन साथी।माया तो जैसे खेल खिलौना, शब्द अब मेरा अस्त्र-शस्त्र बनेगा।जैसे मैंने वर्षों से सहा वार को, वैसे ही शब्द अब वार करेगा।पर अब हुआ अंत इस कलयुग का मीरा विष न पियेगी।कृपा हुई जो गिरधर की तो मीरा का विष राणा के कंठ में होगा, वह बिन विष पिये मर जायेगा।जब ये चमत्कार होगा तब काल के गाल से भी सत्यवान वापस आ जायेगा।जब धर्मयुग आयेगा तब कलयुग का बादल छट जायेगा।धर्मयुग में सत्य के राही पर अमृत की वर्षा होगी तब कुटुम्ब और देश में हर्षोल्लास छा जायेगा।जब नारी सम्मानित होगी बरबस मुझे याद किया जायेगा।जहाँ कुटुम्ब बचाना होगा वहाँ दुर्गा सा मेरा नाम लिया जायेगा।रजनी अजीत सिंह 5.1.2020

धरती

ऐ अल्हण धरती मुस्कुराती रहो चिर यौवना की तरह।

न किसी प्रकोप का भाजन बनो, अपने शक्तियों को लगा दो चिरहरण करने वालो को मिटा देने वालो की तरह।

बदनसीब इतने हम की अपने जाल में फंसते चले गए,

कंक्रीट का जो पिंजरा बनाये उसी में दफन होते चले गए।

तुम नवयौवना की तरह इठलाती रही और हम देख न सके तुम्हारी सुंदरता को नेत्रहीन की तरह।

तुम माँ हो इस विश्व की, भूल गए वो प्यार भरी किलकारी संवेदनहीन की तरह।

अब धरती पर कुछ बदला बदला सा रंग लगता है, अंजानो में भी कुछ अपना अपना सा लगता है,प्रकृति की सुंदरता की अद्भुत छटा बिखेरती लुभावनी धरती की तरह।

रजनी अजीत सिंह 16.4.2020

हमारा समाज और शोषण भाग १

शोषण पर लिखे मेरे लेख मुझे नहीं पता समाज को प्रभावित भी करेगा या नहीं पर मेरी लेखनी “शोषण” शब्द से पीड़ित समाज को लिखने से रोक नहीं पायी। हमारे आस पास की घटनाओं को देखकर मन हमेशा अतृप्त रहता है कि मैं लेखनी के द्वारा समाज को कुछ संदेश नहीं दे पा रही। मन शोषण शब्द सुनते ही जब से होश सम्हाला तब से अब तक का चलचित्र सामने दिखने लगता है। मन का झंझावात कहता है काश मैं उस जगह पर होती तो ऐसा कानून बनाती जिससे शोषण करने वाले का खात्मा हो सके। चाहे वो शोषण जिस भी तरह का हो। परन्तु कानून व्यवस्था का लाभ उठा गलत मुकदमा दर्ज कर फसांने वाले की भी भरमार है जिसका उदाहरण नारी शोषण को लिया जा सकता है। अधिकतर यौन शोषण का शिकार या तो मजदूरी करने वाली या जिसका कोई सहारा नहीं होता था यानी बेसहारा औरतें और बाल्यावस्था का दामन छोड़ किसोरा अवस्था के तरफ कदम रखती बालिकाओं का होता है जिसे अपने शारीरिक विकास होने के बारे में भी भान नहीं होता था कि ऐसा परिवर्तन क्यों हो रहा है? आज मैं उस समाज के लोगों को पहले आभार प्रगट करती हूँ कि जिन्होंने विभिन्न शिक्षा के द्वारा बालिकाओं को जागरूक और सजग होने का पाठ पढ़ाया है जिससे काफी मात्रा में किसोरी शिक्षा के माध्यम से अच्छा और बुरा का फर्क करना सीख गयी हैं।

मैं अब उस समय की बात करना चाहूंगी जब शोसल प्लेटफार्म के द्वारा मनोरंजन का समाज में कोई साधन न था। यदि मनोरंजन का साधन था तो बस गीत गाने और तीज त्योहार पर बैठकर गपशप करना या मजाकिया रिश्तों में मजाक करना ही मात्र मनोरंजन का साधन होता था। जैसे देवर भाभी, नन्दोई सरहज, जीजा शाली का रिश्ता जिसमें लोग मजाक कर मनोरंजन कब शोषण बन जाता है पता भी नहीं चलता था।

ये मैं उन दिनों की बात कर रही हूँ जब सास पर अपने दमाद माँ अपने बेटे पर नारी होकर भी इस दर्द को अनदेखा कर आँख बंदकर विश्वास करती थी हालात तो आज भी वही है बस तब और अब में फर्क है तो बस इतना कि पहले शाली सरहजो और कमजोर औरत का शोषण होता था तो कोई बोल नहीं पाता था आज कोई कोई हिम्मत दिखा विरोध करने लगा है।