श्रेणी: त्योहार

   सावन और काशी का महत्व 10.7.17

आज से सावन लग गया और जगह जगह सावन के झूले पड़ने लगे। तीज त्योहार का आगमन भी होने लगा। काशी में सावन का महत्व सोने में सुगंध जैसा माना जाता है।

 

          शिव की नगरी काशी में महादेव साक्षात निवास करते हैं। काशी को बनारस वाराणसी भी कहते हैं। यहां बाबा विश्वनाथ के दो मन्दिर है जो बहुत खास है है। पहला विश्वनाथ मंदिर है जो 

12ज्योतिर्लिंग में नौवा स्थान रखता है। 

वहीं दूसरा वाले मंदिर को नया विश्वनाथ मन्दिर कहते हैं जो काशी विश्व विद्यालय में स्थित है। काशी नगरी पतित पावनी गंगा तट पर बसी है। 

यह भी कहा जाता है कि ये नगरी देवादिदेव के त्रिशूल पर बसी हुई है। धर्मग्रंथों और पुराणों में इसे मोक्ष की नगरी कहा गया है। हमारे हिंदू धर्म में सावन का महीना काफी पवित्र माना जाता है। इसे धर्म कर्म का माह भी कहा जाता है। सावन से संबंधित एक प्रलय का कथा भी है। जो पढ़ने के लिए नीचे देखें। 

लोक में प्रचलित एक भजन है जो माँ गाया करती थी उसे मैं आपको लिखकर बताती हूँ। 

                        भजन 

मेरी झोपड़ी बनवा दे भोला काशी के किनारे – 2

काशी के किनारे भोला काशी के किनारे – 2

काशी के किनारे भोला गंगा बहत हैं मैं गंगा नहाऊं सुबह शाम काशी के किनारे। 

मेरी झोपड़ी बनवा दे भोला काशी के किनारे – 2

काशी के किनारे भोला आप बसत हैं मैं दर्शन करूं सुबह शाम भोला काशी के किनारे। 

मेरी झोपड़ी बनवा दे भोला काशी के किनारे – 2

काशी के किनारे भोला गुरु जी रहत हैं मैं सेवा करूं सुबह शाम भोला काशी के किनारे। 

काशी के किनारे भोला तेरे भक्त रहत हैं मैं सत्संग में जाऊँ सुबह शाम भोला काशी के किनारे। – 2

काशी के किनारे भोला गंगा आरती होत हैं मैं आरती उतारूं सुबहो शाम भोला काशी के किनारे। – 2

मेरी झोपड़ी बनवा दे भोला काशी के किनारे।_2

काशी के किनारे प्रवचन भागवत होत हैं मैं भागवत सुनु सुबह शाम भोला काशी के किनारे।- 2

मेरी झोपड़ी बनवा दे भोला काशी के किनारे। – 2

काशी के किनारे भोला मुक्ति मोक्ष मिलत है मैं मुक्ति का वरदान पाऊँ सुबह शाम काशी के किनारे। – 2

मेरी झोपड़ी बनवा दे भोला काशी के किनारे। – 2

ये भजन लिखने का एकमात्र उद्देश्य लोक में प्रचलित गीतों का पुराने पीढ़ी के साथ लोप होता जा रहा है जिसका प्रचार प्रसार करना है। ये गाना मेरी माँ गाया करती थी। उन्हें बहुत ही शौक था कि उनके गानों को टेप कर लिया जाए। किंतु गांव में रहने के कारण मैं ऐसा न कर सकी मुझे इसका बहुत ही दुःख होता है। इस लिए सोचती हूँ उनके गानों को लोप होने से बचा लूं। और जब मैं माँ के गाये गानों को भजन कीर्तन में गाती हूँ तो लोग झूम उठते हैं और मुझसे लिखने या डायरी मांगते हैं जो मैं समय के अभाव के कारण नहीं दे पाती। उम्मीद करती हूं फेसबुक, ट्विटर, या वर्डप्रेस पर मेरे भजनों को पाकर प्रसन्न हो जाएंगे। 

              🌺🌺काशी वासी 🌺🌺

                   रजनी सिंह 
      



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तस्वीरों में देखिए सावन में शिव की नगरी का रंग, जानिए बाबा के जलाभिषेक का महत्व

dainikbhaskar.com | Jul 13,2014 11:28 AM IST

  • तस्वीरों में देखिए सावन में शिव की नगरी का रंग, जानिए बाबा के जलाभिषेक का महत्व
  • तस्वीरों में देखिए सावन में शिव की नगरी का रंग, जानिए बाबा के जलाभिषेक का महत्व
  • तस्वीरों में देखिए सावन में शिव की नगरी का रंग, जानिए बाबा के जलाभिषेक का महत्व
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तस्वीर: काशी विश्वनाथ का जलाभिषेक करने जाते कांवड़िए

 

वाराणसी. श्रावण (सावन) मास में बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों की हर मुराद को पूरा करते है । एक महीने चलने वाले इस पवित्र माह  में देवी देवताओं के साथ धरती पर भक्त भी बाबा का जलाभिषेक कर उन्हें प्रशन्न करते हैं। माना जाता हैं कि इस माह में बाबा का जलाभिषेक करने से बाबा भोले प्रशन्न होते हैं और भक्तो की मुरादें पूरी करते हैं। सावन माह भोले भंडारी को अतिशय प्रिय हैं। इस महीने वह मां शक्ति के साथ काशी में उदयमान रहते हैं। 


जानिए सावन का महीना क्यों पसंद है महादेव को,क्या महत्व है जलाभिषेक का  

 

स्वामी अविमुक्तरेश्वरानंद ने बताया कि हर वर्ष आषाढ़ के ख़त्म होने के दूसरे दिन सावन आता हैं। इसे शिव का महीना माना जाता है। दरससल, पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से विष निकला था। इस विष को देवताओं को पीना था। घबराए देवताओं को बचाने के लिए विष को पीने के लिए महादेव भगवान आगे आए और उन्होंने विषपान कर लिया। 

 

जिस माह में शिवजी ने विष पिया था, वह सावन का माह था। विष पीने के बाद शिवजी के तन में ताप बढ़ गया। सभी देवी-देवता और शिव के भक्तों ने उनको शीतलता प्रदान करने के लिए उनका जलाभिषेक करने लगे ताकि उनको ठंडक पहुंचे। शिवजी के विषपान से उत्पन्न ताप को शीतलता प्रदान करने के लिए मेघराज इंद्र ने भी बहुत वर्षा की थी। इससे भगवान शिव को बहुत शांति मिली। इसी घटना के बाद सावन का महीना भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है।

 

काशी में सावन का महत्व 

 

काशी में सावन का महत्व सोने में सुगंध जैसा माना जाता हैं। माना जाता है कि सावन माह में भगवान शिव मां पार्वती के साथ यहीं उदयमान रहते हैं। यही कारण हैं की द्वादश ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ प्रधान माने गए हैं।

 

आगे पढ़िए बाबा के हठ के आगे जल प्रलय भी वापस हो गया था…

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तस्वीर: गंगा दर्शन को जाता कांवड़िया

 

बाबा के हठ के आगे जल प्रलय भी वापस हो गया था

 

काशी में सावन का महत्व और भी महत्वकारी इसलिए है कि एक बार धरती पर प्रलय हुआ सारी धरती डूबने लगी लेकिन बाबा काशी में ध्यानमग्न थे। साथ में मां पार्वती भी बाबा के साथ थीं। माता ने बाबा को जगाने का प्रयत्न किया मगर बाबा ध्यान से बाहर नहीं आए। धीरे धीरे प्रलय की जलधारा काशी की ओर बढ़ने लगी। ये देख मां ने बड़ा प्रयत्न कर बाबा को बाद ध्यान से बाहर लाया। 

 

बाबा ने पूछा क्या हुआ तो माता ने कहा कि प्रलय की जलधारा काशी के समीप आ पहुंची हैं ,अब हमें यहां से चलना होगा। तब बाबा भोले ने कहा कि भले ही प्रलय की जलधारा काशी को डूबो दे मगर मैं काशी नहीं छोड़ूंगा। ये सुन जल प्रलय वापस हो लिया। तभी से काशी को अविमुक्त नगरी माना गया और बाबा भोले को एक नाम से जाना गया, वो नाम था अविमुक्तेशवर। इसलिए काशी में सावन का महत्व बढ़ जाता हैं।  

 

आगे पढ़िए महादेव ने खुद बसाया है काशी को

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तस्वीरों में देखिए सावन में शिव की नगरी का रंग, जानिए बाबा के जलाभिषेक का महत्व

dainikbhaskar.com | Jul 13,2014 11:28 AM IST

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तस्वीर: काशी विश्वनाथ का जलाभिषेक करने जाते कांवड़िए

 

वाराणसी. श्रावण (सावन) मास में बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों की हर मुराद को पूरा करते है । एक महीने चलने वाले इस पवित्र माह  में देवी देवताओं के साथ धरती पर भक्त भी बाबा का जलाभिषेक कर उन्हें प्रशन्न करते हैं। माना जाता हैं कि इस माह में बाबा का जलाभिषेक करने से बाबा भोले प्रशन्न होते हैं और भक्तो की मुरादें पूरी करते हैं। सावन माह भोले भंडारी को अतिशय प्रिय हैं। इस महीने वह मां शक्ति के साथ काशी में उदयमान रहते हैं। 


जानिए सावन का महीना क्यों पसंद है महादेव को,क्या महत्व है जलाभिषेक का  

 

स्वामी अविमुक्तरेश्वरानंद ने बताया कि हर वर्ष आषाढ़ के ख़त्म होने के दूसरे दिन सावन आता हैं। इसे शिव का महीना माना जाता है। दरससल, पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से विष निकला था। इस विष को देवताओं को पीना था। घबराए देवताओं को बचाने के लिए विष को पीने के लिए महादेव भगवान आगे आए और उन्होंने विषपान कर लिया। 

 

जिस माह में शिवजी ने विष पिया था, वह सावन का माह था। विष पीने के बाद शिवजी के तन में ताप बढ़ गया। सभी देवी-देवता और शिव के भक्तों ने उनको शीतलता प्रदान करने के लिए उनका जलाभिषेक करने लगे ताकि उनको ठंडक पहुंचे। शिवजी के विषपान से उत्पन्न ताप को शीतलता प्रदान करने के लिए मेघराज इंद्र ने भी बहुत वर्षा की थी। इससे भगवान शिव को बहुत शांति मिली। इसी घटना के बाद सावन का महीना भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है।

 

काशी में सावन का महत्व 

 

काशी में सावन का महत्व सोने में सुगंध जैसा माना जाता हैं। माना जाता है कि सावन माह में भगवान शिव मां पार्वती के साथ यहीं उदयमान रहते हैं। यही कारण हैं की द्वादश ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ प्रधान माने गए हैं।

 

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तस्वीर: गंगा दर्शन को जाता कांवड़िया

 

बाबा के हठ के आगे जल प्रलय भी वापस हो गया था

 

काशी में सावन का महत्व और भी महत्वकारी इसलिए है कि एक बार धरती पर प्रलय हुआ सारी धरती डूबने लगी लेकिन बाबा काशी में ध्यानमग्न थे। साथ में मां पार्वती भी बाबा के साथ थीं। माता ने बाबा को जगाने का प्रयत्न किया मगर बाबा ध्यान से बाहर नहीं आए। धीरे धीरे प्रलय की जलधारा काशी की ओर बढ़ने लगी। ये देख मां ने बड़ा प्रयत्न कर 

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वाराणसी. श्रावण (सावन) मास में बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों की हर मुराद को पूरा करते है । एक महीने चलने वाले इस पवित्र माह  में देवी देवताओं के साथ धरती पर भक्त भी बाबा का जलाभिषेक कर उन्हें प्रशन्न करते हैं। माना जाता हैं कि इस माह में बाबा का जलाभिषेक करने से बाबा भोले प्रशन्न होते हैं और भक्तो की मुरादें पूरी करते हैं। सावन माह भोले भंडारी को अतिशय प्रिय हैं। इस महीने वह मां शक्ति के साथ काशी में उदयमान रहते हैं। 


जानिए सावन का महीना क्यों पसंद है महादेव को,क्या महत्व है जलाभिषेक का  

 

स्वामी अविमुक्तरेश्वरानंद ने बताया कि हर वर्ष आषाढ़ के ख़त्म होने के दूसरे दिन सावन आता हैं। इसे शिव का महीना माना जाता है। दरससल, पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान समुद्र से विष निकला था। इस विष को देवताओं को पीना था। घबराए देवताओं को बचाने के लिए विष को पीने के लिए महादेव भगवान आगे आए और उन्होंने विषपान कर लिया। 

 

जिस माह में शिवजी ने विष पिया था, वह सावन का माह था। विष पीने के बाद शिवजी के तन में ताप बढ़ गया। सभी देवी-देवता और शिव के भक्तों ने उनको शीतलता प्रदान करने के लिए उनका जलाभिषेक करने लगे ताकि उनको ठंडक पहुंचे। शिवजी के विषपान से उत्पन्न ताप को शीतलता प्रदान करने के लिए मेघराज इंद्र ने भी बहुत वर्षा की थी। इससे भगवान शिव को बहुत शांति मिली। इसी घटना के बाद सावन का महीना भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है।

 

काशी में सावन का महत्व 

 

काशी में सावन का महत्व सोने में सुगंध जैसा माना जाता हैं। माना जाता है कि सावन माह में भगवान शिव मां पार्वती के साथ यहीं उदयमान रहते हैं। यही कारण हैं की द्वादश ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ प्रधान माने गए हैं।

 

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बाबा के हठ के आगे जल प्रलय भी वापस हो गया था

 

काशी में सावन का महत्व और भी महत्वकारी इसलिए है कि एक बार धरती पर प्रलय हुआ सारी धरती डूबने लगी लेकिन बाबा काशी में ध्यानमग्न थे। साथ में मां पार्वती भी बाबा के साथ थीं। माता ने बाबा को जगाने का प्रयत्न किया मगर बाबा ध्यान से बाहर नहीं आए। धीरे धीरे प्रलय की जलधारा काशी की ओर बढ़ने लगी। ये देख मां ने बड़ा प्रयत्न कर बाबा को बाद ध्यान से बाहर लाया। 

 

बाबा ने पूछा क्या हुआ तो माता ने कहा कि प्रलय की जलधारा काशी के समीप आ पहुंची हैं ,अब हमें यहां से चलना होगा। तब बाबा भोले ने कहा कि भले ही प्रलय की जलधारा काशी को डूबो दे मगर मैं काशी नहीं छोड़ूंगा। ये सुन जल प्रलय वापस हो लिया। तभी से काशी को अविमुक्त नगरी माना गया और बाबा भोले को एक नाम से जाना गया, वो नाम था अविमुक्तेशवर। इसलिए काशी में सावन का महत्व बढ़ जाता हैं।  

 

आगे पढ़िए महादेव ने खुद बसाया है काशी को

 को बाद ध्यान से बाहर लाया। 

 

बाबा ने पूछा क्या हुआ तो माता ने कहा कि प्रलय की जलधारा काशी के समीप आ पहुंची हैं ,अब हमें यहां से चलना होगा। तब बाबा भोले ने कहा कि भले ही प्रलय की जलधारा काशी को डूबो दे मगर मैं काशी नहीं छोड़ूंगा। ये सुन जल प्रलय वापस हो लिया। तभी से काशी को अविमुक्त नगरी माना गया और बाबा भोले को एक नाम से जाना गया, वो नाम था अविमुक्तेशवर। इसलिए काशी में सावन का महत्व बढ़ जाता हैं।  

 

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ईद 25.6.17

ईद की खुशियां ईद मनाने वाले जाने और न न जाने कोई।

हम तो जाने बस इतना ही ईद गले मिलना और मिलाना।

सेवईयां खा मुँह मीठा कर हिन्दू मुस्लिम भाई भाई कहलाना।

देखो इस रिश्तों को आप निभाना,भोजन बुला के हमें खिलाना, ईद का चाँद मत हो जाना।

ढेर सारी शुभकामनाएं के साथ ईद मुबारक हो।

रजनी सिंह