Category: त्योहार

जिंदगी  के रंग होली के संग(12.3.17)

जिंदगी हमें कितना रंग दिखाती है।
जैसे होली सब रंगों को लेकर आती है।

कहीं सरसों के फूल बसंत ऋतु की खूबसूरती लेकर आती है।

तो कहीं खेतों में गेहूं की बालियां हम को लुभाती है।

प्रकृति की छटा भी कितनी निराली लगती है।

हर रंग के फूल हमें होली के रंगों सी लगती है।

कहीं फगुनहटा ब्यार तो कहीं होली के गीत भी हमारे मन को भाती है।

होलिका दहन भी बुराई पर अच्छाई की जीत दिलाती है।
होली विभिन्न पकवानों के साथ ढ़ेर सारी खुशियाँ लेकर आती है।

क्या बच्चे क्या बूढ़े क्या जवान सब टोली में मिल आपस में खुशियां मनाते है।

हर रंग हमें अलग अलग महत्व लिए अपने अर्थो से जिंदगी के रंग से अवगत कराती है।

1.लाल रंग प्यार का रंग है। ये रंग हमें प्यार करना सीखाती है। इस लिए लोग प्यार में लाल गुलाब देना पंसद करते हैं।

ऐसा माना जाता है की मां दुर्गा लाल रंग की ओढ़ चुन्नी जग में उपकार करती है।

2.पीला रंग दोस्ती के लिए खास रंग है। इसलिए दोस्ती में लोग पीला गुलाब देना पंसद करते हैं।

और ऐसा माना जाता है मां शीतला पीला चुनरी पहनती है तो जग में कल्याण करती हैं।

3.गुलबी रंग जिसे रानियों का कलर कहा गया है।

और जब माँ लक्ष्मी गुलाबी चुन्नी पहनती हैं तो लक्ष्मी का रूप धारण कर धन दान करती हैं।

4.श्वेत अर्थात सफेद ये रंग अपने आप में पवित्रता को लिए हुए है। ये रंग अपना अस्तित्व छोड़कर किसी भी रंग में रंग जाता है। अर्थात इस रंग को प्यार से चाहे जिस रंग में रंग लो। जैसे हमारे तिरंगे में इस रंग को शांति, सत्य और पवित्रता का चिन्ह माना गया है।

जब माँ श्वेत चुनरीओढ़ सरस्वती का रूप धारण करतीं हैं तो जगत में ज्ञान बांटती है अर्थात विद्या दान करती हैं।

5.हरा रंग प्रकृति को दर्शाने वाला रंग है। जिसे देख मन अपने आप में प्रसन्न और प्रफुल्लित हो जाता है।

इस हरे रंग को तिरंगे में श्रद्धा, विश्वास और देश की हरियाली और समवृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

6.केसरिया अर्थात आरेंज रंग वीरता और त्याग का सूचक है। और कल की जीत से जनता मोदीमय अर्थात हमारा मन केसरिया मय हो गया है।

7.काला रंग हम हिन्दुओं में किसी भी शुभ कार्य में वर्जित है। वहीं मुस्लिम धर्म के लोग शुभ मानते हैं। काला रंग कलंक लगने के अर्थ में भी किया गया है। तो वहीं दूसरी तरफ यही काला रंग आँखों में लग खूबसूरती भी प्रदान करता है और काला टीका लगाकर बुरी नजर से भी बचाया जाता है।

जब काली माँ संघार करने चलती हैं तो काला चुनरी अर्थात काला वस्त्र धारण कर दुष्टों का रक्त पान करती हैं।

जब सातों रंग साथ हो तो इसे इन्द्रधनुष कहते हैं।
जब माँ सातों रंग की चुनरी धारण करती हैं तो इनकी माया कोई नहीं समझ पाता है अर्थात इनकी माया इनकी सात बहनें भी नहीं समझ पाती हैं। और जब इनकी कृपा हो जाय तो अज्ञानी एक पल में ज्ञानी बन जाता है।

जब लिख रही थी तो लगा क्यों न हम इन रंगों के अस्तित्व को अपनाकर होली के रंगों के साथ खुशियां मनाएँ।

होली के रंगों के साथ सभी बड़े और छोटे को होली मुबारक हो।

होली के शुभ रंगों के साथ आपलोगों की

रजनी सिंह

मकर संक्रांति। 


हिन्दुओ का पर्व मकर संक्रांति है।
ये पर्व तब मनता है, 

जब सूर्य मकर राशि पर होता है।

चौदहवे या पन्द्रहवे दिन जनवरी माह में मनता है। 

भक्ति उत्साह के साथ-साथ, विभिन्न रीति रिवाजों से मनता है। 

नाम खिचड़ी से विहार में जाना जाता है। 

सुनने को मिलता आज का दान , सौ गुना फल ले आता है। 

इसका कुछ ऐतिहासिक महत्व भी है। 

आज के दिन भगवान् भास्कर अपने पुत्र शनि से घर मिलने जाते हैं। 

आज के दिन ही गंगा जी भागीरथ के  पीछे – पीछे चलकर, 

कपिलमुनि के आश्रम से होती, सागर में जाकर मिली थी। 

तील, चूड़ा, चावल और ढूँढा, दाना आदि दान दिलाता है ।

आसमान में उड़ता पतंग, कटता पतंग जी को बहुत ही भाता है। 

खिचड़ी ऐसे ही मनता है। 

बधाई हो  सबको मकर संक्रांति का जो पढ़े उसको भी, जो दूर रहे हैं उनको भी  जो पास रहें हैं उसको भी।

रजनी के तरफ से सबकोबधाई हो।
रजनी अजीत सिंह 15.1.18
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    शुभ दीपावली 

दीपावली पाँच दिनों का त्योहार, मना लो खुशियाँ सब अपार। 

पहले धनतेरस, छोटी दिवाली और फिर आता बड़ी दीपाली का त्योहार। 

बनवास से लौटे थे श्री राम, अयोध्या में आयी थी खुशियां अपरम्पार। 

कहता शास्त्र जहाँ हो साफ सुथरा घर वार, वही होता लक्ष्मी जी का निवास। 

कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी हुआ नरक चतुर्दशी के नाम से ये विख्यात। 

गोवर्द्धन पूजा भी मशहूर जो आता दिवाली के सुबह हर बार, जो अन्नकूट नाम से है विख्यात।  

दीपावली के पाँचवा दिन भाईदूज का त्योहार, लगा रोली अक्षत का तिलक देती बहन उज्जवल भविष्य का आशीष। 

“रजनी ” ने किया छोटे में दीपावली का वर्णन सविस्तार, खुशियाँ लाये जीवन में अपार मुबारक दीपावली का त्योहार। 

        🎆🎆    रजनी सिंह 🎇🎇

जिवित्पुत्रिका ब़त 13.917

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा

हिन्दू पंचाग के अनुसार यह व्रत आश्विन माह कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तक मनाया जाता हैं. इस निर्जला व्रत को विवाहित मातायें अपनी संतान की सुरक्षा के लिए करती हैं.

खासतौर पर यह व्रत उत्तरप्रदेश, बिहार एवम नेपाल में मनाया जाता हैं.। 

जीवित्पुत्रिका-व्रत के साथ जीमूतवाहन की कथा जुड़ी है। संक्षेप में वह इस प्रकार है –

गन्धर्वों के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था। वे बड़े उदार और परोपकारी थे। जीमूतवाहन के पिता ने वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम में जाते समय इनको राजसिंहासन पर बैठाया किन्तु इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था। वे राज्य का भार अपने भाइयों पर छोडकर स्वयं वन में पिता की सेवा करने चले गए। वहीं पर उनका मलयवती नामक राजकन्या से विवाह हो गया। एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन काफी आगे चले गए, तब उन्हें एक वृद्धा विलाप करते हुए दिखी. इनके पूछने पर वृद्धा ने रोते हुए बताया – मैं नागवंशकी स्त्री हूं और मुझे एक ही पुत्र है। पक्षिराज गरुड के समक्ष नागों ने उन्हें प्रतिदिन भक्षण हेतु एक नाग सौंपने की प्रतिज्ञा की हुई है। आज मेरे पुत्र शंखचूड की बलि का दिन है। जीमूतवाहन ने वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा – डरो मत. मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूंगा. आज उसके बजाय मैं स्वयं अपने आपको उसके लाल कपडे में ढंककर वध्य-शिला पर लेटूंगा. इतना कहकर जीमूतवाहन ने शंखचूड के हाथ से लाल कपडा ले लिया और वे उसे लपेटकर गरुड को बलि देने के लिए चुनी गई वध्य-शिला पर लेट गए। नियत समय पर गरुड बड़े वेग से आए और वे लाल कपडे में ढंके जीमूतवाहन को पंजे में दबोचकर पहाड के शिखर पर जाकर बैठ गए। अपने चंगुल में गिरफ्तार प्राणी की आंख में आंसू और मुंह से आह निकलता न देखकर गरुडजी बड़े आश्चर्य में पड गए। उन्होंने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा. जीमूतवाहन ने सारा किस्सा कह सुनाया. गरुड जी उनकी बहादुरी और दूसरे की प्राण-रक्षा करने में स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत से बहुत प्रभावित हुए. प्रसन्न होकर गरुड जी ने उनको जीवन-दान दे दिया तथा नागों की बलि न लेने का वरदान भी दे दिया। इस प्रकार जीमूतवाहन के अदम्य साहस से नाग-जाति की रक्षा हुई और तबसे पुत्र की सुरक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की प्रथा शुरू हो गई।

आश्विन कृष्ण अष्टमी के प्रदोषकाल में पुत्रवती महिलाएं जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर माता पार्वती को कथा सुनाते हुए कहते हैं कि आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन उपवास रखकर जो स्त्री सायं प्रदोषकाल में जीमूतवाहन की पूजा करती हैं तथा कथा सुनने के बाद आचार्य को दक्षिणा देती है, वह पुत्र-पौत्रों का पूर्ण सुख प्राप्त करती है। व्रत का पारण दूसरे दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति के पश्चात किया जाता है। यह व्रत अपने नाम के अनुरूप फल देने वाला है। 

इस वर्ष 2017 में यह व्रत 13 सितम्बर, दिन बुधवार को मनाया जायेगा.

अष्टमी तिथि की शुरुवात 

13 सितम्बर 2017 को 01:01

अष्टमी तिथि की खत्म 

13 सितम्बर 2017 को 22:48

जीवित्पुत्रिका व्रत पूजा विधि  (Jivitputrika Vrat Puja Vidhi ):

यह व्रत तीन दिन किया जाता है, तीनो दिन व्रत की विधि अलग-अलग होती हैं.

नहाई खाई 

 यह दिन (Nahai-khai) जीवित्पुत्रिका व्रत का पहला दिन कहलाता है, इस दिन से व्रत शुरू होता हैं. इस दिन महिलायें नहाने के बाद एक बार भोजन लेती हैं. फिर दिन भर कुछ नहीं खाती.

खुर जितिया 

 यह जीवित्पुत्रिका व्रत का दूसरा दिन (Khur Jitiya) होता हैं, इस दिन महिलायें निर्जला व्रत करती हैं. यह दिन विशेष होता हैं.

पारण 

 यह जीवित्पुत्रिका व्रत का अंतिम दिन (Paaran) होता हैं, इस दिन कई लोग बहुत सी चीज़े खाते हैं, लेकिन खासतौर पर इस दिन झोर भात, नोनी का साग एवम मडुआ की रोटी अथवा मरुवा की रोटी दिन के पहले भोजन में ली जाती हैं.

इस प्रकार जीवित्पुत्रिका व्रत का यह तीन दिवसीय उपवास किया जाता हैं. यह नेपाल एवम बिहार में बड़े चाव से किया जाता हैं.

जीवित्पुत्रिका व्रत महत्व  (Jivitputrika Vrat Mahatva):

कहा जाता हैं एक बार एक जंगल में चील और लोमड़ी घूम रहे थे, तभी उन्होंने मनुष्य जाति को इस व्रत को विधि पूर्वक करते देखा एवम कथा सुनी. उस समय चील ने इस व्रत को बहुत ही श्रद्धा के साथ ध्यानपूर्वक देखा, वही लोमड़ी का ध्यान इस ओर बहुत कम था. चील के संतानों एवम उनकी संतानों को कभी कोई हानि नहीं पहुँची लेकिन लोमड़ी की संतान जीवित नहीं बची. इस प्रकार इस व्रत का महत्व बहुत अधिक बताया जाता हैं.

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा (Jivitputrika jitiya Vrat Katha):

यह कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं. महा भारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्व्थामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की आग तीव्र थी, जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला था, लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी. उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली, जिसके फलस्वरूप अश्व्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया, जिसे निष्फल करना नामुमकिन था. उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक थी, जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया. गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना. तब ही से इस व्रत को किया जाता हैं.

इस प्रकार इस जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व महाभारत काल से हैं.। 

                 रजनी सिंह 

  15 अगस्त का महत्व। 

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

भारत का स्वतंत्रता दिवस (अंग्रेज़ीIndependence Day of Indiaहिंदी:इंडिपेंडेंस डे ऑफ़ इंडिया) हर वर्ष 15 अगस्त को मनाया जाता है। सन् 1947 में इसी दिन भारत के निवासियों ने ब्रिटिश शासन से स्‍वतंत्रता प्राप्त की थी। यह भारत का राष्ट्रीय त्यौहार है। प्रतिवर्ष इस दिन भारत के प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से देश को सम्बोधित करते हैं। 15 अगस्त 1947 के दिन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने, दिल्ली में लाल किले के लाहौरी गेट के ऊपर, भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया था।[1]महात्मा गाँधी के नेतृत्व में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में लोगों ने काफी हद तक अहिंसक प्रतिरोध और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में हिस्सा लिया। स्वतंत्रता के बाद ब्रिटिश भारत को धार्मिक आधार पर विभाजित किया गया, जिसमें भारत और पाकिस्तान का उदय हुआ। विभाजन के बाद दोनों देशों में हिंसक दंगे भड़क गए और सांप्रदायिक हिंसा की अनेक घटनाएं हुईं। विभाजन के कारण मनुष्य जाति के इतिहास में इतनी ज्यादा संख्या में लोगों का विस्थापन कभी नहीं हुआ। यह संख्या तकरीबन 1.45 करोड़ थी। 1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए। [2]

स्वतंत्रता दिवस (भारत)
Independence Day (India)

लाल किले पर फहराता तिरंगा; स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर फहरते झंडे अनेक इमारतों व स्थानों पर देखे जा सकते हैं।

इस दिन को झंडा फहराने के समारोह, परेड और सांस्कृतिक आयोजनों के साथ पूरे भारत में मनाया जाता है। भारतीय इस दिन अपनी पोशाक, सामान, घरों और वाहनों पर राष्ट्रीय ध्वज प्रदर्शित कर इस उत्सव को मनाते हैं और परिवार व दोस्तों के साथ देशभक्ति फिल्में देखते हैं, देशभक्ति के गीत सुनते। 

आज 15 है इसलिए मैं यहां थोड़ा सा अपना परिचय बताती हूँ। मुझे बचपन से ही भाषण देना और सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेना बहुत पसंद था। 

मैं हमेशा गानों के विभिन्न धुनों पर अपना बनाकर गाना गाती थी। नीचे के धुनों पर गाना बनायी थी 


फिल्मः दिल तुझको दिया (1987)

गायक/गायिकाः लता मंगेशकर

संगीतकारः राजेश रोशन

गीतकारः राजेश रोशन

कलाकारः कुमार गौरव, रति अग्निहोत्री


वादा न तोड़ -3

मेरी चढ़ती जवानी तड़पे

तू मुँह न मोड़

वादा न तोड़ -3


मेरी चढ़ती जवानी तड़पे

तू मुँह न मोड़

वादा न तोड़ -3


( नींद हमारी पिया तूने चूराई

कहाँ छुपा है पिया तू है हरजाई ) -2

मेरी चढ़ती जवानी तड़पे

तू मुँह न मोड़

वादा न तोड़ -3


( कोई नहीं है तेरे-मेरे बिन यहाँ पे

चल बैठें छाँव तले देख वहाँ पे ) -2

मेरी चढ़ती जवानी तड़पे

तू मुँह न मोड़

वादा न तोड़ -3


( वादा निभाना होगा साजन तुझको

डोली में बिठा के अपने घर ले जा मुझको ) -2

मेरी चढ़ती जवानी तड़पे

तू मुँह न मोड़

वादा न तोड़ -3 

देश भक्ति गाना

वादा न तोड़ 3

मेरी जननी(धरती)  विलखती रहती है एएएएए। 

जागो वो लाल कर दो कमाल-2

बड़ी मुश्किल से भईया मिली है अजादी उसको भी याद रखना होगा बच्चों तुझको। 

नेता सुवास खुदी खुद को मिटा दिये। 

सपना अधूरा रह गया है बच्चों उनका। 

तेरी धरती विलखती रोती है जागो वो लाल कर दो कमाल। 

     

          रजनी सिंह 

त्योहारों के अधिकता के कारण और उसके पर लिखने की वजह से आज समय का अभाव है इसलिए बात यहीं समाप्त करती हूं। 

मुझे देश भक्ति गाना बहुत पसंद है। 

मेरा फेवरिट गाने जैसे –

 ऐ मेरे वतन के लोगों।  कर चले हम फिदा जान और तन साथियों अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों। आदि बहुत देश भक्ति गाने हैं। समयाभाव के कारण मैं अपनी बात यहीं समाप्त करती हूं और कहूंगी सही मायनों में हमारी धरती माता आज भी बेड़ियों से जकड़ी हुई हैं 

स्‍वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस दिन ट्रिस्ट विद डेस्टिनी (नियति से वादा) नामक अपना प्रसिद्ध भाषण दिया:

कई सालों पहले, हमने नियति से एक वादा किया था, और अब समय आ गया है कि हम अपना वादा निभायें, पूरी तरह न सही पर बहुत हद तक तो निभायें। आधी रात के समय, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग जाएगा। ऐसा क्षण आता है, मगर इतिहास में विरले ही आता है, जब हम पुराने से बाहर निकल नए युग में कदम रखते हैं, जब एक युग समाप्त हो जाता है, जब एक देश की लम्बे समय से दबी हुई आत्मा मुक्त होती है। यह संयोग ही है कि इस पवित्र अवसर पर हम भारत और उसके लोगों की सेवा करने के लिए तथा सबसे बढ़कर मानवता की सेवा करने के लिए समर्पित होने की प्रतिज्ञा कर रहे हैं।… आज हम दुर्भाग्य के एक युग को समाप्त कर रहे हैं और भारत पुनः स्वयं को खोज पा रहा है। आज हम जिस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं, वो केवल एक क़दम है, नए अवसरों के खुलने का। इससे भी बड़ी विजय और उपलब्धियां हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं। भारत की सेवा का अर्थ है लाखों-करोड़ों पीड़ितों की सेवा करना। इसका अर्थ है निर्धनता, अज्ञानता, और अवसर की असमानता मिटाना। हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की यही इच्छा है कि हर आँख से आंसू मिटे। संभवतः ये हमारे लिए संभव न हो पर जब तक लोगों कि आंखों में आंसू हैं, तब तक हमारा कार्य समाप्त नहीं होगा। आज एक बार फिर वर्षों के संघर्ष के बाद, भारत जागृत और स्वतंत्र है। भविष्य हमें बुला रहा है। हमें कहाँ जाना चाहिए और हमें क्या करना चाहिए, जिससे हम आम आदमी, किसानों और श्रमिकों के लिए स्वतंत्रता और अवसर ला सकें, हम निर्धनता मिटा, एक समृद्ध, लोकतान्त्रिक और प्रगतिशील देश बना सकें। हम ऐसी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं को बना सकें जो प्रत्येक स्त्री-पुरुष के लिए जीवन की परिपूर्णता और न्याय सुनिश्चित कर सके? कोई भी देश तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसके लोगों की सोच या कर्म संकीर्ण हैं।

  रजनी सिंह 

जन्माष्टमी पर हार्दिक शुभकामनाएं। 

सबसे पहले कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर प्यारी सी नोकझोंक होने के बाद भाई बने अजय जी, शिक्षा के क्षेत्र में लगभग सभी जानकारी को को पास रखने वाले प्रतिभा के धनी व्यक्ति जिन्हें मैं मन से गुरु मान चुकी हूं अभय जी, और हर क्षेत्र में हर टॉपिक पर प्यारा – प्यारा कविता पढ़ने का आनंद देने वाले मधुसूदन जी , ए. वी. जी उन्मुक्त जी, रोहित जी, अश्विनी जी,  विजय जी, मेरे विचारों का साथ निभाने वाले पवन भाई जो मुझे प्यार से दी कहते हैं और एक महीने के अंदर मेरे शब्दों और विचारों से काफी प्रभावित हैं।   विमला जी,नागेश्वर जी,अतुल जी, गौरव जी, गौरी जी, राज जी,  अभी राज जी  अतुल जी  मेरे बेटे भवराज और मेरे बातों को बखूबी मनाने वाले प्यारे बेटे दानिश अंसारी जी ,  अशायरी की दुनिया में बेहतरीन शायरी लिखने वाले सागर जी, पाखी जी। कात्यायनी जी, गीरजा जी,मेरी ब्लॉग की प्यारी बेटी ज्योति जीऔर वेरोनिका जी, मेरी प्यारी बहन काँची जी, वर्डप्रेस के सभी पाठकों और लेखनी की दुनिया में लिखने वाले भाई – बहन, बेटा – बेटी और सह मित्रों को जन्माष्टमी की बधाई हो। मैं बताना चाहती हूँ कि मैं 2,1,17कोअपना ब्लॉग बनायी थी यानी आठवां महीना चल रहा है इतने दिनों के साथ में मेरे 319फालोवरस हो गए हैं। मैं चाहती तो केवल पाठक मित्र कहकर ही जन्माष्टमी की बधाई दे सकती थी परन्तु मुझे वर्डप्रेस एक परिवार जैसा लगता है इस लिए मैं देख रही थी कि मुझे अपने परिवार के कितने सदस्यों का नाम याद है। तो मैं अपना पहला पोस्ट नये साल की नई उम्मीद लिखी थी वो कविता बताती हूँ जो इस प्रकार   है – 

अरे! नये साल में नयी उम्मीदें लेकर आया नया साल।

अरे! सबको बधाई नये साल की, मम्मी – पापा ,भाई-बहना, दीदी-जीजा, चाचा-चाची बेटी-बेटा सबको ही।

अरे! जो साथ रहे हैं उनको भी, जो दूर रहे हैं उनको भी, जो देश में है उनको भी, जो विदेश बसे हैं उनको भी।

  अरे! जो दोस्त बने हैं उनको भी, जो बिछड़ गए हैं उनको भी।अरे! सबको बधाई-सबको बधाई मेरी तरफ से सबकोबधाई।

हम कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर अपने पति यानी लाईफ पार्टनर के विचारों को भी बतना चाहती हूं। हम दोनों का अरेंज मैरिज है। हम दोनों को ही परिवार के लोगों ने ही एक दूसरे को पसंद किया है। हम लोगों ने एक दूसरे को देखा तक नहीं था मैं सबसे पहले इनसे प्रेमिका और पत्नी में फर्क पूछा था। हो सकता है ये विचार औरो के लिए गलत हो पर मुझे इनके विचारों ने काफी प्रभावित किया। इन्होंने

प्रेमिका और पत्नी का फर्क केवल कुछ शब्दों में स्पष्ट किया था। इन्होंने ने कहा था आज के जमाने में प्रेमिका का स्थान तब तक कायम रहता है जब तक प्रेमिका को पा न लें और पत्नी का स्थान प्यार पाने के साथ ही शुरूआत होती है और वो प्यार अजान होकर भी समर्पण भाव से एक अटूट बंधन में कई जन्मों तक बंध जाता है।

 मैं आज इतने कम समय में जहाँ भी हूँ  इनके सहयोग और प्यार के बदौलत हूँ। वर्डप्रेस, फेसबुक और ट्विटर पर अकाउंट बनाना मेरे फैमिली को पंसद नहीं है विशेषकर मेरे मायके वाले पापा जी को। परन्तु इन्होंने मेरा साथ देने के लिए लिखित फरमान जारी किया। ताकि किसी को विरोध न हो। वो डायरी पर लिखा फरमान शेयर करती हूं। 

इसी तर्ज पर कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर सबको बधाई हो।  

समय अभाव के कारण मैं भजन और सोहर इसके भाग 2में लिखूंगी। 

हल षष्ठी की व्रत कथा (ललही छठ) 13.8.17)

हल षष्ठी की व्रत कथा 

ये ब़त ललही छठ के नाम से जाना जाता है। भारतीय संस्कृति के विभिन्न  त्योहार कौन – कौन से है? मैं बताती रहती हूँ ताकि भारत में मनाया जाने वाला त्योहार का महत्व पता चल सके और उसका हमारे जीवन में क्या महत्व है समझाने की कोशिश करती हूं। 

आज 13. 8.17 को ये व़त मनाया जाएगा। जिसकी जानकारी निम्नलिखित है – 

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता श्री बलरामजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन श्री बलरामजी का जन्म हुआ था। हल षष्ठी की व्रतकथा निम्नानुसार है…. 

प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी। उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका मन गौ-रस (दूध-दही) बेचने में लगा हुआ था। उसने सोचा कि यदि प्रसव हो गया तो गौ-रस यूं ही पड़ा रह जाएगा। 

यह सोचकर उसने दूध-दही के घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए चल दी किन्तु कुछ दूर पहुंचने पर उसे असहनीय प्रसव पीड़ा हुई। वह एक झरबेरी की ओट में चली गई और वहां एक बच्चे को जन्म दिया।

हल षष्ठी की व्रत कथा

वह बच्चे को वहीं छोड़कर पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई। संयोग से उस दिन हल षष्ठी थी। गाय-भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर उसने सीधे-सादे गांव वालों में बेच दिया।

×

उधर जिस झरबेरी के नीचे उसने बच्चे को छोड़ा था, उसके समीप ही खेत में एक किसान हल जोत रहा था। अचानक उसके बैल भड़क उठे और हल का फल शरीर में घुसने से वह बालक मर गया।

इस घटना से किसान बहुत दुखी हुआ, फिर भी उसने हिम्मत और धैर्य से काम लिया। उसने झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के चिरे हुए पेट में टांके लगाए और उसे वहीं छोड़कर चला गया।

कुछ देर बाद ग्वालिन दूध बेचकर वहां आ पहुंची। बच्चे की ऐसी दशा देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि यह सब उसके पाप की सजा है। 

वह सोचने लगी कि यदि मैंने झूठ बोलकर गाय का दूध न बेचा होता और गांव की स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट न किया होता तो मेरे बच्चे की यह दशा न होती। अतः मुझे लौटकर सब बातें गांव वालों को बताकर प्रायश्चित करना चाहिए।

×

ऐसा निश्चय कर वह उस गांव में पहुंची, जहां उसने दूध-दही बेचा था। वह गली-गली घूमकर अपनी करतूत और उसके फलस्वरूप मिले दंड का बखान करने लगी। तब स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ और उस पर रहम खाकर उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया।

बहुत-सी स्त्रियों द्वारा आशीर्वाद लेकर जब वह पुनः झरबेरी के नीचे पहुंची तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि वहां उसका पुत्र जीवित अवस्था में पड़ा है। तभी उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रह्म हत्या के समान समझा और कभी झूठ न बोलने का प्रण कर लिया

(समाप्त)

|आखिर क्या है कृष्ण के 16 हजार 108 रानियों का सच?

हल छठ (षष्ठी) | Hal Chatt (Sashti) Puja Vidhi | ऐसे करें हल छठ (षष्ठी) की पूजा | Boldsky

चूंकि बलराम का प्रमुख शस्त्र हल है इसलिए इसे हल छठ कहा जाता है। माना जाता है बलराम भगवान विष्णु की शैया के रूप में विराजमान शेषनाग के अवतार हैं। इस दिन ब्रज, मथुरा समेत समस्त बलदेव मंदिरों में धूमधाम से बलराम जयंती मनाई जाती है।

पूजा विधान

हल छठ के दिन प्रातःकाल स्नानादि के बाद पृथ्वी को लीपकर एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है, जिसमें झरबेरी, पलाश, गूलर, की एक-एक शाखा बांधकर बनाई गई हर छठ को स्थापित कर देते हैं। इसकी पूजा की जाती है। पूजन में सतनजा यानी गेहूं, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा और जौ सात प्रकार के अनाज का भुना हुआ लावा चढ़ाया जाता है। हल्दी में रंगा हुआ वस्त्र तथा सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के बाद कथा सुनी जाती है।

हल षष्ठी  

हल षष्ठी

विवरण

‘हल षष्ठी’ हिन्दू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित एक प्रमुख व्रत है। इस दिन व्रत करने का विधान है, जिसका बहुत महत्त्व है।

तिथि

भाद्रपद मासकृष्ण पक्षषष्ठी

ग्राह्य वस्तुएँ

बिना हल चले धरती का अन्न, शाक व सब्जियाँ

त्याज्य वस्तुएँ

‘हल षष्ठी’ पर गाय के दूध व दही का सेवन वर्जित माना गया है।

विशेष

‘हल षष्ठी’ को दाऊजी, मथुरा में ‘हलधर जन्मोत्सव’ का आयोजन बड़ी भव्यता के साथ किया जाता है।

संबंधित लेख

बलरामदाऊजी मन्दिर, मथुरा

अन्य जानकारी

‘हल षष्ठी’ को व्रत की छ: कथाओं को सुनकर आरती आदि से पूजन की प्रक्रियाओं को पूरा किया जाता है। इस दिन शिवपार्वतीगणेशकार्तिकेय और नंदी की पूजा का भी महत्त्व है।

हल षष्ठीभाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को कहा जाता है। यह हिन्दू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित एक प्रमुख व्रत है। ‘हल षष्ठी’ के दिन मथुरा मण्डल और भारत के समस्त बलदेव मन्दिरों में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई और ब्रज के राजा बलराम का जन्मोत्सव धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन गाय का दूध व दही का सेवन वर्जित माना गया है। इस दिन व्रत करने का विधान भी है। हल षष्ठी व्रत पूजन के अंत में हल षष्ठी व्रत की छ: कथाओं को सुनकर आरती आदि से पूजन की प्रक्रियाओं को पूरा किया जाता है।

ब़त पूजन

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को ‘हल षष्ठी’ पर्व मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान शेषनागद्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में धरती पर अवतरित हुए थे। बलराम जी का प्रधान शस्त्र ‘हल’ व ‘मूसल’ है। इसी कारण इन्हें ‘हलधर’ भी कहा गया है। उन्हीं के नाम पर इस पर्व का नाम ‘हल षष्ठी’ पड़ा। इसे ‘हरछठ’ भी कहा जाता है। हल को कृषि प्रधान भारत का प्राण तत्व माना गया है और कृषि से ही मानव जाति का कल्याण है। इसलिए इस दिन बिना हल चले धरती का अन्न व शाक, भाजी खाने का विशेष महत्व है। इस दिन गाय का दूध व दही का सेवन वर्जित माना गया है। इस दिन व्रत करने का विधान भी है। हलषष्ठी व्रत पूजन के अंत में हलषष्ठी व्रत की छ: कथाओं को सुनकर आरती आदि से पूजन की प्रक्रियाओं को पूरा किया जाता है।

संतान दीर्घायु व्रत

‘हल षष्ठी’ के दिन भगवान शिवपार्वतीगणेशकार्तिकेयनंदी और सिंह आदि की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इस प्रकार विधिपूर्वक ‘हल षष्ठी’ व्रत का पूजन करने से जो संतानहीन हैं, उनको दीर्घायु और श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति होती है। इस व्रत एवं पूजन से संतान की आयु, आरोग्य एवं ऐश्वर्य में वृद्धि होती है। विद्वानों के अनुसार सबसे पहले द्वापर युग में माता देवकी द्वारा ‘कमरछठ’ व्रत किया गया था, क्योंकि खुद को बचाने के लिए मथुरा का राजा कंस उनके सभी संतानों का वध करता जा रहा था। उसे देखते हुए देवर्षि नारद ने ‘हल षष्ठी’ का व्रत करने की सलाह माता देवकी को दी थी। उनके द्वारा किए गए व्रत के प्रभाव से ही बलदाऊ और भगवान कृष्ण कंस पर विजय प्राप्त करने में सफल हुए थे। उसके बाद से यह व्रत हर माता अपनी संतान की खुशहाली और सुख-शांति की कामना के लिए करती है। इस व्रत को करने से संतान को सुखी व सुदीर्घ जीवन प्राप्त होता है। ‘कमरछठ’ पर रखे जाने वाले व्रत में माताएँ विशेष तौर पर पसहर चावल का उपयोग करती हैं।[1]

हलधर जन्मोत्सव

‘हल षष्ठी’ के दिन मथुरा मण्डल और भारत के समस्त बलदेव मन्दिरों में ब्रज के राजा बलराम का जन्मोत्सव आज भी उसी प्रकार मनाया जाता है। बलदेव छठ को दाऊजी में ‘हलधर जन्मोत्सव’ का आयोजन बड़ी भव्यता के साथ किया जाता है। दाऊजी महाराज कमर में धोती बाँधे हैं।

दाऊजी मन्दिरबलदेव

कानों में कुण्डल, गले में वैजयंती माला है। विग्रह के चरणों में सुषल तोष व श्रीदामा आदि सखाओं की मूर्तियाँ हैं। ब्रजमण्डल के प्रमुख देवालयों में स्थापित विग्रहों में बल्देव जी का विग्रह अति प्राचीन माना जाता है। यहाँ पर इतना बड़ा तथा आकर्षक विग्रह वैष्णव विग्रहों में दिखाई नहीं देता है। बताया जाता है कि गोकुल में श्रीमद बल्लभाचार्य महाप्रभु के पौत्र गोस्वामी गोकुलनाथ को बल्देव जी ने स्वप्न दिया कि श्याम गाय जिस स्थान पर प्रतिदिन दूध स्त्रावित कर जाती है, उस स्थान पर भूमि में उनकी प्रतिमा दबी हुई है, उन्होंने भूमि की खुदाई कराकर श्री विग्रह को निकाला तथा ‘क्षीरसागर’ का निर्माण हुआ। गोस्वामी जी ने विग्रह को कल्याण देवजी को पूजा-अर्चना के लिये सौंप दिया तथा मन्दिर का निर्माण कराया। उस दिन से आज तक कल्याण देव के वंशज ही मन्दिर में सेवा-पूजा करते हैं।

व्रत की विधि

  • व्रती को प्रात:काल स्नान आदि से निवृत्त हो जाना चाहिए।

  • इसके पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर गाय का गोबर लाएँ।

  • गोबर से पृथ्वी को लीपकर एक छोटा-सा तालाब बनाना चाहिए।

  • तालाब में झरबेरी, ताश तथा पलाश वृक्ष की एक-एक शाखा बांधकर बनाई गई ‘हरछठ’ को गाड़ दें। बाद में इसकी पूजा करें।

  • पूजा में सतनाजा (चनाजौगेहूँधान, अरहर, मक्का तथा मूँग) चढ़ाने के बाद धूल, हरी कजरियाँ, होली की राख, होली पर भुने हुए चने के होरहा तथा जौ की बालें चढ़ाएँ।

  • हरछठ के समीप ही कोई आभूषण तथा हल्दी से रंगा कपड़ा भी रखें।

  • पूजन करने के बाद भैंस के दूध से बने मक्खन द्वारा हवन करना चाहिए और पश्चात ओइसके कथा कहें अथवा सुनें।[2]

प्रार्थना मंत्र

गंगाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलेपर्वते।
स्नात्वा कनखले देवि हरं लब्धवती पतिम्‌॥
ललिते सुभगे देवि-सुखसौभाग्य दायिनि।
अनन्तं देहि सौभाग्यं मह्यं, तुभ्यं नमो नमः॥

अर्थात “हे देवी! आपने गंगाद्वारकुशावर्त, विल्वक, नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त किया है। सुख और सौभाग्य देने वाली ललिता देवी आपको बारम्बार नमस्कार है, आप मुझे अचल सुहाग दीजिए।”

विशेषता

  1. हल षष्ठी के दिन हल की पूजा का विशेष महत्व है।

  2. इस दिन गाय के दूध व दही का सेवन करना वर्जित माना गया है।

  3. इस तिथि पर हल जुता हुआ अन्न तथा फल खाने का विशेष माहात्म्य है।

  4. महुए की दातुन करना चाहिए।

  5. यह व्रत पुत्रवती स्त्रियों को विशेष तौर पर करना चाहिए।

  6. श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति और पुत्रों के दीर्घायु और सुख-सौभाग्य की कामना के लिए भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि को हलछठ व्रत-पूजा का विधान है। हलछठ का व्रत उत्तरभारत में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। द्वापर युग में भगवान कृष्ण के बड़े भाई के रूप में जन्मे बलराम के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में हलछठ मनाई जाती है। इसलिए इससे बलराम जयंती, ललई छठ या बलदेव छठ के नाम से भी जाना जाता है।

    आखिर क्या है कृष्ण के 16 हजार 108 रानियों का सच?

    हल छठ (षष्ठी) | Hal Chatt (Sashti) Puja Vidhi | ऐसे करें हल छठ (षष्ठी) की पूजा | Boldsky

    चूंकि बलराम का प्रमुख शस्त्र हल है इसलिए इसे हल छठ कहा जाता है। माना जाता है बलराम भगवान विष्णु की शैया के रूप में विराजमान शेषनाग के अवतार हैं। इस दिन ब्रज, मथुरा समेत समस्त बलदेव मंदिरों में धूमधाम से बलराम जयंती मनाई जाती है।

    पूजा विधान

    हल छठ के दिन प्रातःकाल स्नानादि के बाद पृथ्वी को लीपकर एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है, जिसमें झरबेरी, पलाश, गूलर, की एक-एक शाखा बांधकर बनाई गई हर छठ को स्थापित कर देते हैं। इसकी पूजा की जाती है। पूजन में सतनजा यानी गेहूं, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा और जौ सात प्रकार के अनाज का भुना हुआ लावा चढ़ाया जाता है। हल्दी में रंगा हुआ वस्त्र तथा सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के बाद कथा सुनी जाती है

    माता देवकी ने छठ का व्रत किया

    एक अन्य आख्यान के अनुसार द्वापर युग में माता देवकी ने छठ का व्रत किया था, क्योंकि खुद को बचाने के लिए मथुरा का राजा कंस देवकी की सभी संतानों का वध कर रहा था। देवर्षि नारद ने देवकी को हल षष्ठी व्रत करने की सलाह दी थी। उनके द्वारा किए गए व्रत के प्रभाव से ही बलराम और कृष्ण कंस पर विजयी हुए थे।

    यह भी है मान्यता

    हलछठ का व्रत करने वालों के बीच मान्यता है कि इस दिन ग्रामीण क्षेत्र में महिलाएं खेतों में पैर नहीं रखती है और इस दिन हल की पूजा की जाती है।

    व्रत करने वाले के लिए इस दिन गाय के दूध और दही का सेवन करना वर्जित माना गया है।

    इस दिन हल से जुता हुआ अन्न नहीं खाया जाता है। इस दिन वृक्ष पर लगे खाद्यान्न खाए जाते हैं।

    माना जाता है कि इस दिन व्रती को महुए की दातून श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति और पुत्रों के दीर्घायु और सुख-सौभाग्य की कामना के लिए भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि को हलछठ व्रत-पूजा का विधान है। हलछठ का व्रत उत्तरभारत में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। द्वापर युग में भगवान कृष्ण के बड़े भाई के रूप में जन्मे बलराम के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में हलछठ मनाई जाती है। इसलिए इससे बलराम जयंती, ललई छठ या बलदेव छठ के नाम से भी जाना जाता है।

    माता देवकी ने छठ का व्रत किया

    एक अन्य आख्यान के अनुसार द्वापर युग में माता देवकी ने छठ का व्रत किया था, क्योंकि खुद को बचाने के लिए मथुरा का राजा कंस देवकी की सभी संतानों का वध कर रहा था। देवर्षि नारद ने देवकी को हल षष्ठी व्रत करने की सलाह दी थी। उनके द्वारा किए गए व्रत के प्रभाव से ही बलराम और कृष्ण कंस पर विजयी हुए थे।

    यह भी है मान्यता

    हलछठ का व्रत करने वालों के बीच मान्यता है कि इस दिन ग्रामीण क्षेत्र में महिलाएं खेतों में पैर नहीं रखती है और इस दिन हल की पूजा की जाती है।

    व्रत करने वाले के लिए इस दिन गाय के दूध और दही का सेवन करना वर्जित माना गया है।

    इस दिन हल से जुता हुआ अन्न नहीं खाया जाता है। इस दिन वृक्ष पर लगे खाद्यान्न खाए जाते हैं।

    माना जाता है कि इस दिन व्रती को महुए की दातून श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति और पुत्रों के दीर्घायु और सुख-सौभाग्य की कामना के लिए भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि को हलछठ व्रत-पूजा का विधान है। हलछठ का व्रत उत्तरभारत में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। द्वापर युग में भगवान कृष्ण के बड़े भाई के रूप में जन्मे बलराम के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में हलछठ मनाई जाती है। इसलिए इससे बलराम जयंती, ललई छठ या बलदेव छठ के नाम से भी जाना जाता है।

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    हल छठ (षष्ठी) | Hal Chatt (Sashti) Puja Vidhi | ऐसे करें हल छठ (षष्ठी) की पूजा | Boldsky

    चूंकि बलराम का प्रमुख शस्त्र हल है इसलिए इसे हल छठ कहा जाता है। माना जाता है बलराम भगवान विष्णु की शैया के रूप में विराजमान शेषनाग के अवतार हैं। इस दिन ब्रज, मथुरा समेत समस्त बलदेव मंदिरों में धूमधाम से बलराम जयंती मनाई जाती है।

    पूजा विधान

    हल छठ के दिन प्रातःकाल स्नानादि के बाद पृथ्वी को लीपकर एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है, जिसमें झरबेरी, पलाश, गूलर, की एक-एक शाखा बांधकर बनाई गई हर छठ को स्थापित कर देते हैं। इसकी पूजा की जाती है। पूजन में सतनजा यानी गेहूं, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा और जौ सात प्रकार के अनाज का भुना हुआ लावा चढ़ाया जाता है। हल्दी में रंगा हुआ वस्त्र तथा सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के बाद कथा सुनी जाती है।

    हलछठ की कथा

    एक गांव में एक ग्वालिन रहती थी। वह गर्भवती थी और उसके प्रसव का समय समीप ही था। उसका दही-मक्खन बेचने के लिए घर में रखा हुआ था। तभी अचानक उसे प्रसव पीड़ा होने लगी, लेकिन उसने सोचा कि बच्चे ने जन्म ले लिया तो दही-मक्खन घर में ही रखा खराब हो जाएगा इसलिए वह उसे बेचने गांव में निकल पड़ी। रास्ते में उसकी प्रसव पीड़ा बढ़ गई तो वह एक झरबेरी की झाड़ी की ओट में बैठ गई और उसने वहां एक पुत्र को जन्म दिया। ग्वालिन को बच्चे से ज्यादा चिंता दूध बेचने की थी।

    बच्चे का पेट फट गया

    इसलिए वह बच्चे को कपड़े में लपेटकर झाड़ी में छोड़कर गांव की ओर चल दी। उस दिन संयोग से हल छठ थी इसलिए गांव में सभी को केवल भैंस का दूध-मक्खन चाहिए था, लेकिन ग्वालिन के पास तो गाय का दूध था। उसने पैसों के लालच में आकर सबसे झूठ बोलकर गाय के दूध को भैंस का बताकर बेच दिया। उधर जहां ग्वालिन ने बच्चे को झाड़ी में छुपाया था वहां समीप ही एक किसान खेत में हल चला रहा था। उसके बैल बिदककर खेत की मेढ़ पर जा चढ़े और हल की नोक बच्चे के पेट से टकरा जाने से बच्चे का पेट फट गया।

    बालक जीवित मिला

    किसान ने यह देखा और झरबेरी के कांटों से बच्चे का पेट सिलकर उसे वहीं पड़ा रहने दिया। ग्वालिन ने लौटकर देखा तो उसके होश उड़ गए। वह तुरंत समझ गई कि यह उसके पाप और झूठ बोलने का फल है। उसने गांव में जाकर लोगों के सामने अपने पाप के लिए क्षमा मांगी। ग्वालिन की दशा जानकर लोगों ने उसे माफ कर दिया और वह पुनः जब खेत के समीप पहुंची तो उसका बालक जीवित मिला।

    माता देवकी ने छठ का व्रत किया

    एक अन्य आख्यान के अनुसार द्वापर युग में माता देवकी ने छठ का व्रत किया था, क्योंकि खुद को बचाने के लिए मथुरा का राजा कंस देवकी की सभी संतानों का वध कर रहा था। देवर्षि नारद ने देवकी को हल षष्ठी व्रत करने की सलाह दी थी। उनके द्वारा किए गए व्रत के प्रभाव से ही बलराम और कृष्ण कंस पर विजयी हुए थे।

    यह भी है मान्यता

    हलछठ का व्रत करने वालों के बीच मान्यता है कि इस दिन ग्रामीण क्षेत्र में महिलाएं खेतों में पैर नहीं रखती है और इस दिन हल की पूजा की जाती है।

    व्रत करने वाले के लिए इस दिन गाय के दूध और दही का सेवन करना वर्जित माना गया है।

    इस दिन हल से जुता हुआ अन्न नहीं खाया जाता है। इस दिन वृक्ष पर लगे खाद्यान्न खाए जाते हैं।

    माना जाता है कि इस दिन व्रती को महुए की दातून करना चाहिए।

छत्तीसगढ़ का लोकपर्व-
हलषष्ठी (कमरछठ)

यह पर्व माताओं का संतान के लिए किया जाने वाला, छत्तीसगढ़ राज्य की अनूठी संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जिसे हर वर्ग हर जाति मे बहूत ही सद्भाव से मनाया जाता है।
हलषष्ठी को हलछठ, कमरछठ या खमरछठ भी कहा जाता है ।
यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। संतान प्राप्ति व उनके दीर्घायू सुखमय जीवन की कामना रखकर माताएँ इस व्रत को रखती है।
इस दिन माताएँ सूबह से ही महुआ पेड़ की डाली का दातून कर, स्नान कर व्रत धारण करती है।भैस के दुध की चाय पीती है।तथा दोपहर के बाद घर के आँगन मे, मंदिर-देवालय या गाँव के चौपाल आदि मे बनावटी तालाब (सगरी) बनाकर , उसमें जल भरते है।सगरी का जल, जीवन का प्रतीक है। तालाब के पार मे बेर, पलाश,गूलर आदि पेड़ों की टहनियो तथा काशी के फूल को लगाकर सजाते  है।सामने एक चौकी या पाटे पर गौरी-गणेश, कलश रखकर हलषष्ठी देवी की मुर्ती(भैस के घी मे सिन्दुर से मुर्ती बनाकर) उनकी पूजा करते है।साड़ी आदि सुहाग की सामग्री भी चढ़ाते है। तथा हलषष्ठी माता के छः कहानी को कथा के रूप मे श्रवण करते है।

इस पूजन की सामग्री मे पसहर चावल(बिना हल जुते हुए जमीन से उगा हुआ धान का चावल), महुआ के पत्ते, धान की लाई, भैस के दुध – दही व घी आदि रखते है।बच्चों के खिलौनों जैसे-भौरा, बाटी आदि भी रखा जाता है । बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों मे गेडी(हरियाली त्योहार के दिन बच्चों के चढ़ने के लिए बनाया जाता है) को भी सगरी मे रखकर पूजा करते है क्योंकि गेडी का स्वरूप पूर्णतः हल से मिलता जुलता है तथा बच्चों के ही उपयोग का है।

इस व्रत के बारे मे पौराणिक कथा यह है कि वसुदेव- देवकी के 6 बेटों को एक एक कर कंस ने कारागार मे मार डाला । जब सातवें बच्चे के जन्म का समय नजदीक आया तो देवर्षि नारद जी ने देवकी को हलषष्ठी देवी के व्रत रखने की सलाह दिया ।  देवकी ने इस व्रत को सबसे पहले किया जिसके प्रभाव से उनके आने वाले संतान की रक्षा हुई।

सातवें संतान का जन्म समय जानकर भगवान कृष्ण ने योगमाया को आदेश दिया कि माता देवकी के इस गर्भस्थ शिशु को खींच कर वसुदेव की बड़ी रानी रोहिणी के गर्भ मे पहुँचा देना जो इस समय गोकूल मे नंद-यशोदा के यहाँ रह रही है।तथा तुम स्वयं माता यशोदा के गर्भ से जन्म लेना ।

योगमाया ने भगवान के आदेश का पालन किया जिससे, देवकी के गर्भ से संकर्षण होकर रोहणी के गर्भ द्वारा जन्म लेने वाला संतान ही बलराम के रूप मे जन्म लिया ।उसके बाद देवकी के आठवें संतान के रूप मे साक्षात भगवान कृष्ण प्रकट हुए। इस तरह हलषष्ठी देवी के व्रत-पूजन से देवकी के दोनों संतानो की रक्षा हुई।

हलषष्ठी का पर्व भगवान कृष्ण व भैया बलराम से संबंधित है। हल से कृषि कार्य किया जाता है।तथा बलराम जी का प्रमुख हथियार भी है।बलदाऊ भैया कृषि कर्म को महत्व देते थे, वहीं भगवान कृष्ण गौ पालन को । इसलिए इस व्रत मे हल से जुते हुए जगहों का कोई भी अन्न आदि व गौ माता के दुध दही घी आदि का उपयोग वर्जित है।तथा हलषष्ठी व जन्माष्टमी एक दिन के अंतराल मे बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।
इस दिन उपवास रखने वाली माताएँ हल चले वाले जगहों पर भी नही जाती है।

इस व्रत मे पूजन के बाद माताएँ अपने संतान के पीठ वाले भाग मे कमर के पास  पोता (नये कपड़ों का टुकड़ा – जिसे हल्दी पानी से भिगाया जात) मारकर अपने आँचल से पोछती है जो कि माता के द्वारा दिया गया रक्षा कवच का प्रतीक है

पूजन के बाद व्रत करने वाली माताएँ जब प्रसाद-भोजन के लिए बैठती है। तो उनके भोज्य पदार्थ मे पसहर चावल का भात, छः प्रकार के भाजी की सब्जी(मुनगा, कद्दु ,सेमी, तोरई, करेला,मिर्च) भैस के दुध, दही व घी , सेन्धा नमक, महुआ पेड़ के पत्ते का दोना – पत्तल व लकड़ी को चम्मच के रूप मे उपयोग किया जाता है। बच्चों को प्रसाद के रूप मे धान की लाई, भुना हुआ महुआ तथा चना, गेहूँ, अरहर आदि छः प्रकार के अन्नो को मिलाकर बाँटा जाता है।

इस व्रत-पूजन मे छः की संख्या का अधिक महत्व है। जैसे- भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष का छठवाँ दिन,
छः प्रकार का भाजी , 
छः प्रकार के खिलौना,
छः प्रकार के अन्न वाला प्रसाद तथा
छः कहानी की कथा । 

गणेश चौथ और गणेश वंदना (10.8.17)

आज गणेश चतुर्थी  का मेरा निर्जला उपवास है। ये उपवास कुवांरी लड़कियाँ भाई के लिए वहुला व़त और विवाहित अपने पुत्र के लिए रहती हैं। 

एक बुढ़िया थी। वह बहुत ही ग़रीब और अंधी थीं। उसके एक बेटा और बहू थे। वह बुढ़िया सदैव गणेश जी की पूजा किया करती थी। एक दिन गणेश जी प्रकट होकर उस बुढ़िया से बोले-
 ‘बुढ़िया मां! तू जो चाहे सो मांग ले।’
बुढ़िया बोली- ‘मुझसे तो मांगना नहीं आता। कैसे और क्या मांगू?’ 
तब गणेशजी बोले – ‘अपने बहू-बेटे से पूछकर मांग ले।’ 

तब बुढ़िया ने अपने बेटे से कहा- ‘गणेशजी कहते हैं ‘तू कुछ मांग ले’ बता मैं क्या मांगू?’ 
पुत्र ने कहा- ‘मां! तू धन मांग ले।’ 
बहू से पूछा तो बहू ने कहा- ‘नाती मांग ले।’ 
तब बुढ़िया ने सोचा कि ये तो अपने-अपने मतलब की बात कह रहे हैं। अत: उस बुढ़िया ने पड़ोसिनों से पूछा, तो उन्होंने कहा- ‘बुढ़िया! तू तो थोड़े दिन जीएगी, क्यों तू धन मांगे और क्यों नाती मांगे। तू तो अपनी आंखों की रोशनी मांग ले, जिससे तेरी ज़िन्दगी आराम से कट जाए।’

इस पर बुढ़िया बोली- ‘यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आंखों की रोशनी दें, नाती दें, पोता, दें और सब परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें।’ 

तुने तो हमें ठग दिया। फिर भी जो तूने मांगा है वचन के अनुसार सब तुझे मिलेगा।’ और यह कहकर गणेशजी अंतर्धान हो गए। उधर बुढ़िया माँ ने जो कुछ मांगा वह सबकुछ मिल गया। हे गणेशजी महाराज! जैसे तुमने उस बुढ़िया माँ को सबकुछ दिया, वैसे ही सबको देना।

गणेश चतुर्थी

अन्य नाम

गणेश चौथ, डण्डा चौथ

अनुयायी

हिंदू

उद्देश्य

गणेश जी के पूजन और उनके नाम का व्रत रखने का विशिष्ट दिन है।

तिथि

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी

धार्मिक मान्यता

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेश जी का जन्म हुआ था।

अन्य जानकारी

गणेश जी का यह पूजन करने से विद्या, बुद्धि की तथा ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति तो होती ही है, साथ ही विघ्न-बाधाओं का भी समूल नाश हो जाता है।

गणेश चतुर्थीहिन्दुओं का त्योहार है, जो भाद्रपदशुक्लचतुर्थी के दिन मनाया जाता है। वैसे तो प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थीगणेश के पूजन और उनके नाम का व्रत रखने का विशिष्ट दिन है। श्री गणेश विघ्न विनायक हैं। ये देव समाज में सर्वोपरि स्थान रखते हैं। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेश जी का जन्म हुआ था। भगवान गणेश बुद्धि के देवता हैं। गणेश जी का वाहन चूहा है। ऋद्धि व सिद्धि गणेश जी की दो पत्नियां हैं। इनका सर्वप्रिय भोग लड्डू हैं। प्राचीन काल में बालकों का विद्या-अध्ययन आज के दिन से ही प्रारम्भ होता था। आज बालक छोटे-छोटे डण्डों को बजाकर खेलते हैं। यही कारण है कि लोकभाषा में इसे डण्डा चौथ भी कहा जाता है।

कैसे मनाएँ

  • इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर सोनेतांबेमिट्टी अथवा गोबर की गणेश जी की प्रतिमा बनाई जाती है। गणेश जी की इस प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर, मुंह पर कोरा कपड़ा बांधकर उस पर स्थापित किया जाता है। फिर मूर्ति पर (गणेश जी की) सिन्दूर चढ़ाकर षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए।

  • गणेश जी को दक्षिणा अर्पित करके 21 लड्डूओं का भोग लगाने का विधान है। इनमें से 5 लड्डू गणेश जी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राह्मणों में बांट देने चाहिए। गणेश जी की आरती और पूजा किसी कार्य को प्रारम्भ करने से पहले की जाती है और प्रार्थना करते हैं कि कार्य निर्विघ्न पूरा हो।

  • गणेश जी का पूजन सायंकाल के समय करना चाहिए। पूजनोपरांत दृष्टि नीची रखते हुए चंद्रमा को अर्घ्य देकर, ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा भी देनी चाहिए।

  • इस प्रकार चंद्रमा को अर्घ्य देने का तात्पर्य है कि जहां तक संभव हो आज के दिन चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए। क्योंकि इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने से कलंक का भागी बनना पड़ता है। फिर वस्त्र से ढका हुआ कलश, दक्षिणा तथा गणेश जी की प्रतिमा आचार्य को समर्पित करके गणेश जी के विसर्जन का विधान उत्तम माना गया है।

  • गणेश जी का यह पूजन करने से विद्या, बुद्धि की तथा ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति तो होती ही है, साथ ही विघ्न-बाधाओं का भी समूल नाश हो जाता है।

गणेश चतुर्थी की कथा

गणेश जी का पूजन सायंकाल के समय करना चाहिए। पूजनोपरांत दृष्टि नीची रखते हुए चंद्रमा को अर्ध्य देकर, ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा भी देनी चाहिए। 

एक बार भगवान शंकर स्नान करने के लिए कैलाश पर्वत से भोगावती नामक स्थान पर गए। उनके जाने के बाद पार्वती ने स्नान करते समय अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसे सतीव कर दिया। उसका नाम उन्होंने गणेश रखा। पार्वती जी ने गणेश जी से कहा- ‘हे पुत्र! तुम एक मुद्गर लेकर द्वार पर जाकर पहरा दो। मैं भीतर स्नान कर रही हूं। इसलिए यह ध्यान रखना कि जब तक मैं स्नान न कर लूं,तब तक तुम किसी को भीतर मत आने देना। उधर थोड़ी देर बाद भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिव जी वापस आए और घर के अंदर प्रवेश करना चाहा तो गणेश जी ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। 

यहाँक्रोधित होकर उसका सिर, धड़ से अलग करके अंदर चले गए। टेढ़ी भृकुटि वाले शिवजी जब अंदर पहुंचे तो पार्वती जी ने उन्हें नाराज़ देखकर समझा कि भोजन में विलम्ब के कारण महादेव नाराज़ हैं। इसलिए उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया और भोजन करने का निवेदन किया। तब दूसरी थाली देखकर शिवजी ने पार्वती से पूछा-‘यह दूसरी थाली किस के लिए लगाई है?’ इस पर पार्वती जी बोली-‘ अपने पुत्र गणेश के लिए, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है।’  

यह सुनकर शिवजी को आश्चर्य हुआ और बोले- ‘तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? किंतु मैंने तो अपने को रोके जाने पर उसका सिर धड़ से अलग कर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी।’ यह सुनकर पार्वतीजी बहुत दुखी हुईं और विलाप करने लगीं। उन्होंने शिवजी से पुत्र को पुनर्जीवन देने को कहा। तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर उस बालक के धड़ से जोड़ दिया। पुत्र गणेश को पुन: जीवित पाकर पार्वती जी बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने पति और पुत्र को भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन किया। यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को घटित हुई थी। इसलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है।गणेशजी की कथा :- 

एक बार ऋद्धि-सिद्धि पृथ्वी लोक का भ्रमण करती हुई भारतवर्ष के पाटलीपुत्र नामक नगर में पहुँची। वहां का वैभव देखकर उनकी आँखे खुली की खुली रह गई। वहां की समृद्धि का कारण जानने पर ज्ञात हुआ कि उस नगर के प्रत्येक घर  में गणेशजी की पूजा पूर्ण श्रद्धा के साथ की जाती है। भ्रमण के मध्य उनको एक अत्यंत जीर्ण शीर्ण घर दिखाई दिया। वह घर एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण का था। वे दोनों भिखारिनों का रूप धार कर पहुँची। उन दोनों को देखते से ही ब्राह्मण बोला, ” मैं गणेशजी का अनन्य भक्त हूँ, मैं आपके चेहरे के तेज और आभा को देखकर  पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूँ  कि आप दोनों भिखारिन नहीं हैं  वैसे भी इस नगर में मुझसे दरिद्र और कोई नहीं है। सच बताइए कि तुम दोनों कौन हो ? ” वे बोली, ” हे विप्रवर , पहले आप ये बताइए   कि गणेशजी के अनन्य भक्त होने के उपरान्त भी आपकी यह दशा क्यों है?” 

ब्राह्मण बोला, ” हे देवियों, मैं सोचता हूँ कि मेरी आस्था में ही कोई कमी है। मेरी दरिद्रता तो उनके प्रताप और आशीर्वाद से ही दूर हो सकती है। जिस दिन उनकी अनुकम्पा हो जाएगी उस दिन मैं भी समृद्ध हो जाऊंगा। अभी तो मैं उनकी कृपा  से संतुष्ट हूँ। वैसे मेरे पास इस समय देने को कुछ है नहीं।  तुम लोग कुछ देर पहले आती तो मैं अपने पास जो  था वउसमे से दे सकता था पर अब कुछ नही है। तुम दोनों को आशीर्वाद देना भी तुम लोगों का अपमान होगा क्योंकि तुम लोगों के  चेहरे इस बात को बता रहें हैं मैं तुमसे उच्च नहीं हूँ। अब रात्रि बहुत हो गई है अब मुझे  सोने दीजिए।  ” यह कह कर उसने दोनों को विदा कर दिया। वे दोनों अपनी यात्रा मध्य में ही छोड़कर गणेशजी के पास पहुंची और सब बात बताते हुए गणेशजी से ब्राह्मण की दरिद्रता दूर करने की अनुनय की। गणेशजी ने ब्राह्मण  को रातो रात समृद्ध बना दिया। सुबह ब्राह्मण समझ गया की यह सब गणेशजी की कृपा का ही फल है। उसको अब पका विश्वास हो गया कि वे भिक्षुणियाँ और कोई नहीं ऋद्धि-सिद्धि ही थीं।

हे गणेशजी महाराज जैसे उस ब्राह्मण की दरिद्रता को दूर कर समृद्ध किया वैसे ही अपने अनन्य भक्तों को समृद्ध बनाना। 

 अनुकरणीय सन्देश :-

  • संतोष और धैर्य का फल मीठा होता है। 

  • भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। 

  • किसी भी व्यक्ति को पूरा महत्व देना चाहिए चाहे वह कितना ही दरिद्र क्यों न हो। 

से मेरी हकीकत जुडने वाली है जिसको लिखने के लिए सूझबूझ के साथ कभी न रुकने वाली लेखनी चाहिए जैसे भागवत लिखते समय गणेश जी की लेखनी नहीं रुकीथी। 

मेरे लिखने में कोई विघ्न न आये इस लिए मैं वंदनागीत के माध्यम से करूगीं। क्योंकि जहां तक मैं जानती हूँ गणेश जी सब विघ्नों को हरने वाले हैं। और किसी भी कार्य का शुभ आरम्भ गणेश जी की वंदना से कीजाती है। 

                   पेश है दो गीत 

1.  सब देवों ने फूल बरसाये महाराज गजानन आये-2

देवा कौन है तेरी माता-2 और कौन है गोद खेलाए, महाराज गजानन आये। देवा पार्वती मेरी माता शंकर ने गोद खेलाए। महाराज गजानन आये।

देवा क्या है तेरी पूजा -2काहे का भोग लगाएं महाराज गजानन आए। 
देवा धूप दीप मेरी पूजा-2मोदक भोग लगाएं। महाराज गजानन आए। 

2.           गीत

देखो ब्रह्मा और विष्णु महेश निकले संकट काटन को श्री गणेश  निकले – 2। 

देखो राम की महिमा न्यारी है उनके साथ में जनक दुलारी हैं। 

उनके बाणों से रावण के प्राण निकले संकट काटन को श्री गणेश निकले। 

देखो ब्रह्मा की महिमा न्यारी है उनके साथ में सरस्वती माता है। उनके वाणी से वेदो का सार निकले। संकट काटन को श्री गणेश निकले। 

देखो शिवजी की महिमा न्यारी है। उनके साथ में गौरी भवानी हैं। उनकी जटा से गंगा की धार निकले। संकट काटन को श्री गणेश निकले।

देखो कृष्ण की लीला न्यारी है। उनके संग में राधा रानी है। उनके मुख से गीता का ज्ञान निकले। संकट काटन को श्री गणेश निकले।

देखो ब़ह्ममाऔर विष्णु महेश निकले संकट काटन को श्री गणेश निकले। 

देखो हनुमान की महिमा न्यारी है। उनके संग में अंजना माई है। उनके हृदय में सिया राम निकले। संकट काटन को श्री गणेश निकले

देखो तुलसी की महिमा न्यारी है उनके सामने भोजन की थाली है। उनके सामने शालिग्राम निकले। 

संकट काटन को श्री गणेश निकले। देखो ब़ह्ममाऔर विष्णु महेश निकले संकट काटन को श्री गणेश निकले। 

ये गीत लोक प्रचलित है कौन लिखा किसने बनाया और सबसे पहले किसने गाया कुछ अता पता नहीं है। एक बात बताना भूल गयी थी। जिसके पास टेप और कैसेट नहीं थे तो लिख कर ही गानों का कलेक्शन करना पड़ता था तो चुकी मुझे गीत गाने और कलेक्शन करने दोनो के शौक हैं इसलिए लिखकर डायरी मेंटेन करती हूँ। और एक बात बताऊँ मुझे तस्वीर का कलेक्शन करना अच्छा लगता है। मेरे पास 92साल पुरानी तस्वीर है जो मेरे बाबा दादी जी की है जो देखकर लगता है कि मेरे पूर्वज भी मेरी तरह शौकीन थे। वे तस्वीर ब्लैक एंड व्हाइट है जिसे मैं कहानी जहाँ सूट करेगा जरूर लगाउंगी अपने ब्लॉग के पोस्ट पर। 

नोट-जो माताएं, भाईऔर बहनें गाने के शौकीन हैं ओ लिख और गा सकते हैं मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मुझे खुद के बनाये गानों पर भी कोई आपत्ति नहीं है तो ये तो लोक में प्रचलित गीत है। हां अगर कोई सी. डी बना कोई गायक गाता है तो  खुद के बनाए गानोंपर लिखने वाले लेखक यानी मेरा नाम होना चाहिए। 

दूसरे का नाम होने पर मुझे आपत्ति सदैव रहेगी। 

 इसी के साथ आपकी अपनी रजनी अजीत सिंह 

आगे कहानी भाग-3 पढें और बताएं मेरा कलेक्शन कैसा लगा? 

।रक्षाबंधन पर मेरे एहसास और इसका इतिहास। 6.8.17

महाभारत में वर्णन हुआ है कि जब द्रोपदी का चिर हरण दुशासन ने किया तो द्रोपती ने कृष्ण को पुकारा जो कृष्ण को अपना भाई मानती थी। मेरे विचार में भगवान एक कल्पना है। मनुष्य के विचार ही भगवान है। कुविचार ही आज राक्षस प्रवृत्ति का दुशासन है। आज जो बहन के लाज के रखवाले है। वही कलयुग में द्रोपदी का भाई कृष्ण है। अपने खून के रिस्ते या एक कोरव का जन्मा ही केवल भाई-बहन नहीं होता। और जो बहन के लाज के लुटेरे है वही आजकल दुशासन है। जैसा की हम पढ़ते सुनते और जानते है कि रक्षा बन्धन क्यों मानया जाता है। रानी कर्मावती रक्षा सूत्र यानी (राखी) भेजकर हुमायूं से सहायता माँगी थी। तो यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि बहन के रखवाले जाति-पाति या किसी धर्म का मोहताज नहीं है। हमने अपने  माँ-बहनो और बड़ो से यह गाना सुना है  जब द्रोपती ने कृष्ण को पुकारा है-

              (भजन) 

मेरी अंसुवन भीगे साड़ी आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

अरे पाँच पति वाली पत्नी हूँ,

 और पाँचों के पाँच अनाड़ी  (हाय कैसे हाय कैसे ) जुवे में  हारी।

आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

यहाँ बैठै भिष्म बलशाली और,

 बैठी सभा है सारी दुशासन करे उघारी। 

आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

मेरी अँसुवन …………………………..

जो तुम नहीं आवोगे जाएगी लाज हमारी, 

तब हँसेगी दुनिया सारी आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

मेरी अँसुवन भीगे………………………. 

जरा याद करो बनवारी जब अंगुली कटी तुम्हारी (मैने फाड़ी मैंने फाड़ी) 

रेशमी साड़ी आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

मेरी अँसुवन – – – – – – .

जब बढ़ने लगी है साड़ी दुशासन गया है हारी।

मैने जान लिया  पहचान लिया साड़ी में छुपे मुरारी। 

आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

मेरी अँसुवन – – – – – – – – – – ।आ जावो कृष्ण मुरारी। 

इस गाने से स्पष्ट हो जाता अच्छे विचार वाले जब बहन की रक्षा करने पर उतरते है तो बुरे विचार रूपी दुशासन की हार ही होती है। 

अतः मैं कहना चाहूंगी हम बहनो को अच्छे विचार वाले भाई कृष्ण की जरूरत है जो, आज के दुशासन का संघार कर सके और कृष्ण जैसा भाई बनकर ‘भगवान’ बन सके।

  बेचैन बहन की तड़प और दर्द को समझने वाला उसका भगवान् कृष्ण जैसा भाई ही हो सकता है। 

              मेरे सभी वर्डप्रेस फेसबुक,  ट्विटर, पर सभी भाई के उम़ के  पाठकों को इस बहन के तरफ से रक्षा बंधन की बधाई हो। 

ये मैं  कहीं पढ़ रही थी तो मुझे जो बहुत ही मन को भा गया और मुझे विचार आया कि मैं इसे शेयर करू। मुझे नहीं पता ये किसने लिखा है पर जिसने भी लिखा है उसकी लेखनी को सच्चे मन से महसूस कर नमन करती हूं । और आधुनिक भाई या न्यू जनरेशन के भाईयों से यही वचन चाहिए मुझे ताकि लिखने वाले का सपना पूरा हो। 

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😊🙏रक्षा बंधन🙏😊

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किसी बहन ने अपने भाई के लिए बहुत ही अच्छा पोस्ट लिखा है….उस बहन को मेरा प्रणाम।            

😊🙏😊🙏😊🙏😊

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इस राखी पर भैया ,मुझे बस

यही तोहफा देना तुम ,

रखोगे ख्याल माँ-पापा का , बस यही एक

वचन देना तुम !

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बेटी हूँ मैं , शायद ससुराल से रोज़ न आ

पाऊँगी,

जब भी पीहर आऊँगी , इक मेहमान बनकर

आऊँगी !

पर वादा है, ससुराल में संस्कारों से,

पीहर की शोभा बढाऊँगी !

⚜🎊⚜🎊⚜🎊⚜

तुम तो बेटे हो , इस बात को न

भुला देना तुम ,

रखोगे ख्याल माँ -पापा का बस यही वचन

देना तुम !

⚜🎊⚜🎊⚜🎊⚜

मुझे नहीं चाहिये सोना-चांदी , न चाहिये

हीरे-मोती ,

मैं इन सब चीजों से कहाँ सुख पाऊँगी,

देखूंगी जब माँ-पापा को पीहर में खुश

तो ससुराल में चैन से मैं भी जी पाऊँगी !

⚜🎊⚜🎊⚜🎊⚜

अनमोल हैं ये रिश्ते , इन्हें यूं ही न

गंवा देना तुम ,

रखोगे ख्याल माँ-पापा का , बस

यही वचन देना तुम ,

वो कभी तुम पर यां भाभी पर

गुस्सा हो जायेंगे ,

कभी चिड़चिड़ाहट में कुछ कह भी जायेंगे ,

न गुस्सा करना , न पलट के कुछ कहना तुम !

⚜🎊⚜🎊⚜🎊⚜

उम्र का तकाजा है, यह

भाभी को भी समझा देना तुम ,

इस राखी पर भैया मुझे बस

यही तोहफा देना तुम !

रखोगे ख्याल माँ-पापा का , बस

यही वचन देना तुम ।

⚜🎊⚜🎊⚜🎊⚜

😊आप सभी भाई और बहनो को रक्षाबंधन की हार्दिक बधाई :-!

          रजनी सिंह 

😊🙏😊🙏😊🙏😊

महान ऐतिहासिक ग्रंथ महाभारत के मुताबिक एक बार भगवान कृष्णपांडवों के साथ पतंग उड़ा रहे थे। उस समय धागे की वजह से उनकी अंगुली कट गई। तब द्रोपदी ने बहते खून को रोकने के लिए अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी अंगुली पर बांधा था। भगवान कृष्ण द्रोपदी के इस प्रेम से भावुक हो गए और उन्होंने आजीवन सुरक्षा का वचन दिया। यह माना जाता है कि चीर हरण के वक्त जब कौरव राजसभा में द्रोपदी की साड़ी उतार रहे थेतब कृष्ण ने उस छोटे से कपड़े को इतना बड़ा बना दिया था कि कौरव उसे खोल नहीं पाए।

भाई और बहन के प्रतीक रक्षा बंधन से जुड़ी एक अन्य रोचक कहानी हैमौत के देवता भगवान यम और यमुना नदी की। पौराणिक कथाओं के मुताबिक यमुना ने एक बार भगवान यम की कलाई पर धागा बांधा था। वह बहन के तौर पर भाई के प्रति अपने प्रेम का इजहार करना चाहती थी। भगवान यम इस बात से इतने प्रभावित हुए कि यमुना की सुरक्षा का वचन देने के साथ ही उन्होंने अमरता का वरदान भी दे दिया। साथ ही उन्होंने यह भी वचन दिया कि जो भाई अपनी बहन की मदद करेगाउसे वह लंबी आयु का वरदान देंगे।

यह भी माना जाता है कि भगवान गणेश के बेटे शुभ और लाभ एक बहन चाहते थे। तब भगवान गणेश ने यज्ञ वेदी से संतोषी मां का आह्वान किया। रक्षा बंधन को शुभलाभ और संतोषी मां के दिव्य रिश्ते की याद में भी मनाया जाता है। 

राखी के सांकेतिक रंग

राखी से पीलेनारंगी और लाल रंग का जुड़ाव ज्यादा है। यह रंग है भी प्रेम और वफादारी के प्रतीक।

रबींद्र नाथ ठाकुर ने इन रंगों में सफेद भी जोड़ा था। सफेद रंग भाईबहनों के आपसी रिश्ते को और मजबूत बताते हुए खून के रिश्ते को दोस्ती में बदलता है।

समारोह

राखी को बड़े उत्साह के साथ इस तरह मनाया जाता हैः

बहनें अपने भाइयों के लिए पसंदीदा राखियां खरीदने के लिए काफी पहले से तैयारी करती हैं। कई बहनें अपने से दूर रह रहे भाइयों को पोस्ट के जरिए राखी भेजती हैं। भाई भी बहनों के लिए उपहार तलाशना शुरू कर देते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनके पास कितने पैसे हैं और उनका बजट क्या है।

इंटरनेट के इस जमाने मेंऑनलाइन स्टोर से सीधे राखी और उपहार भेजने का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है। कुछ तो वास्तविक राखियों के स्थान पर वर्चुअल राखियां देने की भी सोचते हैं।

राखी के दिन हर घर में उत्साह का माहौल रहता है। पूरा परिवार एकजुट होता है। परिवार के सदस्य नए कपड़े पहनते हैं। महिलाएं और लड़कियां अपनी हथेलियों पर मेहंदी लगवाती हैं। मिठाइयां बनती हैं और हर घर में एक कार्निवालसी तैयारी होती है।

घर के देवीदेवताओं की पूजा करने के बाद बहनें अपने भाई की आरती उतारती हैं। तिलक और चावल माथे पर लगाती हैं। बदले में भाई जिंदगीभर सुरक्षा का वचन देने के साथ ही उपहार भी बहनों को देते हैं।

आजादी के बाद रवींद्र नाथ ठाकुर ने शांति निकेतन में राखी महोत्सव का आयोजन किया। वे पूरे विश्व में बंधुत्व और सहअस्तित्व की भावना जगाना चाहते थे। यहां राखी मानवीय संबंधों में सद्भाव का प्रतीक है।

सशस्त्र सेनाओं को भी इस दिन नहीं भूलाया जा सकता। वर्दी वाले यह जवान हमारी सीमाओं की रक्षा करते हैं ताकि हम यहां आराम से सुरक्षित रह सके। इस दिन सीमाई इलाकों के पास रहने वाले लोग बड़े पैमाने पर सशस्त्र सेनाओं से मिलने जाते हैं। सिपाहियों की कलाइयों पर राखी बांधते हैं।

राखी की आधुनिक अवधारणा

रक्षा बंधन अब खून के रिश्तों तक सीमित नहीं हैजो भाई और बहन के बीच ही रहे। आजबहनें भी एकदूसरे को राखी बांधकर एकदूसरे को जीवनभर प्रेम और रक्षा करने का वचन देती हैं। दोस्त भी इस त्योहार को मनाने लगे हैं। आपसी रिश्ते को मजबूती देने और एकदूसरे के प्रति अपने अहसास बताने के लिए। आज रक्षा बंधन एक व्यापक नजरिये को प्रस्तुत करता है। जीवनभर नैतिकसांस्कृतिक और अध्यात्मिक मूल्य भी इसमें शामिल हैं।

कोई भी रिश्ता किसी खास दिन या उत्सव का मोहताज नहीं होता। लेकिन त्योहार और खास दिन ही हमारी रोजमर्रा की बोरियत भरी जिंदगी से दूर करते हुए हमें आपसी रिश्तों और प्रेम के प्रतीक इन त्योहारों को मनाने को प्रेरित करते हैं। हम यहां हर एक को विश्व बंधुत्व और प्रेम को अभिव्यक्त करना चाहते हैं। हैप्पी रक्षा बंधन!!!

सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा है राखी का इतिहास

 

राखी का इतिहास काफी रोचक और पुराना है. राखी का इतिहास सिंधु घाटी की सभ्यता के साथ जुड़ा हुआ है. बहन के द्वारा भाई की कलाई पर राखी बांधने की परंपरा हिंदू मुस्लिम एकता का भी परिचायक है. आपको सबसे पहले यह बता दें कि राखी की परंपरा सबसे पहले किसी सगे भाई बहन ने शुरू नहीं की थी. रक्षाबंधन की शुरूआत इतिहास के पन्नों में दर्ज है. सबसे पहले रक्षा बंधन की शुरूआत रानी कर्णावती ने की. उन्होंने मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजी. मध्यकालीन युग में जब भारत में राजपूत एवं मुगलों के बीच आपसी संघर्ष चल रहा था, तब चितौड़ की रानी कर्णावती जो राजा की विधवा थी, उन्होंने मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजी. उस समय चितौड़ पर गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह हमला करने वाले थे. तब अपने राज्य एवं प्रजा की रक्षा के लिये रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजी. हुमायूं ने अपनी मुंहबोली बहन की रक्षा के लिये बहादुर शाह को परास्त कर रक्षा बंधन के उपहार के रूप में रानी कर्णावती को उनका राज्य एवं प्रजा की सुरक्षा प्रदान किया.

सिकंदर की जान बचायी थी राखी ने

राखी का दूसरा उदाहरण तब मिलता हैं, जब राखी के एक धागे ने सिकंदर की जान बचा ली थी. कहा जाता है कि हमेशा से विजयी रहने वाले सिकंदर भारतीय राजा पुरू के पराक्रम में युद्ध शैली से विचलित थे. यहां तक की सिंकदर की पत्नी को यह डर था कि पूरू सिंकदर को परास्त कर सकते हैं और लड़ाई में सिंकदर की जान जा सकती है. तब सिंकदर की पत्नी ने भारतीय राजा पुरू को राखी भेजी थी. तब राजा पुरू ने सिंकदर की पत्नी को बहन मान लिया एवं उपहार स्वरूप युद्ध को खत्म कर दिया. इससे सिकंदर की जान बच गयी थी.

कृष्ण ने द्रोपदी को माना था बहन, बचाई लाज

रक्षा बंधन का तीसरा उदाहरण हमें त्रेता युग से मिलता है. श्रीकृष्ण ने शिशुपाल को युद्ध में मार डाला था. लड़ते लड़ते कृष्ण के बांये हाथ की अंगुली से खून बह रहा था. इसे देख द्रोपदी काफी दुखी हो गयी एवं द्रोपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़, कृष्ण की अंगुली में बांध दिया. इससे श्रीकृष्ण का खून बहना बंद हो गया और श्रीकृष्ण ने द्रोपदी को बहन मान लिया. इसके वर्षों बाद जब जुआ में पांडव द्रोपदी को हार गये, तब चीरहरण के दौरान श्रीकृष्ण ने आकर अपनी बहन द्रोपदी की लाज बचाई थी.

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नागपंचमी के दिन उज्जैन का नाग चंद्रेश्वर मंदिर का महत्व (28.7.17)

उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर : क्यों खुलता है सिर्फ साल में एक दिन

   

हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परंपरा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर का,जो की उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। 

इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि  नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।
नागचंद्रेश्वर मंदिर में  11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है।
पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।

 

सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया। 
लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है। इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है। 

यह मंदिर राजा भोज के द्वारा निर्मित है जिनके हम वंशज हैं। माँ कहानी में बताया करती थी। नाग पंचमी से मेरी बचपन की घटना और कहानी याद आ गयी। हमारे गांव में एक निर्भय बाबा सुभे दायी का मंदिर है। जहाँ नागपंचमी के दिन पूरा गाँव पूजा करता है। ऐसा माना जाता है कि निर्भय बाबा सुभे दाई की मृत्यु नाग नागिन के काटने से हुआ है परन्तु मृत्यु के समय नाग नागिन से इन लोगों को आशिर्वाद प्राप्त हुआ था। और मृत्यु उपरांत मंदिर का निर्माण किया गया है। जहाँ केवल नाग नागिन का ही स्वरुप है। यदि सांप या विछी दिखाई देता है तो बस इतना कहा जाता है “हे निर्भय बाबा सुभे दाई घर का हो तो भाग जाय वन का हो तो बंधा जाय” कह देने मात्र से वाकई में सांप या विछी या तो भाग जाते हैं या बंधा के अंधे हो के खड़े हो जाते हैं। ये कोई कहानी नहीं है।  मेरी माँ ने ये वाक्य बचपन में मंत्र स्वरूप याद कराया था जिससे हमें जहाँ भी सांप या विछी दिखता था तो हम लोगों ने प्रत्यक्ष अनुभव किया है ऐसा कहकर। 

ये मंदिर बलिया जिला और  यूपी और विहार के बावडर राजा भोज द्वारा बसाया गया भोजपुर जिला के निकट गांव शिवपुर दीयर में  आज भी स्थित है। 

ये कहानी हमारे गाँव अर्थात “रजनी सिंह” के गांव की है जो मेरा जन्म भूमि है। 

तो अब नागचंद्रेश्वर की आगे की कहानी पढें। 
यह मंदिर काफी प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए। लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं।

 

नागपंचमी पर वर्ष में एक बार होने वाले भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए शनिवार रात 12 बजे मंदिर के पट खुलेंगे। रविवार नागपंचमी को रात 12 बजे मंदिर में फिर आरती होगी व मंदिर के पट पुनः बंद कर दिए जाएंगे। 
नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है। 

 

नागपंचमी पर्व पर बाबा महाकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की गई है। इनकी कतारें भी अलग होंगी। रात में भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी होगी।

 

नागपंचमी को दोपहर 12 बजे कलेक्टर पूजन करेंगे। यह सरकारी पूजा होगी। यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। रात 8 बजे श्री महाकालेश्वर प्रबंध समिति द्वारा पूजन होगा। 

               🐍     रजनी सिंह 🐍