श्रेणी: जिंदगी

मेरे पास हो तुम

मेरे मन के बहुत पास हो तुम।
मेरे अनकहे हर शब्दों में हो तुम,

मेरे ख्वाबों – ख्यालों में हो तुम,
मेरे हर शब्दों के जज्बातों में हो तुम,
मेरे मन के बहुत पास हो तुम।
सारे सवालों के जवाब हो तुम,
मेरी रूह की अवाज हो तुम,
मेरी जिंदगी के खुशी के आगाज हो तुम,
मेरे मन के बहुत पास हो तुम।
मेरी हर बात को बिन कहे समझने वाले हो तुम,
मेरे आँखों से बहते आँसुओं के रूक जाने के सबब हो तुम,
मेरे प्यार के अनकहे अल्फाज़ हो तुम,
मेरे मन के बहुत पास हो तुम।
मेरे अकेलेपन का सहारा हो तुम,
मेरे हर दर्द का दवा हो तुम,
मेरे हर मर्ज का इलाज हो तुम,
मेरे मन के बहुत पास हो तुम।
जो शब्दों से ब्यां न कर सकूं,
जिस चाहत ने इतनों के भीड़ में अपना दिया,
उस अमीट प्यार के एहसास हो तुम,
मेरे मन के बहुत पास हो तुम।
रजनी अजीत सिंह 9.12.2018

जिदंगी की आखिरी अरमान लिख दूँ

आज अपने जीवन की अब आखिरी अरमान लिख दूँ।
कौन जाने सांसो की अब धड़कने कल सुबह चले न चले।
प्यार के एहसास के इस मेल में, अब ऐ मेरे हमदम, जीवन में ऐसी रंगीन हवा चले न चले।
जिंदगी का दौर अब खुशियों भरा, क्या पता कल खुशियों की हवा चले न चले।
कौन जाने मेरे आँखों में सपना क्या पले, देख लें सपना सुहाना क्या पता कल आँखों में सपना पले न पले।
कुछ नहीं है ठीक कि कब मौत आये इस सफर में, बातों का सिलसिला अब तुझसे चले न चले।
ख्वाब था सेहरा तुम्हारे सर देखें, तुझे देखने की हसरतें भी चल बसे।
क्या पता तेरे मन में मेरे प्यार का अब दीप जले न जले।
प्यार में जो दर्द इतना झेले हैं हम, क्या पता तुझे अब इस दर्दे प्यार का एहसास खले न खले।
दे रही हूँ आज शब्दों का उपहार मैं क्या पता अब मौत का फरमान टले न टले।
है मुझे विश्वास अंतिम समय में जब मांग मेरी सजी होगी सिंदूर से,
रस्म है जो लाली चुनर लाने की, पर क्या पता तेरे प्यार की लाली चुनर तब मुझे मिले न मिले।
आज अपने जीवन की अब आखिरी अरमान लिख दूँ।
कौन जाने सांसो की अब धड़कने कल सुबह चले न चले।
रजनी अजीत सिंह 12.12.2018

माँ तेरा प्यार मौन

माँ तुमसे दूर हुआ पर
तृप्त हुआ मन का कोना कोना
गुस्से में भी माँ हमारी
प्यार का बिछाए मौन बिछौना।
कहते लोग सौतेली माँ तो
जली रोटी को भी तरसाती है
पर तूने मेरे जीवन में प्यार की ममता बरसाया
झूम झूम मेरा तन मन हर्षाया।
मन के द्वार बंद थे सारे
लगते थे हम बस हारे हारे
तब तूने प्यार का ज्योति जलाया
मन का अंधियारा दूर भगाया
जीवन में उजियारा छाया।
संग बनकर रही ढ़ाल हमारी
मेरी खुशियों के खातिर तुम
अपने प्राण प्रिये से भी लड़ जाती
और तोड़ तुम ला देती मेरे खातिर चाँद सितारे।
तू न जाने हर पल माँ मेरा दिल तुझे पुकारे
पत्थर दिल भी तेरे प्यार से हमने पिघलते देखा है
प्रेम डोर से बाँधकर रखना कोई तुझसे सीखे
माटी की मूरत में भी प्राण डालते देखा है।
तेरे सपने थे मीठे – मीठे से और आँसू थे खारे
उलझन से उलझन में भी हमने देखा
तेरे नयन विश्वास की ज्योति जलाये।
उज्ज्वल भविष्य के निर्माणों के खातिर
कठिन डगर पर चलकर भी जीवन जीना सिखाये
सिंचित कर संस्कार से अपने
मेरी जीवन बगिया महकाये
माँ तुम से दूर हुआ पर,
तृप्त हुआ मन का कोना कोना ।
रजनी अजीत सिंह 27.11.2018

जिंदगी के सफर में रस्में प्यार के।

रस्में प्यार का कैसे अदा करते हैं, ऐ मेरे अजीज सीखा दे मुझे भी।
शब्द छू ले तेरे दिल को जो जख्म को भर दे ऐसा लिखना सीखा दे मुझे भी।
शब्दों से खेलती हूँ हर दिन पर हार जाती हूँ अनाड़ी बन, तू तो खिलाड़ी है एहसान होगा मुझपर जीतने का हुनर सीखा दे मुझे भी।
रजनी अजीत सिंह 30.10.2018
#रस्में
#प्यार

“जिदंगी के एहसास” पुस्तक के हुए साक्षात्कार के कुछ प्रश्न।

प्र01-मैं चाहता हूँ कि आप अपने पाठकों के साथ अपने बारे में कुछ सांझा करें।

उ0-मैं रजनी अजीत सिंह बनारस, (वाराणसी, काशी) की रहने वाली हूँ। इस शहर ने बहुत लेखको और कवियों को जन्म दिया है जो हिंदी साहित्य के लिए अनमोल धरोहर हैं। मैं सृजन फार्मा स्यूटिकल प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हूँ। मैं अपना काम अपने करने में विश्वास रखती हूँ। कल का काम आज और जो आज करना है वो तुरंत करके हटाने में विश्वास रखती हूँ क्योंकि कल सुबह कौन सी मुसीबत सामने होगी नहीं पता हमें। मुझे इसी पर कबीर दास का दोहा याद आ रहा है जिसे कहना चाहूंगी-

काल करे सो आज कर आज करे सो अब।

पल में परलय होगी बहुरी करेगी कब।।

अंत में यही कहना चाहूंगी “जो समय को पहचानता है, समय उसे पहचान देता है। समय को सही पहचानना ही समय का सदुपयोग है और हमें समय का सदुपयोग करने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए।”

प्र02-आप लिखने के शैली के इस विचार के साथ कैसे आये?

उ0-इस शैली में लिखने का अभिप्राय सभी को अपना संदेश पहुंचाना है। मैंने हिंदी साहित्य से एम. ए. किया है। जब मैं निराला,

सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा की रचनाओं को पढ़ती थी तो कठिन शब्दों का अर्थ समझने में काफी मसकत करनी पड़ती थी (अब आज की तरह गूगल का जमाना तो था नहीं।) तो मुझे लगा ऐसी कविता हो जो पढ़ते समझ में आ जाय जिसे कम पढ़े लोग भी समझ ले इस लिए हमने सरल शैली में यानी गद्यात्मक मिश्रित शब्दों को चुना और काव्य को तुकबंदी के माध्यम से कविता लिखना शुरू किया।

प्र03- आपको इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

उ0-जी मैंने ऐसे ही माँ के सर्गवास के बाद उनको खोने के गम में 1997 से कविता लिखना शुरू किया। उसके बाद डायरी देखने के बाद बच्चों ने वर्डप्रेस और यौरकोट पर ब्लॉग बना दिया जिस पर लिखने के बाद मैं फेसबुक, वर्डस्एप पर शेयर करने लगी। तब कितने लोग जो मोबाइल या आनलाइन पढ़ नहीं पाते थे तो हमने उन लोगों के लिए बुक पब्लिश कराने को सोची और लोगों तक मेरे विचार पहुँच सके तो ब्लू रोज पब्लिशर से बात किया और आज ये पुस्तक आपके सामने है।

प्र04-आपकी पुस्तक वास्तव में क्या बताती हैं?

उ0-मेरी पुस्तक मेरी जिंदगी का एहसास है जो काल्पनिक नहीं हकीकत की धरातल है। एक प्रकार से कह सकते हैं जीवन के विभिन्न झंझावात से गुजरने के बाद शब्द फूट पड़े हैं जो किताब में है। यदि आप पढ़ेगें तो समाज में अपने आस-पास अपने जीवन का एहसास कहीं न कहीं जरूर पायेगें। हमारी पुस्तक बताती है कि विभिन्न संघर्षों के बाद भी यदि जूनून हो तो क्षेत्र चाहे जो हो उसका सामना कर सफलता अर्जित कर सकते हैं।

प्र05-इस पुस्तक को लिखते समय आपके दिमाग में क्या चल रहा था?

उ0-जी कविता लिखती थी पर मेरी पुस्तक पब्लिश होगी ये एक सपना था जो मैं सरस्वती की कृपा मानतीं हूँ। इसलिए पुस्तक लिख रही हूँ ये दिमाग में आया ही नहीं बस मां सरस्वती की कृपा हुई और लाइन मिलता गया और आज 1997 से लिखा डायरी किताब के रूप में है। इसलिए मुझे यह कहना मुश्किल है कि किताब लिखते समय दिमाग में क्या चल रहा है।

प्र06- आप इस पुस्तक में कितना समय लगाते थे?

उ0-जी जिंदगी के एहसास बुक पब्लिश कराने हेतु यानी अपने सपना को पूरा करने हेतु हमने दिन रात एक किया यानी अपने दैनिक कार्यों को सम्पन्न करने के बाद हमने किताब के लिए एक दिन में 12घंटे तक भी समय लगाये हैं।

प्र07-क्या कोई पल आप किताब लिखने के विचार से पीछे हट गए थे।

उ0-हमनें तो अपना एहसास लिखा था ये किताब बनेगी पता ही नहीं था। हाँ जब पी. डी. एफ ओके हो गया तो मैं उसे कम से कम 15बार पढ़ा होगा कि समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। पीछे तो नहीं हटी पर मन असमंजस में अवश्य फंस गया था।

प्र02-आप अपनी तरफ से आने वाली आलोचना को कैसे सम्भालेंगे?

उ0- हिंदी साहित्य के दृष्टिकोण से देखा जाए तो आलोचना, समालोचना,समीक्षा तो आम बात है और जहाँ तक मेरे विचार को पूछा जा रहा है कि कैसे संभालेंगे आलोचना को तो मेरे विचार में कबीर दास का दोहा हिंदी साहित्य के लिए उपहार और मेरा विचार भी है। कबीर का दोहा-

निंनदक नियरे राखिये, आँगन कुटि छवाय।

बिन पानी, साबून बिना, निर्मल करे सुभाय।

इसका अर्थ है व्यक्ति को सदा चापलूसों से दूरी और अपनी निंदा करने वालों को अपने पास ही रखना चाहिए, क्योंकि निंदा सुनकर ही हमारे अंदर स्वयं को निर्मल करने के लिए साबुन पानी की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

प्र09-पुस्तक के प्रकाशन के दौरान प्रकाशक के साथ आपका अनुभव कैसा रहा है?

उ0-पुस्तक के प्रकाशन के दौरान राष्ट्रीय भाषा हिंदी होने से काफी परेशानी आयी पर पुस्तक के प्रकाशन के दौरान रजनी अजीत सिंह का अनुभव खट्टा कम मीठा ज्यादा रहा है।

प्र010-आप उभरते लेखकों की सलाह कैसे लेंगे?

उ0-हमने अभी तक हिंदी साहित्य में जितने कवियों को पढ़ा उससे बहुत कुछ सीखा है अब उभरते कवियों से आज के दौर में बदलते लोगों के विचारों को उनसे सीखना है ताकि पुरातन और आधुनिकता में समाजस्य स्थापित कर सके। क्योंकि सीखने की कोई उम्र नहीं होती है और हर इंसान से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है वो उम्र में छोटे हों या बड़े लेकिन उनका सलाह परमआवश्यक है।

धन्यवाद आपका

रजनी अजीत सिंह 3.12.2018

“जिदंगी के एहसास” पुस्तक की समीक्षा।

रजनी अजीत सिंह द्वारा रचित कविताओं का संग्रह जिदंगी के एहसास” पुस्तक की समीक्षा पूर्व रीडर उदय प्रताप कालेज के सूफी साहित्य के प्रोफेसर राम बचन सिंह जी द्वारा की गई है जो हमारे गुरु जी भी हैं। उनके कलम से निकले शब्द मेरे लिए अनमोल है। जो इस प्रकार है –

मैंने श्रीमती रजनी अजीत सिंह द्वारा रचित “जिदंगी के एहसास” नामक काव्य रचना में संकलित कविताओं को आद्योपांत पढ़ा है।सम्भवतः ये उनकी प्रथम काव्य कृति है। इस काव्य संग्रह में विभिन्न अवसरों पर उत्पन्न मनोभावों की अभिव्यक्ति ही कविता के माध्यम से प्रगट हुई है।वस्तुतः जब कवि का ह्रदय आन्दोलित होता है तो कविता का प्रस्फुटन होता है। काव्य की परिभाषा अनुसार ‘रसात्मक वाक्य’ ही काव्य माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ह्रदय की मुक्तावस्था को रस दशा कहा है और इसी मुक्ति साधना के लिए मनुष्य वाणी जो शब्द विधान करती आयी है उसे ही उन्होंने कविता की संज्ञा दी है। इस दृष्टि से विचार करने पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि विभिन्न अवसरों पर जब कवयित्री के ह्रदय में भावों का रसमय संचार हुआ है तो वह कविता के माध्यम से प्रस्फुटित हुआ है। विभिन्न प्रसंगों पर लिखी गई ये कविताएँ वास्तव में ह्रदय में रस का संचार करने वाली है। इस काव्य संग्रह की कविताएँ वास्तव में ‘रस कलश’ है जो पाठक या श्रोता के ह्रदय से तादात्म्य स्थापित करती हैं। इन कविताओं में स्वाभाविकता है, ह्रदय का स्पंदन है, मार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है।

पुस्तक के प्रारम्भ में ही पहली ही कविता में माँ का बडे़ श्रद्धा के साथ उलाहनापूर्ण स्मरण कर श्रध्दांजलि अर्पित की गयी है। यहां पुत्री का माता के प्रति ममता एवं पूज्य भावों की अभिव्यक्ति ही मार्मिक शब्दों में की गई है। माता – पिता के ऋण से व्यक्ति कभी मुक्त नहीं हो सकता। उनका स्नेहपूर्ण स्मरण ही जीवन पथ को आलोकित करने का प्रकाश पुंज है। माता-पिता के आशिर्वाद का संबल लेकर जीवन की रात्रि अधिक सरल और सुखद हो जाती है। जीवन की कठिन राह उस समय और सुगम हो जाती है जब जीवन साथी का प्रेमपूर्ण सहारा मिल जाय। पुस्तक की प्रारम्भिक कविताओं में इन भावों की मार्मिक अभिव्यक्ति की गयी है। इस काव्य संग्रह की विभिन्न कविताओं में कहीं प्यार की टीस है, कहीं करुणा की पुकार, तो कहीं वात्सल्य भावों की अभिव्यक्ति है। आधुनिक समाज के रीति नीति पर भी कवयित्री ने प्रकाश डाला है। रचनाकार के मत से समाज में केवल अंधकार ही नहीं प्रकाश भी है, घृणा ही नहीं प्यार भी है, धूप ही नहीं छांव भी है, रुदन ही नहीं हास भी है। इस मेल से ही समाज भी चलता है।

प्रकृति परिवर्तनशील है। वह पुरातनता को छोड़कर नवीनता को स्वीकार करती है क्योंकि नवीनता में ही आनन्द है। अतः परिवर्तन को जीवन का आवश्यक अंग मानकर स्वीकार लेना चाहिए। ‘प्रकृति का नियम’ कविता में इसी भाव को मनोरम वाणी में व्यक्त किया गया है। कवियित्री रजनी जी ने बड़े ही भावपूर्ण शब्दों में भावाभिव्यक्ति प्रस्तुत की है जो ह्रदय पर अमिट छाप छोड़ती है। कहीं वो प्रेम का गीत गाती है, कहीं देश-काल, समाज का यथार्थ रूप प्रस्तुत करती है और वे कहीं रहस्यवादी कवि के रूप में आत्मा-परमात्मा का एकाकार अनुभव करती है। “मैं चंचल तुम शांत प्रिये” कविता में कवयित्री ने इसी प्रकार के भावों को प्रगट किया है। “मै फूल तुम मुस्कान प्रिये, मैं गुलशन तो तुम बहार प्रिये” पढ़कर निराला जी की कविता की याद आ जाती है जिसमें वे कहते हैं – “तुम तुंग हिमालय श्रृंग और मैं चंचल गति सुर सरिता। तुम विमल ह्रदय उच्छवास और मैं कांत कामिनी कविता।” यहां कवयित्री ने अपनी इस कविता में विभिन्न उपमानों के माध्यम से रहस्यवादी दर्शन को ही प्रगट किया है।’रिश्ते मधुर हो’ कविता में विभिन्न भावों को व्यक्त करते हुए भी उन्होंने अनुभवगम्य साम्य को ही स्पष्ट किया है, उनका स्पष्ट कथन है -“अपनो को अपना बनाने में चुभे जो शूल हैं सोचकर देखो, वो दर्द भी मधुर है।” वास्तव में अपनों से मिली पीड़ा भी मधुर प्रतीत होती है। यही जीवन का सरलतम पथ है, इसे स्वीकार कर ही हम कह सकेगें –

“स्वर्ग सा घर होगा हमारा। कामना है, सब हमारे रिश्ते मधुर हो।”

निष्कर्ष रुप में कहा जा सकता है कि इस संग्रह की कविताएँ, अनमोल हैं, मर्मस्पर्शी है, भाव प्रबल है। वे मन पर अमिट छाप छोड़ने वाली है। कविताओं में उर्दू शब्दों के प्रयोग से चमत्कार भी आ गया है जो मन को गहराई तक छूता है। ‘जिदंगी की बुलंदी’ कविता में इन मनोहारी शब्दों का आनंद लिया जा सकता है।’सफलता का बोलबाला है’ कवयित्री का संकल्प प्रेरणादायक एंव उत्साहवर्धक है

“संघर्ष भरे राहों को मैं त्याग नहीं सकती,

कठिनाई जितना भी आये, मैं हार नहीं सकती”

यही युवा पीढ़ी के लिए शाश्वत संदेश भी है।

इस संकलन में लगभग सौ कविताएँ संग्रहित हैं। यदि प्रत्येक कविता की समीक्षा की जाय तो एक पुस्तक तैयार हो जायेगी। इस विस्तारमय से सभी रचनाओं की समीक्षा सम्भव नहीं है और आवश्यक भी नहीं। साथ ही यह कार्य श्रमसाध्य भी है। इस रचना के लिए रजनी जी को कोटिशः बधाई। अंत में मैं यही कामना करता हूँ कि रजनी जी आगे भी लिखती रहें, भगवान उनका मार्ग प्रशस्त करें। उनका भविष्य मंगलमय हो। रजनी जी हमारी शिष्या हैं, मेरा आशिर्वाद सदा उनके साथ है। मुझे पूरा विश्वास है कि भविष्य में उनकी लेखनी से और भी उत्कृष्ट रचनाएं पढ़ने को मिलेंगी। उन्होंने जो गुरुजनों को सम्मान दिया है, यह उनका बड़प्पन है तथा गुरु शिष्य परम्परा का आदर्श उदाहरण भी है।

रामवचन सिंह

पूर्व रीडर, उदय प्रताप कालेज

वाराणसी

ये मेरे गुरु जी की मेरी पुस्तक को पढ़ने के बाद की गई समीक्षा है जो हिंदी साहित्य के क्षेत्र में रजनी अजीत सिंह के लिए अनमोल धरोहर है।

आप लोगों से भी निवेदन है कि मेरे पुस्तक को एक बार अवश्य पढ़ें और समीक्षा नहीं तो आलोचना या समालोचना कुछ भी कर सकते हैं मुझे आपके शब्द हर्ष के साथ स्वीकार होगा।

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रजनी अजीत सिंह 29.11.2018

सुहाना सफर की मीठी यादें।

एक बोल मीठा जो तुमने मुझसे बोला,

की फूलों सा जिंदगी में रंग आ गये।

लोट-पोट जाता है खुशी से मन मेरा,

सोच – सोचकर तेरी मधुर बोलियाँ।

तेरे आज आने से उतरे हैं झूले,

हवाओं का पहनकर माँगटीका।

नाचा है मन मेरा सोचकर हँसी आ गई,

कैसे बचपन में मासूम सी तू खेला करती थी गोद में मेरे।

सोचा जो मन ने जो सुख-दुःख सहा,

शब्द बनकर कविता के रुप में आ गये।

तेरे से बाते न करके सांसो को जो चलने से रोका था,

बात हुई तो रिश्तों में गंध उतरने लगी जाड़ों की गून गूनी धूप बनकर।

कुछ खुशियों का दौर ऐसा खनका,

मन में लगी यादें देशी गुलाब सा गमकने।

तेरी आँखों में जितना पीड़ा बहकर के निकले,

सफलता की सीढ़ियाँ उतने ही चढ़ोगी।

नींदो को जितना अपने से दूर करोगी,

दुंआ है हमारी उतना ही अपने सपनों को पूरा करोगी।

जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनाएं

रजनी अजीत सिंह 4.12.2018

जिदंगी में मेरी पहचान और विश्वास।

न सुख न दुख लिखा मैंने लिखा अपनी व्यथा,अब तक सबके सम्मान के खातिर,अपने एहसास सब से छुपाये।
ये मेरे किस्मत का खेल रहा है,

शब्दों का पन्नों पर उतर जाना, अक्सर मेरे सपनों का मेल रहा है।
मैं हमेशा सोचती रही सबको खुश देखने के खातिर।
मेरी बाणीं तो शब्दों से मधु घोल रहीथी,सबको अपनाने के खातिर।
जो भी मेरा साथ निभाये ओ रिश्ते मेरे लिए अनमोल रहे हैं।
जो न निभाये उसको भी नमन करती रही,
सबको सम्मान देने के खातिर।
जाने कितनी खुशियाँ गवांई अपने कुटुम्ब में शांति लाने के खातिर।
अपने माता – पिता का कैसे विश्वास तोड़,भाग्य भरोसे कैसे अपने आपको छोड़ू।
सबके दर्द भरे बचन से घायल हुआ हमेशा ये मन।
अपने आपको तड़पाया घर घर में स्वर्ग लाने के खातिर।
मै हमेशा मन को बहलाती आई तुम सबके प्यार के खातिर।
देखो न खुशियों में सरीक तो हुआ न गया,
बस आरोप ही लगाया गया मुझपर हमेशा की तरह मुझे तड़पाने के खातिर।
मेरी पहचान मिटाना चाहा अपने दिल को तसल्ली देने के खातिर।
इधर मैं छूना चाह रही थी आकाश की ऊंचाईयों को अपने प्रिय प्यार के खातिर।
उधर पराये से बने अपने श्राप दे रहे थे मुझे गर्त में गिराने के खातिर।
पर मन ये सोचता है क्या प्रह्लाद को होलिका जला पाई थी, उसके विश्वास को क्या डिगा पाई थी। क्या नरसिंह अवतार न हुआ था प्रह्लाद के विश्वास के खातिर। क्या आज भी भक्तों के खातिर हिरण्यकशिपु का संघार न होगा। क्या आज भी देवी माँ को माँ मानने वाली का हार ही होगा। मुझे विश्वास है जीत हासिल होगी पर उपकार के खातिर।

रजनी अजीत सिंह 15.11.2018

जिदंगी में जन्म दिन की बेटे को हार्दिक शुभकामनाएं

तुम माँ के आंचल का खिलता गुलाब हो।
जिसने तुम्हें धरा पर लाया उसी आशा का दिया तुम उपहार हो।
जिसके खून का रगो में प्रवाह है उसकी खुशियों का तुम संचार हो।
हर शख्स को दो खुशी तुम बस यही विचार और विश्वास का आधार हो।
आज के दिन से तुम्हें वो भी खुशी हो हांसिल जिसका कभी किया न विचार हो।
इसी शुभकामनाओं के साथ जन्म दिन मुबारक हो।
रजनी अजीत सिंह 22.11.2018
#आशा
#विश्वास
#उपहार

जिदंगी के सफर में प्राणप्रिये के साथ जन्मदिन के खूबसूरत लम्हें।

आज के ही दिन तुम आये इस जहाँ में,
जब आये धरा पर तब मालूम न था,तुमको बनाया गया है मेरे लिए।
दिन बीते, बीते महीने और साल,
फिर वो दिन आया ईश्वर ने एक दूजे से मिलवाया।
कुछ दिन बीते अजनबियों से फिर एक दिन करीब हम आये थे।
साथ में जीना साथ में मरना ऐसी ही जाने कितनी कसमें खाये थे।
ऐसे साथ निभाना साथी हाथ कभी न छुड़ाना साथी,
हो मुश्किल कोई भी हाथ मेरा थामे रखना साथी।
हो राह कैसी भी साथ तुम चलते रहना,
मैं माँगती नहीं कुछ भी तुमसे, अब तक जैसे थे वैसे रहना,
बस ऐसे ही प्यार मुझे तुम करते रहना।
मेरी हर बात पर सलाह मुझे तुम देते रहना,
यही गुजारिश तुमसे साथ मेरा तुम अंतिम क्षण तक देते रहना।
शब्द उपहार – बेटा आशुतोष तिवारी प्रसिद्ध
सहयोगी – रजनी अजीत सिंह 21.11.2018
#जन्मदिन
#प्यार