श्रेणी: जिंदगी

हमारा समाज और शोषण

शोषण पर लिखे मेरे लेख मुझे नहीं पता समाज को प्रभावित भी करेगा या नहीं पर मेरी लेखनी “शोषण” शब्द से पीड़ित समाज को लिखने से रोक नहीं पायी। हमारे आस पास की घटनाओं को देखकर मन हमेशा अतृप्त रहता है कि मैं लेखनी के द्वारा समाज को कुछ संदेश नहीं दे पा रही। मन शोषण शब्द सुनते ही जब से होश सम्हाला तब से अब तक का चलचित्र सामने दिखने लगता है। मन का झंझावात कहता है काश मैं उस जगह पर होती तो ऐसा कानून बनाती जिससे शोषण करने वाले का खात्मा हो सके। चाहे वो शोषण जिस भी तरह का हो। परन्तु कानून व्यवस्था का लाभ उठा गलत मुकदमा दर्ज कर फसांने वाले की भी भरमार है जिसका उदाहरण नारी शोषण को लिया जा सकता है। अधिकतर यौन शोषण का शिकार या तो मजदूरी करने वाली या जिसका कोई सहारा नहीं होता था यानी बेसहारा औरतें और बाल्यावस्था का दामन छोड़ किसोरा अवस्था के तरफ कदम रखती बालिकाओं का होता है जिसे अपने शारीरिक विकास होने के बारे में भी भान नहीं होता था कि ऐसा परिवर्तन क्यों हो रहा है? आज मैं उस समाज के लोगों को पहले आभार प्रगट करती हूँ कि जिन्होंने विभिन्न शिक्षा के द्वारा बालिकाओं को जागरूक और सजग होने का पाठ पढ़ाया है जिससे काफी मात्रा में किसोरी शिक्षा के माध्यम से अच्छा और बुरा का फर्क करना सीख गयी हैं।

मैं अब उस समय की बात करना चाहूंगी जब शोसल प्लेटफार्म के द्वारा मनोरंजन का समाज में कोई साधन न था। यदि मनोरंजन का साधन था तो बस गीत गाने और तीज त्योहार पर बैठकर गपशप करना या मजाकिया रिश्तों में मजाक करना ही मात्र मनोरंजन का साधन होता था। जैसे देवर भाभी, नन्दोई सरहज, जीजा शाली का रिश्ता जिसमें लोग मजाक कर मनोरंजन कब शोषण बन जाता है पता भी नहीं चलता था।

ये मैं उन दिनों की बात कर रही हूँ जब सास पर अपने दमाद माँ अपने बेटे पर नारी होकर भी इस दर्द को अनदेखा कर आँख बंदकर विश्वास करती थी हालात तो आज भी वही है बस तब और अब में फर्क है तो बस इतना कि पहले शाली सरहजो और कमजोर औरत का शोषण होता था तो कोई बोल नहीं पाता था आज कोई कोई हिम्मत दिखा विरोध करने लगा है।

करोना महामारी के नाश के लिए प्रयास।

मैं रजनी अजीत सिंह आपको कुछ बताना चाहती हूँ, मुझे ज्यादा ज्ञान तो नहीं पर पीढ़ी दर पीढ़ी अपने पूर्वजों के द्वारा बताई गई और ज्ञान के अनुसार सिद्ध करना चाहूँगी, कई वर्षों पूर्व महामारी जैसे अनेक प्रकोप से हम पीड़ित हुए हैं और हमारा उस महामारी से निदान भी हुआ है जैसे – हैजा, चेचक, प्लेग आदि कई बिमारियां हैं जिसका कोई भी निदान नहीं था उस समय, पर अब निदान सम्भव है और अब इससे असानी से आम रोग की तरह बचा जा सकता है। वर्तमान में विदेशों में ही नहीं बल्कि हमारे देश में भी करोना वायरस जैसे महामारी से हाहाकार मचा हुआ है। मुझे पूरा विश्वास है कि इस महामारी का निदान भी हम खोज निकालेंगे। मैं एक लेखक और कवयित्री हूँ पढ़ना लिखना और अपने लेखनी के माध्यम से समाज को संदेश देना हमारा परम कर्तव्य है। उसी का हिस्सा यह लेख है। करोना जेसै बिमारी के बारे में लिखने से पहले हम चेचक, हैजा और प्लेग जैसे बिमारी का नाम ले चुके हैं। इन सबके बारे में पूरा चर्चा तो नहीं करूंगी क्यों चर्चा करने लगूंगी तो किताब बन जायेगी और असल मुद्दे से लेखनी भटक जायेगी। पर चेचक के वर्णन से हम क्या कहना चाहते हैं स्पष्ट हो जायेगा। चेचक
(शीतला, बड़ी माता, स्मालपोक्स) एक विषाणु जनित रोग है। श्वासशोथ एक संक्रामक बीमारी थी, जो दो वायरस प्रकारों, व्हेरोला प्रमुख और व्हेरोला नाबालिग के कारण होती है। इस रोग को लैटिन नाम व्हेरोला या व्हेरोला वेरा द्वारा भी जाना जाता है, जो व्युत्पन्न (“स्पॉटेड”) या वार्स (“पिंपल”) से प्राप्त होता है। मूल रूप से अंग्रेजी में “पॉक्स” या “लाल प्लेग” के रूप में जाना जाता है; 15 वीं शताब्दी में “श्वेतपोक्स” शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले “महान पॉक्स” (सीफीलिस)। चेकोपॉक्स के अंतिम स्वाभाविक रूप से होने वाले मामले (वेरियोला नाबालिग) का निदान २६ अक्टूबर १९७७ को हुआ था।
१८ वीं शताब्दी के समापन वर्ष (पांच राजशाही समेत समेत) के दौरान बीमारी ने लगभग ४००,००० यूरोपियनों को मार दिया, और सभी अंधापनों के एक तिहाई के लिए जिम्मेदार था। संक्रमित लोगों में से २०-६० प्रतिशत-और ८० प्रतिशत संक्रमित बच्चों-इस बीमारी से मृत्यु हो गई। २० वीं शताब्दी के दौरान लगभग ३००-५०० मिलियन लोगों की मौत के लिए चेम्प्क्स जिम्मेदार था। हाल ही में १९६७ में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अनुमान लगाया कि १५ मिलियन लोगों ने इस बीमारी का अनुबंध किया और उस वर्ष 20 लाख लोगों की मृत्यु हुई। १९वीं और २० वीं शताब्दी के दौरान टीकाकरण अभियानों के बाद, डब्लूएचओ ने १९८० में शीतल के वैश्विक उन्मूलन को प्रमाणित किया। श्वासशोथ को दो संक्रामक बीमारियों में से एक है, जिसे नष्ट कर दिया गया है, और दूसरी चीज है जो २०११ में समाप्त हो गई थी।
है। मिस्र में १,२०० वर्ष ईसा पूर्व की एक ममी (mummy) पाई गई थी, जिसकी त्वचा पर चेचक के समान विस्फोट उपस्थित थे। विद्वानों ने उसका चेचेक माना। चीन में भी ईसा के कई शताब्दी पूर्व इस रोग का वर्णन पाया जाता है। छठी शताब्दी में यह रोग यूरोप में पहुँचा और १६वीं शताब्दी में स्पेन निवासियों द्वारा अमरीका में पहुँचाया गया। सन्‌ १७१८ में यूरोप में लेडी मेरी वोर्टले मौंटाग्यू ने पहली बार इसकी सुई (inoculation) प्रचलित की और सन्‌ १७९६ में जेनर ने इसके टीके का आविष्कार किया।

यह रोग अत्यंत संक्रामक है। जब तब रोग की महामारी फैला करती है। कोई भी जाति और आयु इससे नहीं बची है। टीके के आविष्कार से पूर्व इस रोग से बहुत अधिक मृत्यु होती थी, यह रोग दस हजार इसा पूर्व से मानव जाति को पीड़ित कर रहा है, १८ वी सदी में हर साल युरोप में ही इस से ४ लाख लोग मरते थे, यह १/३ अंधेपन के मामले हेतु भी उत्तरदायी था, कुल संक्रमण में से २०-६०% तथा बच्चो में ८०% की म्रत्यु दर होती थी|बीसवी सदी में भी इस से ३०० से ५०० मिलियन मौते हुई मानी गयी है, १९५० के शुरू में ही इसके ५० मिलियन मामले होते थे, १९६७ में भी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसके चलते प्रति वर्ष विश्व भर में २० लाख मौते होनी मानी थी, पूरी १९ वी तथा २० वी सदी में चले टीकाकरण अभियानों के चलते दिसम्बर 1979 में इस रोग का पूर्ण उन्मूलन हुआ, आज तक के इतिहास में केवल यही ऐसा संक्रामक रोग है जिसका पूर्ण उन्मूलन हुआ है।

कहा जाता है आवश्यकता ही विज्ञान की जननी है और आज विदेश ही नहीं हमारा देश भी खतरनाक करोना वायरस के चपेट में आ गया है। कल २२.३.२०२० को जनता कर्फ्यू है तो हमारा निवेदन है कि जब हम समाज को चाहकर भी कुछ सेवा नहीं दे सकते तो कम से कम प्रकृति की देवी को इस मंत्र का जाप कर हम इस महामारी के निवारण हेतु प्रार्थना तो कर ही सकते हैं। ये मंत्र दुर्गा सप्तशती के अंतिम में सप्तशती के कुछ सिद्ध सम्पुट – मंत्र में से एक है जो महामारी नाश के लिए है जो इस प्रकार है –

जयंती मंगला काली भद्र काली कपालनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोsस्तु ते।।

चेचक के टीका लगने पर भी असहनीय पीड़ा होती थी। मुझे आज भी याद है वह पीड़ा जिसको कम करने के लिए पचरा गाकर मेरी माँ देवी माँ से प्रार्थना करती थी और मुझे महसूस भी हुआ है कि वाकई में पीड़ा कम हुई है। तो क्यों न हम और आप इस महामारी के निदान के लिए अपने मिले संस्कार के द्वारा कुछ रास्ता दिखाई दे इसके लिए देवी माँ से प्रार्थना घर में रहकर आसानी से इस मंत्र से करें जो महामारी से बचने के लिए ही है।

जय हिंद, जय भारत माँ

रजनी अजीत सिंह

करोना वायरस

जीतेंगे इस बार भी संक्रामक से जंग।
हिंदू – मुस्लिम, आपस में भाई भाई।
देश परदेश का भेद भुलाकर के,
करोना के निदान हेतु दूर होकर भी चलो कोशिश करें एक संग।
रजनी अजीत सिंह २२.३.२०२०
#वायरस

माँ अब क्या पाओगी?

हमें बदनाम करके माँ क्या पाओगी?
माँ हो तो माता का दिल रखो कुमाता बन बच्चों को सता बदनाम नहीं करते।
हम लड़खड़ा गये राह में तो ठोकर मारकर क्या पाओगी?
कभी सम्भाल भी लो अपनी बेटी समझकर क्या पता जन्नत पा जाओगी।
रजनी अजीत सिंह 15.3.20.20
#माँ
#बदनाम

पूत सपूत का अन्तरद्वंद

पैदा हुआ एक पूत बनकर हमें सपूत क्यों समझ लिया।
एक को ऊपर पहाड़ पर बैठाकर हमें नीचे क्यों छोड़ दिया।
वो कहती है आज तुझे राह में चलना सीखा दिया।
मैंने बोला राह में बहुत गढ्ढे, कुंआ आये तो मुझे चलने के लिए अकेले क्यों छोड़ दिया।
रजनी अजीत सिंह 15.3.20.20

रजनी अजीत सिंह 9.3.2020

आज का दिन मेरे लिए खास है्क्यों?क्यों कि आज मेरा जन्मदिन है। खुशी इस बात का है कि मैं आज के ही दिन जन्म ली हूं। 12 बजते ही मोबाइल फोन पर बधाई मिलने शुरू हो जाएगा। गिफ्ट भी मिलेगें, मन्दिर जाएगें, घूमने जाएंगे वैगरह वैगरह खुशियाँ मनाएँगे। आज ऐसे ही मुस्कुराती हुई खुशी से जन्मदिन मनाते – मनाते 46 साल की हो गई, यानी 46साल बीत गया है। खुशी इस बात की है कि मैं 46साल की होगई। दुःख इस बात का है कि इकतालिस साल का अनमोल समय बिना किसी उपलब्धि के गुजार दिया।

कविता
आई थी इस दुनिया में कुछ नाम कमाने के लिए।

नाम क्या कमायी रजनी रात के अंधेरे में सारी उम्र खो गई।

अभी तो बचपन का दामन पकड़े ही थे।
कि कम्बख्त बुढ़ापे के दस्तक आने ही लगे।

अभी तो बिता बचपन बड़े हुए।

जिम्मेदारी का बोझ लिए जीने लगे हम ऐसे ही।

अभी तो रजनी कुछ न किया चलने चलाने की बात तब कैसे करें।

बचे जीवन जो हैं तो अपना नाम रौशन कर लो।

वर्ना रात के अंधेरे में बचा जीवन भी खो जाएगा।

और रह जाएगा बस केवल अंधेरा ही अंधेरा।

इसलिए कुछ करके रजनी जीवन के हसीन पलो को कैद कर लो।

अपनी खुशियों को अपने रिश्तों को अपने पलू से बांध लो।

क्या पता कौन कहां, कब और कैसे बिछड़ जाए।

जन्म दिन की ढ़ेर सारी खुशियों के साथ आपकी रजनी अजीत सिंह 9.3.2020

मेरा नाम दुर्गा सा लिया जायेगा

जब नारी सम्मानित होगी, बरबस मुझे याद किया जायेगा।जहाँ कुटुम्ब बचाना होगा, वहाँ मेरा नाम दुर्गा सा लिया जायेगा।माना ऐसा कुछ ना कर पायी, जो सम्मान के काबिल हो।मैं तो दासी बनी रही करम से, कुटुम्ब में खुशियाँ बचाने के खातिर।लेकीन था मालूम नहीं इस गलती के खातिर ही सारी उम्र भटकने वाला मुझको शाप दिया जायेगा।तुलसी, मीरा मैं सीता थी जिसके आँगन की, उसने ही भर दिये अंगारे पवित्र गंगा सी बहू बेटी के आँचल में।हाँ मैं अब नारी बन कहती हूँ, मैं ही कलयुग की सीता हूँ, मैं ही मीरा मैं ही द्रोपदी, मैं ही सती सावित्री हूँ।मैं कल्कि को पाने खातिर नया इतिहास रचाऊँगी।सीता की अग्नि परीक्षा जो ले पहले उसे तपन का एहसास कराऊँगी।कलयुग का अन्त करने के खातिर कल्कि का अवतार हुआ है।या रावण भेष धर सीता को फिर छलने आया है।सीता पर दाग लगाने से पहले कल्कि को भी उसी आग में जलकर अग्नि परीक्षा देना होगा।नहीं तो अपने कर्मों का भोग मानव से बने दानव को भोगना होगा।पीड़ा देकर भी स्वार्थी मानव ने क्या खूब है रास रचाया।आँख भरी तो भी सत्ता के मद में झूम के गाया और खूब है नाम कमाया।जैसे मैं जी ली कैसे भी, क्या अब भी इस तरह जीया जायेगा।जब भी किसी का आत्म सम्मान है टूटा मेरी आँखें बरबस ही बरसी हैं।तड़पा है जब कोई बेगुनाह तो मेरा मन बिन पानी की मछली सी तड़पी है।लिखने को तैयार नहीं थी अपने मन की व्यथा को।शब्द दर्द का पहला अंकुर दुःख है मेरा जीवन साथी।माया तो जैसे खेल खिलौना, शब्द अब मेरा अस्त्र-शस्त्र बनेगा।जैसे मैंने वर्षों से सहा वार को, वैसे ही शब्द अब वार करेगा।पर अब हुआ अंत इस कलयुग का मीरा विष न पियेगी।कृपा हुई जो गिरधर की तो मीरा का विष राणा के कंठ में होगा, वह बिन विष पिये मर जायेगा।जब ये चमत्कार होगा तब काल के गाल से भी सत्यवान वापस आ जायेगा।जब धर्मयुग आयेगा तब कलयुग का बादल छट जायेगा।धर्मयुग में सत्य के राही पर अमृत की वर्षा होगी तब कुटुम्ब में हर्षोल्लास छा जायेगा।जब नारी सम्मानित होगी बरबस मुझे याद किया जायेगा।जहाँ कुटुम्ब बचाना होगा वहाँ दुर्गा सा मेरा नाम लिया जायेगा।रजनी अजीत सिंह 5.1.2020

परिभाषित

तुम मेरे हर रिस्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
भावों से परिपूर्ण वह जादू की छड़ी हो।
जो मिल जाता है तो हजारों तार सज के जलजाते हैं,
वो खुशियों की तुम लड़ी हो।
जब करूणा का सार उमड़ता है तो तुम वहाँ फूलझड़ी हो।
स्पंदित हो हर एक के जीवन में प्राण फूंक देने के लिए,
तुम्हारी जिंदगी जैसे खड़ी हो।
तुम हमारे हर रिश्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
जहाँ तुम बस्ते हो, हाँ तुम्हारी रात को वहीं खुशी मिलती है,
तभी तो तेरी रात चाँद तारो से जड़ी है,
तभी तो तुम रात की खुशियों की घड़ी हो।
तुम हमारे हर रिस्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
तुम खुश रहो तो तुम्हारी रात जागकर कभी सोकर तेरी जिंदगी में,
खुशियों के खातिर जैसे हर वक्त तेरे गले पड़ी हो।
तुम मेरे हर रिस्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
रजनी अजीत सिंह 22,4.2019
#परिभाषित
#जिंदगी
#yqbaba
#yqhindi
#yqdidi

पतझड़ का मौसम जान सखी

पतझड़ का मौसम आया सखी, जो पुरातन पत्तों को झाड़ गया।
पर आस लगी फिर भी तरु की, जीवन डाली को थाम सखी,
पतझड़ का मौसम जान सखी।
पुरातन पत्ते टूट गये, मरकत के साथी छूट गये।
अटके विश्वास के तरु पर दो प्रीत पात,तुफानी पवन से लड़ करके,
जीवन डाली को थाम सखी, पतझड़ का मौसम जान सखी।
लुक छिपकर आयेंगी बहार सखी, तरु पर पल्लव भी आयेगा।
फल फूल सभी लग जायेगा, बदलते ऋतु के साथ,
मौसम भी बदल जायेगा।
प्रकृति के नियमों को जान, समय की यही है माँग सखी।
बसंत ऋतु फिर आयेगी, कू कू कोयल गायेगी,
फिर मधुर गीत सुनायेगी, जीवन में खुशियाँ छायेंगी।
पतझड़ का मौसम जान सखी, जीवन डाली को थाम सखी।
रजनी अजीत सिंह 9.9.2019

जिंदगी की हर खुशी लुटा आयी हूँ।

जिंदगी की हर खुशी तुझ पर लुटा आयी हूँ।
अपनी हस्ती को भी मिटा प्यार से सबको गले लगा आयी हूँ।
उम्र भर की जो कमाई थी इज्जत की दौलत, वो अपने कुटुम्ब पर लुटा आयी हूँ।
आज शब्दों से जो लेखनी चलायी, आँखों में गंगा बहा लायी हूँ, आग बहते हुए पानी में लगा आयी हूँ।
तूने कहा था क्या? हटा दूँ मैं वो डरावनी यादें, तूने चाहा था भूला दूँ मन में बसी उनकी मेरे प्रति नफरतें।
हाँ बदल डाला मैंने कितनों की तदवीरें, पर नहीं बदल सकती उनकी तकदीरें।
आज शब्दों से जो कागज पर लेखनी चलायी,
तो आँखों में गंगा बहा लायी हूँ, आग बहते हुए पानी में लगा आयी हूँ।
तेरे खूशबू से बसा मेरा जीवन उसे मैं भुलाती कैसे?
दुःख में भी खिलाया जो अपने हाथों से निवाला, उस प्यार के मिठास को झुठलाती कैसे?
मुझे जो हमेशा मेरे रिश्ते में देते रहे गाली उसके मन में छुपी नफरतों को नकारती कैसे?
आज जो शब्दों से कागज पर लेखनी चलायी है, तो आँखों में गंगा बहा लायी हूँ ।
आग बहते हुए पानी में लगा आयी हूँ।
जिस प्यार को दुनिया से छुपाये रखा, उसे ताउम्र गले से लगाए रखा।
उनकी नफरत भरी निगाहें, मुँख से निकले बद्दुआंऔर तानों के बीच भी अपना इमान बनाये रखा।
जिनका हर लफ्ज़ चुभा है दिल में शूलों की तरह, वो याद है मुझे पैगाम-ए-जबानी की तरह।
मुझे जो प्यारे थे जी जान की तरह, तुझे दुनियां के निगाहों में बसने के लिए जो लिखे थे नज्म।
पास रहकर भी साल-हा-साल लिखे थे तेरे नाम के खत, कभी दिन में तो कभी रात को उठकर लिखे थे।
तेरे प्यार गये, तेरे खत भी गये, तेरी यादें भी गयी, तेरी तस्वीरें भी गयी, तेरे लिफाफे भी गये।
एक युग खत्म हुआ, स्याही से लिखने के फसानें टभी गये, सोसल प्लेटफॉर्म पर मैसेज कर लाइक कमेन्ट के चलन भी आ गये, पर तेरा प्यार न लिख पाये इस जहाँ में।
आज शब्दों से जो कागज पर लेखनी चलाई, तो आँखों में गंगा बहा लायी हूँ, आग बहते हुए पानी में लगा आयी हूँ।
कितना बेचैन था नैनो का नीर, आँखों से बहने के खातिर, जो भी अश्रुधारा बहा था वो उन्हीं के लिए बहनें को बेकल था।
प्यार अपना भी तो गंगा की तरह निर्मल था, तभी तो तन्हाई में भी मिलन की खुशियाँ दिल में उतर आयी थी।
आज शब्दों से जो कागज पर लेखनी चलायी, तो आँखों में गंगा बहा लायी हूँ, आग बहते हुए पानी में लगा आयी हूँ।
रजनी अजीत सिंह 6.7.2019