Category: जिंदगी

हमारा समाज और शोषण भाग १

शोषण पर लिखे मेरे लेख मुझे नहीं पता समाज को प्रभावित भी करेगा या नहीं पर मेरी लेखनी “शोषण” शब्द से पीड़ित समाज को लिखने से रोक नहीं पायी। हमारे आस पास की घटनाओं को देखकर मन हमेशा अतृप्त रहता है कि मैं लेखनी के द्वारा समाज को कुछ संदेश नहीं दे पा रही। मन शोषण शब्द सुनते ही जब से होश सम्हाला तब से अब तक का चलचित्र सामने दिखने लगता है। मन का झंझावात कहता है काश मैं उस जगह पर होती तो ऐसा कानून बनाती जिससे शोषण करने वाले का खात्मा हो सके। चाहे वो शोषण जिस भी तरह का हो। परन्तु कानून व्यवस्था का लाभ उठा गलत मुकदमा दर्ज कर फसांने वाले की भी भरमार है जिसका उदाहरण नारी शोषण को लिया जा सकता है। अधिकतर यौन शोषण का शिकार या तो मजदूरी करने वाली या जिसका कोई सहारा नहीं होता था यानी बेसहारा औरतें और बाल्यावस्था का दामन छोड़ किसोरा अवस्था के तरफ कदम रखती बालिकाओं का होता है जिसे अपने शारीरिक विकास होने के बारे में भी भान नहीं होता था कि ऐसा परिवर्तन क्यों हो रहा है? आज मैं उस समाज के लोगों को पहले आभार प्रगट करती हूँ कि जिन्होंने विभिन्न शिक्षा के द्वारा बालिकाओं को जागरूक और सजग होने का पाठ पढ़ाया है जिससे काफी मात्रा में किसोरी शिक्षा के माध्यम से अच्छा और बुरा का फर्क करना सीख गयी हैं।

मैं अब उस समय की बात करना चाहूंगी जब शोसल प्लेटफार्म के द्वारा मनोरंजन का समाज में कोई साधन न था। यदि मनोरंजन का साधन था तो बस गीत गाने और तीज त्योहार पर बैठकर गपशप करना या मजाकिया रिश्तों में मजाक करना ही मात्र मनोरंजन का साधन होता था। जैसे देवर भाभी, नन्दोई सरहज, जीजा शाली का रिश्ता जिसमें लोग मजाक कर मनोरंजन करते थे मजाक कब शोषण बन जाता है पता भी नहीं चलता था।

ये मैं उन दिनों की बात कर रही हूँ जब सास अपने दमाद पर, माँ अपने बेटे पर, पत्नी अपने पति पर नारी होकर भी इस दर्द को अनदेखा कर आँख बंदकर विश्वास करती थी हालात तो आज भी वही है बस तब और अब में फर्क है तो बस इतना कि पहले शाली सरहजो और कमजोर औरत का शोषण होता था तो वो बोल नहीं पाती थीं आज कोई कोई हिम्मत दिखा विरोध करने का साहस दिखाने लगी हैं ।

इस पर लेखनी और लेखिका कुछ दर्द अपना बंया कहना चाहती है –

आखिर क्यों हार जाती है लेखनी शोषण रुपी गड़े हुए मुर्दे को उखाड़ने में?

क्य शोषण रुपी दबे हुए निष्क्रिय , स्थिर, अवशेषों को उकेर कर अपने आप को दर्द से निजात दिला पाती है लेखनी?

क्या जीत नहीं जाती लेखनी समाज के सामने उसका असली चेहरा सामने ला बिना किसी को बर्बाद किये?

क्या शांत, निःशब्द प्रकृति का चित्रण करने के लिए चलाई थी ये लेखनी?

क्या मासूम की जिंदगी के दर्द को ब्यां कर उसके दर्द से निजात दिला सकती है लेखनी?

क्या शोषण हुए जिस्म के घाव को मरहम की जगह जख्म को कुरेद कर हरा नहीं कर जाती है लेखनी?

क्या उदासीन शब्दों को भी जीवंत कर देती है लेखनी?

किसी ने कहा है छिपे हुए प्रतिभा को भी उड़ान भरने का काम करती है लेखनी।

पर मैं पूछती हूँ लेखनी से, क्या लेखनी में वो दम है जो शोषित को न्याय दिला सके अपने शब्दों से?

ये सत्य है न्याय दिलाना तो दूर जीवीकोपार्जन का दूसरा साधन न हो तो दो रोटी भी स्वाभिमान से नहीं दिला पाती है लेखनी।

और फिर बोटी नोचने के लिए शोषित को शोषण कर्ता के संमुख ला खड़ा करती है जिंदगी।

ऐसे में लेखनी लेखिका क्या करे? वो स्वछंद विचरण तो कर सकती है शब्दों से।

पर हर पल वह खुद टूट कर बहुत कुछ कह जाती है पन्नों पर अनगिनत सवालों का जवाब लिए शब्दों के रुप में विखरकर।

रजनी अजीत सिंह 1.9.2020

15अगस्त

देख तिरंगा अपना सर गर्व से ऊँचा हो जाता है।
जन-गण-मन की धुन सुनकर सब सम्मान में उठ खड़ा हो जाता है।
शूर-वीरों ने अपना प्राण दिया उनके सम्मान में सर अपने आप झुक जाता है।
समझा सबकुछ देश को ही अजादी चाहने वालों ने अपनी जान और स्वार्थ की परवाह नहीं की थी।
पर आज देश की हालत देख मन मेरा रोता है।
आज देश के कितने लोगों को बस अपना स्वार्थ ही भाता है।
कोई छप्पन भोग करे तो कोई रोटी को तरस जाता है।
जाति-धर्म को लेकरके बस अपने स्वार्थ के लिए नारा लग जाता है।
नहीं याद उनको की अजादी दिलाने वाले शूर-वीर हर धर्म के सपूतों ने अपना जान गंवाया था।
कम से कम उनके सम्मान में जाति-धर्म को लेकर देश के टुकड़े ना करते।
जाति धर्म से पहले सब अपने देश को ऊपर ही रखते।
उसी को देश का नायक चुनते जो देश की उन्नति कर उसको शिखर पर ले जाते।
रजनी अजित सिंह 14.8.18
15अगस्त के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं।
🇮🇳🇮🇳जय हिंद, जय भारत। 🇮🇳🇮🇳

झरोखे से झाँकती जिंदगी का बैक मैटर।

मेरी पहली पुस्तक “जिंदगी के एहसास” और दूसरी पुस्तक “शब्दों का सफर ” को सफलता पूर्वक समाज के सामने प्रस्तुत करने में कामयाब होने के बाद तीसरी पुस्तक “झरोखे से झाँकती जिंदगी” मेरा वह संग्रह है जिसमें आपको कविता, भजन, गीत के साथ कहानी भी पढ़ने को मिलेंगी । पढ़ने के बाद आप महसूस करेंगे कि उन सभी इतिहास के क्षणों को जो समाज, पूर्वजों और रिश्तों का हिस्सा है,वेआख्यान जो मेरे मस्तिष्क में चलचित्र की तरह प्रतिक्षण चलायमान रहते हैं। स्मृतियों के उन्ही चित्रों को शब्दों के माध्यम से उकेरने का मेरा एक प्रयास भर है।
“जब कोई प्रिय या अप्रिय क्षण दिलो दिमाग में धंस जाती है तो साहित्य के अनेक विधाओं के रुप में समाहित हो जाती है।”
रजनी अजीत सिंह एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पोती और भूतपूर्व सैनिक की बेटी हैं इसलिए इनके चरित्र में वीरता और साहस कूट कूट कर भरा है। बाकी आप इनका व्यक्तिव और स्वभाव इनके दोनों रचनाओं और“झरोखे से झाँकती जिंदगी “रुपी संस्मरण को पढ़ने के बाद समझ सकते हैं।
“प्यार मिला, ठेस लगी, गम मिला तो क्या हुआ? कभी कहानी, कभी कविता, कभी लेख, कभी आलोचक, तो कभी डायरी और कभी संस्मरण बनकर जिंदगी की हकीकत सामने आई।1997से लिखने की शुरु हुई ये कहानी, जाने कब तक अर्थात सांस थम जाये तब तक लिखती रहूँ।” यही रजनी अजीत सिंह की हार्दिक इच्छा है।

दूरदर्शन उत्तर प्रदेश चैनल पर काव्य संगोष्ठी का प्रसारण।

आज 6.8.20 को रात 10.30 पर डी डी उत्तर प्रदेश काव्य संगोष्ठी केआये प्रसारण के कुछ पल जो जिंदगी में खुशियों से आँचल भर गयी।

सपनो को मंजिल मिल गयी।

सभी को सूचित किया जाता है कि दूरदर्शन पर( डी डी नेशनल पर) 5अगस्त रात दस बजे काव्य संगोष्ठी का प्रसारण है। जिसमें मेरे गुरु डा०रामसुधार जी सु श्री हिमांशु उपाध्याय जी और एक सम्मानित महानुभाव तथा रजनी अजीत सिंह ने भाग लिया। राम सुधार जी ने कोरोना जैसे महामारी पर प्रकाश डालते हुए मैं” निरुत्तर हूँ” कविता का वाचन किया तो वही भूतपूर्व पत्रकार हिमांशु उपाध्याय जी ने गीत के माध्यम से विलुप्त होते चीजो पर प्रकाश डाला तो एक सम्मानित पी सी एस अधिकारी ओम धीरज जी ने मुक्तक के माध्यम से संगोष्ठी को सिंचित किया। तो वहीं रजनी अजीत सिंह ने अपनी पुस्तक “जिंदगी के एहसास” से जिंदगी “एक पहेली है “और नारी अबला नहीं जरूरत पड़ने पर काली भी है उसको जागरूक करते हुए अपने आने वाली तीसरी बुक “झरोखे से झांकते शब्द” की कविता जब नारी सम्मानित होगी “का वाचन किया।कविता
सपनों को मंजिल मिल गया,कांटो में फूल खिल गया।असफलता से हट सफलता मिल गया।जिंदगी कोरोना का शिकार भी हो तो गम नहीं।हमारी मां के संस्कारों का फल मिल गया।सपनो को मंजिल मिल गया,कांटो में फूल खिल गया।कोरोना तू हर दिन कहर बरसाता है,पर मुझे खुशी है, मेरे सपनों का मंजिलकरोना काल में मिल गया।तू बहुत भयानक बुहान से आया वायरस नहीं,समुद्र मंथन से निकला विष है।अब तो शिव जैसा हलाहल विष पीने वाला चाहिए।मैं पूछती हूँ धर्म मजहब के पाखंडियों से,कोई है जो शिव को साकार करने का जज्बा रखता हो,जो हलाहल विष को धारण कर ले।सब्र रख अमृत भी निकलेगा पर समुद्र मंथन से बहुत कुछ निकलना बाकी है।सपनो का मंजिल मिल गया, कांटो में भी फूल खिल गया।रजनी अजीत सिंह 16.7.2020

झरोखे से झाँकती जिंदगी

पहली पुस्तक जिंदगी के एहसास “और” शब्दों का सफर ” के माध्यम से सफलता पूर्वक समाज के सामने प्रस्तुत करने में कामयाब हुई। तीसरी पुस्तक “झरोखे से झाँकती जिंदगी मेरा वह संग्रह है जिसमें आपको कविता, भजन, गीत भी पढ़ने को मिलेगा। पढ़ने के बाद आप एहसास करेंगे कि इतिहास के क्षणों को जो पूर्वजों का हिस्सा है उसे साहित्य रुपी अतित के चल चित्र मस्तिष्क के तल में अंधकारमय कुएं से जल निकालने का प्रयास है।”जब कोई प्रिय या अप्रिय क्षण दिलो दिमाग में धंस जाती है तो प्रतिक्षण किसी न किसी पटल की तलाश करती है।
रजनी अजीत सिंह एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पोती और भूतपूर्व सैनिक की बेटी हैं इसलिए इनके चरित्र में वीरता और साहस कूट कूट कर भरा है। बाकी आप इनका व्यक्तिव और स्वभाव इनके दोनों रचनाओं और“झरोखे से झाँकती जिंदगी ” रुपी संस्मरण को पढ़ने के बाद समझ सकते हैं।”ठेस लगी, प्यार मिला, गम मिला तो क्या हुआ? कभी कहानी, कभी कविता, कभी लेख, कभी जीवनी, कभी संस्मरण तो कभी डायरी, कभी आलोचक, और कभी भविष्यवाणी बनकर जिंदगी की हकीकत सामने आई।19.10.97से शुरू हुई ये लिखने की कहानी जाने कब तक अर्थात सांस थम जाये तब तक लिखती रहूँ।” यही रजनी अजीत सिंह की हार्दिक इच्छा है।

परिश्रम ही सफलता की कुंजी है

सबसे पहले मैं ये बता दूँ कि परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। आज जो मैं लिखने जा रही हूँ वो कोई मन गढ़त कहानी नहीं है न ही मेरी कल्पना की उपज है। वल्कि ये 100%सत्य है।(हौसला)हौसला रखने वालों की कभी हार नहीं होती।चुनौती चुन चुन कर आती है डर जाने से नौका पार नहीं होती।जीवन में जो आये लहर तो कूद लहर काटो।दुनिया चाहे पीछे पड़ी हो लक्ष्य को तुम साधो।लक्ष्य साध जब आते हैं तो दुनिया साथ होती।हौसला रखने वाले की कभी हार नहीं होती।मंजिल पाना हो तो राही चलते ही जाओ।कंकड पत्थर कांटो से तुम हार नहीं जाओ।चलते चलते राही को मंजिल मिल ही जाती।हौसला रखने वाले की कभी हार नहीं होतीअन्त मैं बस इतना ही कहना चाहूंगी कि यदि हर लड़की को मौका दिया जाय तो हर लड़की कुछ न कुछ कर सकती है लेकिन हमारा समाज साथ देने के बजाय टांग खींचने में ज्यादा विश्वास करता है। और हर लड़की को कुछ उपलब्धि हासिल करने के बजाय शादी को ही सबसे बड़ी उपलब्धि मान बैठता है। मां बाप को फर्क भले न पड़े लेकिन समाज को शादी जैसी उपलब्धि दिलाने में, एहसास कराने में, टांग खींचने में समाज का भरपूर योगदान मिलता है। मेरा लिखने का एक मात्र उद्देश्य है समाज को जागरूक करना और उस लड़की या औरत को सहयोग करना जिसके द्वारा हर औरत या लड़की किसी लाइन को चुनकर एक मिसाल कायम करना चाहती हैं। सुना है लेखनी में बहुत शक्ति होती है। शायद मेरी ये लेखनी समाज को जगाने का काम कर जाय और हम जैसे छोटे रचना कारों को भी कुछ उपलब्धि मिल जाय।नोट – मैंने अपने कविता में कंकड़, पत्थर और कांटा को समाज में टांग खींचने वालो के ही अर्थ में किया है। माफी चाहूंगी सब ऐसा नहीं करता है लेकिन जो ऐसा करता है उसको मैं कंकड़, पत्थर और कांटे ही समझती हूं।16.7.2020

इन हंसीन लम्हों के साथ आगे बढ़ती जाओ।दुनिया में ऐसे ही आगे बढते हुए माँ बाप और हम लोगो का नाम रौशन करती ही जाओ।आज मोदी जी के साथ मेरी बहन आईएफस रूचि और आइएएस, आईएफस के ट्रेनिंग मंसूरी का यादगार साथ का पिक।रजनी अजीत सिंह सिंहं

‘जिदंगी के एहसास,पुस्तक विमोचन का भाग – 2

कार्यक्रम की संचालिका रुचि सिंह ने रजनी अजीत सिंह को कुछ कहने और अपने पुस्तक से एक कविता का वाचन करने को कहा। रजनी अजीत सिंह ने उपस्थित सभी अतिथियों को अभिन्नदन करते हुए अपने शिक्षा दीक्षा से अवगत कराया।

उन्होंने कहा कि उदय प्रताप कालेज से सन 1998 में एम. ए. हिंदी साहित्य से किया। उस समय हिंदी विभाग में डा. राम बचन सिंह,

स्वर्गीय विश्वनाथ प्रताप सिंह, डा. जयनारायण तिवारी, राम सुधार सिंह, डा. मधु सिंह थी। रजनी अजीत सिंह को बहुत दुख था कि तिवारी सर और विश्वनाथ सिंह विमोचन में नहीं थे पर उनकी तस्वीर आशिर्वाद हेतु लगाई गई थी। रजनी अजीत सिंह ने’जिंदगी के एहसास’ नाम की पुस्तक पृष्ठ संख्या 22 शीर्षक “हमे अपने आप से लड़ना होगा” का स स्वर वाचन किया –

बाधाएं आये चाहे जिंदगी में जितनी हमें अपने आप से लड़ना होगा।
घिरकर आयें घनघोर घटाएँ, बढ़ जाये प्रलय आने की आशंकाएं इन सब से आगे बढ़ टकराना होगा।
मंजिल पाने की दिशा में, चाहे भड़कती ज्वालाएं हो, पांव के नीचे अंगारे हो, बढ़ता तुफान हो इन सबसे टकराना होगा।
जिन हाथों में झूला झूलें, जिनके गोद में लोरी सुन के सोये सूूकूंन से सब कुछ भूलाकर,
उसके सपनों के वास्ते हँसते हँसते कदम से कदम मिलाकर चलना होगा।रुदन को हास्य में, दुःख को सुख में बदलना होगा।
वीरानों को उद्यानों में, पीड़ाओं में भी सुख का एहसास कर पलना होगा।
माँ के सपनों और शांति के लिए कदम से कदम मिलाकर चलना होगा।

रजनी अजीत सिंह ने अपने बारे में बताते हुए कहा कि वे लिखने के लिए कैसे प्रेरित हुई। इनकी शिक्षा उदय प्रताप कालेज से प्राप्त हुई। जहाँ इनको बोलने का अवसर मिलता था तो मैं हरिवंशराय बच्चन, निराला जी, जयशंकर प्रसाद के रचनाओं का ही चुनाव करती थी। 1998 में मेरे गुरु राम बचन सर का विदाई समारोह का आयोजन किया गया था

जिसमें शिव प्रसाद सिंह आये हुए थे इन्होने कहा कि मैं उनकी रचना अपने कोर्स के बुक में ‘कर्म नाशा की हार पढ़ा था। जब उनसे पहली बार मिली तो जैसे लगा कोई सपना पूरा हो गया, वर्षों की तमन्ना पूरी हो गई और मैं उनसे काफी प्रभावित हुई थी।

शिवप्रसाद सिंह का जन्म 1939 जलालपुर बनारस में हुआ था। इनका उपन्यास-अलग अलग बैतरणी, गली आगे मुड़ी है, नीला चाँद, आदि अलग अलग विधा जैसे उपन्यास, कहानी, निबंध, आलोचना इन्होने लिखा है जिसको पढ़कर मन भाव विभोर हो उठता है। आगे मेरी इच्छा है कि मैं आने वाले समय में अलग अलग विधाओं में रचना करुं आप लोगों के आशिर्वाद से।

अन्तिम में रजनी सिंह ने कहा कि मुझे नहीं पता मेरी कविताएँ कैसी हैं इसमें कितनी त्रुटि है पर इतना जानती हूँ कि ये मेरा सपना और पल पल का एहसास है इसमें जो भी त्रुटि होगी अपना शिष्य बना कर मुझे मार्ग दर्शन करने की कृपा बनाये रखें।

उसके बाद गुरुजनों ने रजनी अजीत सिंह को अपने गरिमामय शब्दों से उन्हें प्रोत्साहित किया जिसका विवरण संक्षेप में दिया जा रहा है।
रजनी अजीत सिंह की अभिव्यक्ति ‘जिंदगी के एहसास “का लोकार्पण हुआ।
कविता गहन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति होती है। कवि अपने आस-पास के परिवेश और उसके विसंगतियों को देखकर उसे आत्मसात करता है और शब्दों के माध्यम से व्यक्त करता है। उक्त बातें शिवपुर सेंट्रल जेल के पास स्थित विक्रम पैलेस होटल में कवयित्री रजनी अजीत सिंह की काव्य कृति ‘जिदंगी के एहसास’ के उद्घाटन के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में

डा. राम बचन सिंह ने कवियत्री रजनी सिंह की कविताओं में अभिव्यक्त विचारों की प्रशंसा करते हुए बताया कि इन कविताओं में समकालीन महत्वपूर्ण समस्याओं को उठाया गया है।

विशिष्ट अतिथि डा. राम सुधार सिंह ने बताया कि रजनी अजीत सिंह की कविताएँ हमें आश्वस्त करती हैं कि इसकी भाषा सरल होते हुए भी प्रभाव छोड़ती हैं। उदय प्रताप कालेज हिंदी विभाग की अध्यक्ष डा. मधु सिंह ने कहा कि

आज के समय में लोग साहित्य से दूर होते जा रहे हैं इस कारण अशांति है कविता हमें संस्कारित करती है। इस अवसर पर इनकी सहेली पींकी चतुर्वेदी ने कहा कि

मैं रजनी अजीत सिंह को 1997 से जानती हूँ। उनकी कविताओं में झंझावात, पीड़ाएं, समाज से लड़ने का अंतर्द्वंद जो भी दिखाई देता है वो कहीं न कहीं उनकी अपनी ज़िंदगी की भी सच्चाई रही है जो आज कविता के माध्यम से हमारे सामने है। इस अवसर पर

अजीत सिंह ने कहा कि कवियत्री रजनी सिंह कविताओं का संकलन उनके धैर्य और रजनी के परिश्रम का फल है।

श्रीमती गायत्री देवी,

नितेश सिंह, नेहा सिंह,

अभिनव सिंह, सृजन सिंह, विशेष सिंह ने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग दिया। कार्यक्रम का संचालन

रुचि सिंह ने तथा धन्यवाद के साथ समापन अजीत सिंह ने किया।

विस्तृत जानकारी “जिदंगी के एहसास” के विमोचन भाग – 3 किया जायेगा।

रजनी अजीत सिंह 13.11.2018

माँ तेरा प्यार मौन

माँ तुमसे दूर हुआ पर
तृप्त हुआ मन का कोना कोना
गुस्से में भी माँ हमारी
प्यार का बिछाए मौन बिछौना।
कहते लोग सौतेली माँ तो
जली रोटी को भी तरसाती है
पर तूने मेरे जीवन में प्यार की ममता बरसाया
झूम झूम मेरा तन मन हर्षाया।
मन के द्वार बंद थे सारे
लगते थे हम बस हारे हारे
तब तूने प्यार का ज्योति जलाया
मन का अंधियारा दूर भगाया
जीवन में उजियारा छाया।
संग बनकर रही ढ़ाल हमारी
मेरी खुशियों के खातिर तुम
अपने प्राण प्रिये से भी लड़ जाती
और तोड़ तुम ला देती मेरे खातिर चाँद सितारे।
तू न जाने हर पल माँ मेरा दिल तुझे पुकारे
पत्थर दिल भी तेरे प्यार से हमने पिघलते देखा है
प्रेम डोर से बाँधकर रखना कोई तुझसे सीखे
माटी की मूरत में भी प्राण डालते देखा है।
तेरे सपने थे मीठे – मीठे से और आँसू थे खारे
उलझन से उलझन में भी हमने देखा
तेरे नयन विश्वास की ज्योति जलाये।
उज्ज्वल भविष्य के निर्माणों के खातिर
कठिन डगर पर चलकर भी जीवन जीना सिखाये
सिंचित कर संस्कार से अपने
मेरी जीवन बगिया महकाये
माँ तुम से दूर हुआ पर,
तृप्त हुआ मन का कोना कोना ।
रजनी अजीत सिंह 27.11.2018

झरोखे से झाँकती जिंदगी

पहली पुस्तक जिंदगी के एहसास “और” शब्दों का सफर ” के माध्यम से सफलता पूर्वक समाज के सामने प्रस्तुत करने में कामयाब हुई। तीसरी पुस्तक “झरोखे से झाँकती जिंदगी मेरा वह संग्रह है जिसमें आपको कविता, भजन, गीत भी पढ़ने को मिलेगा। पढ़ने के बाद आप एहसास करेंगे कि इतिहास के क्षणों को जो पूर्वजों का हिस्सा है उसे साहित्य रुपी अतित के चल चित्र मस्तिष्क के तल में अंधकारमय कुएं से जल निकालने का प्रयास है।”जब कोई प्रिय या अप्रिय क्षण दिलो दिमाग में धंस जाती है तो प्रतिक्षण किसी न किसी पटल की तलाश करती है।
रजनी अजीत सिंह एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पोती और भूतपूर्व सैनिक की बेटी हैं इसलिए इनके चरित्र में वीरता और साहस कूट कूट कर भरा है। बाकी आप इनका व्यक्तिव और स्वभाव इनके दोनों रचनाओं और”झरोखे से झाँकते शब्द ” रुपी संस्मरण को पढ़ने के बाद समझ सकते हैं।”ठेस लगी, प्यार मिला, गम मिला तो क्या हुआ? कभी कहानी, कभी कविता, कभी लेख, कभी जीवनी, कभी संस्मरण तो कभी डायरी, कभी आलोचक, और कभी भविष्यवाणी बनकर जिंदगी की हकीकत सामने आई।1997से शुरू हुई ये लिखने की कहानी जाने कब तक अर्थात सांस थम जाये तब तक लिखती रहूँ।” यही रजनी अजीत सिंह की हार्दिक इच्छा है।पहली पुस्तक जिंदगी के एहसास “और” शब्दों के सफर ” के माध्यम से सफलता पूर्वक समाज के सामने प्रस्तुत करने में कामयाब हुई। तीसरी पुस्तक “झरोखे से झाँकती जिंदगी मेरा वह संग्रह है जिसमें आपको कविता, भजन, गीत भी पढ़ने को मिलेगा। पढ़ने के बाद आप एहसास करेंगे कि इतिहास के क्षणों को जो पूर्वजों का हिस्सा है उसे साहित्य रुपी अतित के चल चित्र मस्तिष्क के तल में अंधकारमय कुएं से जल निकालने का प्रयास है।”जब कोई प्रिय या अप्रिय क्षण दिलो दिमाग में धंस जाती है तो प्रतिक्षण किसी न किसी पटल की तलाश करती है।
रजनी अजीत सिंह एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पोती और भूतपूर्व सैनिक की बेटी हैं इसलिए इनके चरित्र में वीरता और साहस कूट कूट कर भरा है। बाकी आप इनका व्यक्तिव और स्वभाव इनके दोनों रचनाओं और”झरोखे से झाँकते शब्द ” रुपी संस्मरण को पढ़ने के बाद समझ सकते हैं।”ठेस लगी, प्यार मिला, गम मिला तो क्या हुआ? कभी कहानी, कभी कविता, कभी लेख, कभी जीवनी, कभी संस्मरण तो कभी डायरी, कभी आलोचक, और कभी भविष्यवाणी बनकर जिंदगी की हकीकत सामने आई।19.10.97से शुरू हुई ये लिखने की कहानी जाने कब तक अर्थात सांस थम जाये तब तक लिखती रहूँ।” यही रजनी अजीत सिंह की हार्दिक इच्छा है।