श्रेणी: जिंदगी

दोस्ती कैसे बनाते और निभाते हैं

आओ हम बताते हैं दोस्ती कैसे बनाते और निभाते हैं।
नापना चाहते हैं दिल के दरिया को वो जो बरसात में बस मस्ती कर नहाते हैं, वो सहपाठी दोस्त बन बस रह जाते हैं।
खुद से खुद को जवाब दे नहीं पाते हैं,और जब हकीकत से सामना करने में वो जब बात करने में नजरों से नजर मिला नहीं पाते हैं,
वो सोसल प्लेटफॉर्म के दोस्त बन बस सीमित रह जाते हैं जो दिल के धड़कनों से जुड़ा हो चोट खाये एक और दर्द दूसरे को होता है वही सही मायने में जिगरी दोस्त बन जाते हैं।
जिंदगी क्या सिखायेगी दोस्ती के मायने,हम तो अपना उसूल खुद ही बना दोस्ती पर मर मिट जाते हैं।
हम तो अपने मौत का जश्न दुश्मनों के साथ भी मनाते हैं।
सुबह व्यस्तता में रास्ता भूले हों भले ही पर रात दोस्तों के साथ शब्दों को जोड़ यादों में खो जाते हैं।
आओ हम बताते हैं दोस्ती कैसे बनाते और निभाते हैं।
रजनी अजीत सिंह 22.5.2019
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#मायने
#सहपाठी
#जिगरी

चलो नामुमकिन को मुमकिन करें।

चलो नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाते हैं,
चलो हम चलनी से पानी भरना सीखाते हैं।
आँसुओं को पोछ न पाए अपनी आँखों के,
चलो जग में कुछ कर गुजरने हेतु खुशियाँ बाँटने सीखाते हैं।
नेह का पानी आँखों से झर – झर बह रहा है,
और सुन रहा हर धड़कन की दिल हुआ न अभी गिला है।
हम ऐसो के लिए मरने निकले हैं, जो ह्रदय को पाषाण बना बैठे हैं।
ओठों से तो अपने अजीज के लिए भी दो शब्द निकल पाये नहीं, सोसल प्लेटफॉर्म पर सुप्रभात – शुभ रात्रि कह चित्रों से मुस्कान बिखेरने सीखाते हैं।
भाव और ताव न मिले जिन रिस्तों का, चलो ऐसे चट्टानों से चलों झरना प्यार का बहना सीखाते हैं।
चलो नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाते हैं।
रजनी अजीत सिंह 21.5.2019
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दोस्ती

दोस्ती वो है जो गम बांट लें।
रुठे कोई तो हर सीमा को तोड़ जाकर मना लें।
आओ दोस्तों खुशीयाँ मना लें।
और सही मायने में दोस्ती अर्थ समझ लें।
रजनी अजीत सिंह 3.5.2019

आँखों में आँसू

आँसू जो आँखों से निकल जाये, छोटी बात नहीं है।
ये बात और है कि बहते खून के आँसू को पानी समझ लिया इसका हमें गम भी नहीं है।
वो रोये हम मुस्कुरायें ये दोस्ती में वफा नहीं है।
तो क्यूँ न रोते सखी को बातों में बर्गलाकर थोड़ी खुशी बाँट आयें।
क्यों न दिल धड़क जाये जब अवाज मन की चाहत से आये।
बस सोचने और अपना समय कमियां निकालने से कृष्ण और सुदामा सा मित्रता की उपमा नहीं पाती।
चाह हो तो राह मिल ही जाती है, चलो कल्पना को हकीकत का रुप देकर, मित्रता का फर्ज निभा आयें।
तड़पती सखी को कस्तूरी की खुशबु से भर आयें।
ढ़ूढ़े जो मृग तो खोजता रह जाये और हम पता बता दें कि ये कुंडल से आये।
इसी पर मुझे कबीर का दोहा याद आ रहा है – कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढ़ूढ़े वन माहि।
प्रेरणा स्रोत – कवयित्री आरती सिंह
प्रस्तुत करने वाली – रजनी अजीत सिंह
3.5.2019

हकीकत में धुंआ उठा

हकीकत में मिलना कहें या यादों में खो जाना कहें,
जो भी हो सखियों आज मिलकर दिल झूम उठा।
किसी को देखकर सोच होगा 🤔मिले कब?
किसी को लेखनी से लिखे शब्दों का खेल लगेगा।
पर यह तुलिका है साहब सबके जिदंगी में रंग भरना जानती है
सबको अपना बनाकर मैनें दिया धुआं उठा।
रजनी अजीत सिंह 20.5.219

दोस्तों की यादें

देखो दोस्तों तेरी याद आ गई।
ग्रुप के लिए कुछ लिखूं ये हमदर्द लेखनी को याद आ गई।
हम तो बैठे थे यादों के हंसीन सपनों में खोने।
तुम लोगों से मिलना हुआ तो शुभ रात्रि के बहाने कुछ शब्दों से खेलने की बात याद आ गई।
शुभ रात्रि
रजनी अजीत सिंह 20.5.2019

परिभाषित

तुम मेरे हर रिस्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
भावों से परिपूर्ण वह जादू की छड़ी हो।
जो मिल जाता है तो हजारों तार सज के जलजाते हैं,
वो खुशियों की तुम लड़ी हो।
जब करूणा का सार उमड़ता है तो तुम वहाँ फूलझड़ी हो।
स्पंदित हो हर एक के जीवन में प्राण फूंक देने के लिए,
तुम्हारी जिंदगी जैसे खड़ी हो।
तुम हमारे हर रिश्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
जहाँ तुम बस्ते हो, हाँ तुम्हारी रात को वहीं खुशी मिलती है,
तभी तो तेरी रात चाँद तारो से जड़ी है,
तभी तो तुम रात की खुशियों की घड़ी हो।
तुम हमारे हर रिस्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
तुम खुश रहो तो तुम्हारी रात जागकर कभी सोकर तेरी जिंदगी में,
खुशियों के खातिर जैसे हर वक्त तेरे गले पड़ी हो।
तुम मेरे हर रिस्तों को परिभाषित करने की कड़ी हो।
रजनी अजीत सिंह 22,4.2019
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अनकहे शब्द

जो शब्द अधर न कह सके वो दर्द बन के रह गये।
जो दर्द बन के रह गये वो प्यार ही में खो गये।
अब जिदंगी में गम नहीं मेरी हर सांस तेरे प्यार में ही मिल गये।
जो चुप रहें या कुछ कहें ये सोच, बस अरमान बन के रह गये।
जो चुप रहें तो है वफा जो कह दिये तो बेवफा, बेवफा – वफा के खेल में सब बस सीमट के रह गये।
ये प्यार भी क्या चीज है एहसास बन कर रह गये।
न तुम कहो न हम कहें, जो हल कभी न सवाल हो, वो गलत सवाल बन के रह गये।
जो शब्द अधर न कह सके वो दर्द बन के रह गये।
जो दर्द बन के रह गये वो प्यार ही में खो गये।
रजनी अजीत सिंह 18.4.2019

श्रीदुर्गासप्तशती का पाठ दोहा, चौपाई, छन्द और सोरठा में।भाग 1

ये जो देवी कवच है जो श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के पहले किया जाता है। अब ये मात्र संस्कृत या हिन्दी अनुवाद में ही पढने को मिलता है जबकि मेरे माँ के पास जो दुर्गासप्तशती की किताब थी वो दोहा, सोरठा, छंद, चौपाई में थी जिसको पढ़ना रोचक था और सबसे बड़ी बात इसे गा के भी पढ़ा जा सकता था। मैंने बहुत ढूंढने की कोशिश की पर अब ये बुक मुझे मार्केट में कहीं नहीं मिला। प्रतिदिन पाठ करने से बहुत दोहे चौपाई याद हो गए थे और कुछ डायरी पर लिखा था जिसे मैं लिख कर शेयर करती हूं। कुछ त्रुटि हो तो क्षमा चाहूंगी। अफसोस इस बात का है कि इस बुक के राइटर का नाम भी नहीं है।

*श्री दुर्गायण*

आवाहन

छंद – जाग महावरदायिनि! वर दे, ह्रदय भक्ति से भर दे,

विमल बुद्धि दे अटल शक्ति दे, भय बाधा सब दर दे।

पथ प्रशस्त कर कहीं न अटकूँ, शिवा अमंगल हरनी,

भाषा बद्ध करू तब गाथा, नित नव मंगल करनी।।

दोहा- गणपति गौरि गिरिश पद, वन्दि दुहूँ कर जोर।

जगदम्बा यश गाईहौं, करहु सहाय अथोर।।

देवी कवच

चौपाई – नमोनमो चंडिका भवानी। सुमितरत जाहि होय दुख हानी।।

मार्कण्डेय महामुनि ज्ञानी। ब्रह्मा सन बोले मृदु बानी।।

पूज्य पितामह कहहु बुझाई। वह साधन जेहि मनुज भलाई।।

या जग में जो गोपनीय अति। काहू पै प्रकटेहु न सम्प्रति।।

तब ब्रह्मा जी अति हरखाई। ज्ञानी मुनि सन कहेहु बुझाई।।

ब्रह्मन! वह साधन तो एकू। मोसन सुनहु सुचित सविवेकू।।

‘देवी कवच’ नाम मन भावन। जो अति गोपनीय अति पावन।।

प्राणिमात्र का जो उपकारी। रक्षक निर्भयकारक भारी।।

दो.- देवी की’ नौ मूर्तियां’, ‘नौ दुर्गा प्रख्यात।

अलग अलग जेहि नाम है, सुमिरत सुख सरसात।।

चौ. – प्रथम’ शैलपुत्री ‘ शुभ नामा।

जेहि जपि जीव पाव विश्रामा।। ब्रह्मचारिणी दूसर नामा।

जो शुभ फलद सहज सुखधामा।।

तीसर चन्द्रघंण्टा वर।

जाते लहहिं सौख्य सुर – मुनि नर।।

कुष्मांडा चतुर्थ शुभ नामा।

जाते पाव जीव गुण – ग़ामा।।

‘ स्कन्दमातु ‘पंचम जग जाना।

नाम करइ अघ-ओघ निदाना।।

‘ कात्यायिनी ‘नाम शुभ छठवाँ।

रहै न टिकै त्रास-भय तहवाँ।।

‘ कालरात्रि ‘सप्तम जे भजहीं।

तिन सुख अमित लाभ नित लहहीं।।

मातु-कृपा भय पास न जाहीं।

नाम जपे दुख सपनेहु नाहीं।।

दो.- विदित ‘महागौरी’ जगत, अष्ट नाम सु-सेत।

नवम’ सिद्धिदात्री ‘ विमल, नाम मोक्ष फल देत।।

सोरठा – सभी नाम प्रतिपाद्य, विज्ञ वेद भगवान् से।

नाम प्रभाव अकाट्य, जीव त्राण पावहिं जपे।

चौ. – पड़ा अनल में जलता जो नर। घिरा हुआ हो रण में पड़कर।।

संकठ विषम परा जो होई। होई भयातुर धीरज खोई।।

माता शरण गहै जो जाई। तासु अंमगल सकल नसाई।।

युद्ध समय संकठ यदि आवै। नहिं विपत्ति ता कह डरपावै।।

शोक दुःख – भय न व्यापै। मातु भगवती कहँ जो जापै।।

श्रद्धा – भक्ति सहित मन माँही। जपै अवशि ताकह छन माहीं ।

बढ़ती होय अमंगल नासै। जड़ता जाइ सुबुद्धि प्रकासै।।

देवेशवारि! जो चिन्तइ तोहीं निस्संदेह सुरक्षहु ओहीं।।

आगे का भाग दूसरे अंक में।

आँखों में समंदर सा गहराई

इन आँखों में मत देखो झांककर समुदर से भी अधिक गहराई है कभी खुशी है तो कभी गम है।
हर रिस्तों को निभाने का हुनर पाया है अपनी माँ से।
इसे समझौता नहीं प्यार कहते हैं इश्क की लहरों को भी महसूस करते हैं पर हम सागर की सुता हैं बड़े प्यार से हर रिस्तों को निभा हर इश्क की लहरों को बहुत करीब से महसूस कर समुद्र की गहराई में अपने आप में समाहित करने का हुनर रखते हैं।
वर्ना समुद्र मंथन में लक्ष्मी विष्णु की प्रिया बन साथ न होती।
पत्नी पतिबरता बन जब तन मन धन से पूर्ण रूप से समर्पित हो शंकर पार्वती सा सृष्टि का संचालन न करती। कृष्ण की प्रेमिका बन राधा का नाम राधे श्याम, राधेकृष्ण अमर न होता। और प्रेमिका तब बनती है जब सबकुछ त्याग कर वियोगा अवस्था के हद को पार कर जाती है पर संयोगा अवस्था की कल्पना तक नहीं करती सच्चे मायने में यही इश्क, मोहब्बत, और प्यार है साहब मेरे हिसाब से जो कई घरों को आबाद कर दे।
इश्क वो नहीं जो ब्रह्मा सा मानस पुत्री से ही हो जाय और भगवान होते हुये भी पूजा का अधिकार न पाए।
हम तो तुलसी सा बन सदियों सदियों तक अपने प्रेम में पगे भगवान का इंतजार करेंगे और धीरज, धर्म का निर्वहन कर अपने भगवान की प्रेमिका बन मिशाल बनेगें।
रजनी अजीत सिंह 24.3.2019
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