Category: गीता से संबंधित गाथाएं

~महाभारत कथा,  कृष्ण भजन और कविता (11.1.17)

महाभारत में वर्णन हुआ है कि जब द्रोपदी का चिर हरण दुशासन ने किया तो द्रोपती ने कृष्ण को पुकारा जो कृष्ण को अपना भाई मानती थी। मेरे विचार में भगवान एक कल्पना है। मनुष्य के विचार ही भगवान है। कुविचार ही आज राक्षस प्रवृत्ति का दुशासन है। आज जो बहन के लाज के रखवाले है। वही कलयुग में द्रोपदी का भाई कृष्ण है। अपने खून के रिस्ते या एक कोरव का जन्मा ही केवल भाई-बहन नहीं होता। और जो बहन के लाज के लुटेरे है वही आजकल दुशासन है। जैसा की हम पढ़ते सुनते और जानते है कि रक्षा बन्धन क्यों मानया जाता है। रानी कर्मावती रक्षा सूत्र यानी (राखी) भेजकर हुमायूं से सहायता माँगी थी। तो यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि बहन के रखवाले जाति-पाति या किसी धर्म का मोहताज नहीं है। हमने अपने  माँ-बहनो और बड़ो से यह गाना सुना है  जब द्रोपती ने कृष्ण को पुकारा है-

              (भजन) 

मेरी अंसुवन भीगे साड़ी आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

अरे पाँच पति वाली पत्नी हूँ,

 और पाँचों के पाँच अनाड़ी  (हाय कैसे हाय कैसे ) जुवे में  हारी।

आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

यहाँ बैठै भिष्म बलशाली और,

 बैठी सभा है सारी दुशासन करे उघारी। 

आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

मेरी अँसुवन …………………………..

जो तुम नहीं आवोगे जाएगी लाज हमारी, 

तब हँसेगी दुनिया सारी आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

मेरी अँसुवन भीगे………………………. 

जरा याद करो बनवारी जब अंगुली कटी तुम्हारी (मैने फाड़ी मैंने फाड़ी) 

रेशमी साड़ी आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

मेरी अँसुवन – – – – – – .

जब बढ़ने लगी है साड़ी दुशासन गया है हारी।

मैने जान लिया  पहचान लिया साड़ी में छुपे मुरारी। 

आ जाओ कृष्ण मुरारी। 

मेरी अँसुवन – – – – – – – – – – ।आ जावो कृष्ण मुरारी। 

इस गाने से स्पष्ट हो जाता अच्छे विचार वाले जब बहन की रक्षा करने पर उतरते है तो बुरे विचार रूपी दुशासन की हार ही होती है। 

अतः मैं कहना चाहूंगी हम बहनो को अच्छे विचार वाले भाई कृष्ण की जरूरत है जो, आज के दुशासन का संघार कर सके और कृष्ण जैसा भाई बनकर ‘भगवान’ बन सके।  बेचैन बहन की तड़प और उसका भगवान्। 

9.9.16 शुक्रवार 

बहनों के मन में चैन नहीं, दिल को सुकून नहीं, 

हजारो सवाल है आँखो का, पर जबाव नहीं है बातों का। 

कभी कुछ कह के भी, बहन कुछ कह जाती है। 

कभी मौन रहे के भी, सता जाती है खामोशी।

कभी अपना होकर भी अपना नहीं, कभी पराया होकर भी अपना लगता है। 

कोई सादियो से जीता आया है, कोई एक पल में सदियो जी लेता है। 

सारे सवाल का जबाब ‘माँ’ के पास है, सारे बातो का हिसाब ‘भगवान’ है। 

‘भगवान’ शिव है राम है, कृष्ण है तो शक्ति (माँ अम्बै, जगदम्बे आदि) माँ है। 

प्रकृति का ‘सृजन’ ही शिव-शक्ति से हुआ है,

 शिव-शक्ति प्रकृति को चलाने के प्रतीक है। 

सीता राम समाज में पति धर्म और पत्नि धर्म के प्रतीक है। 

राधा – कृष्ण प्रेम के प्रतीक है। 

सारे ‘भगवान’ एक है। 

जैसे सारी नदिया सागर में मिलती है, 

वैसे ही ‘भगवान’ भी श्रद्धा-भक्ति और विश्वास में मिलते है।

~गीता का ज्ञान पर कविता(9.9.16)

‘गीता’ का ज्ञान अधूरा है ’ 

भक्त का भक्ति अधूरा है।

जहाँ श्रद्धा भाव न हो, 

सब उल्टा हो जाता है।  

गीता की कसमें खाकर भी, 

सच्चा गवाह नहीं  मिलता।

न्यायालय में न्याय नहीं होता, 

माँ बहन सभी की होती है। 

दूजे की माँ की ममता की कद्र नहीं होती। 

जिस आँचल में दूध छिपा, 

उस दूध की कीमत क्या होगी।

झूठ ही राज का सत्ता हैं, 

तो सच की कीमत क्या होगी।

जब बहन-बेटी बीक जाती हैं,

 तो औरत की कीमत क्या होगी।

जो प्रकृति का पूजक न हो, 

वो भगवान का पूजक क्या होगा। 

जिस प्रकृति ने जन्म दिया, 

उस प्रकृति की कीमत क्या होगी। 

जब नेचर ही बदल जाये, 

तो नेचर की कीमत क्या होगी। 
जहाँ अनर्थ-अनर्थ ही हो, 

वहाँ अर्थ की कीमत क्या होगी।

जहाँ नफरत से भरा जहाँ, 

वहाँ प्रेम की कीमत क्या होगी। 

जहाँ हर जगह बेवफाई हैं,

 वफा की कीमत क्या जाने। 

जिसने खुद को अपर्ण न किया, 

समर्पण  की कीमत क्या जाने। 

जो भर न सका मन भावों से,

भगवान की कीमत क्या जाने। 

जहाँ धर्म और कर्म न हो,

वे धर्म-कर्म की कीमत क्या जाने। 

जहाँ झूठ की कीमत हो, 

वो सच की कीमत क्या जाने।

सच पर ही है धरा टीकी, 

धरती की कीमत कर लो तुम। 

जो दिन की कीमत कर न सका, 

ओ रजनी की कीमत क्या जाने।

 रजनी सिंह