झरोखे से झाँकती जिंदगी

झरोखे से झाँकती जिंदगी
जीवन परिचय
नाम-रजनी अजित सिंह
जन्म – 1974
जन्म स्थान – शिवपुर दियर, जिला – बलिया में परमार वंशीय भूतपूर्व सैनिक पिता मदन राम सिंह, माता सुदामा देवी के परिवार में रजनी सिंह का आठवें संतान के रूप में जन्म हुआ। सन 1983में वाराणसी पालक पिता चंदेल वंशीय अशोक कुमार सिंह( एडवोकेट) और माँ रेखा सिंह के यहाँ पालन पोषण, शिक्षा- दीक्षा और विवाह सम्पन्न हुआ। हाई स्कूल, इंटर मिडिएट की शिक्षा शहीद मंगल पांडेय इंटर कालेज नगवा जिला बलिया से सम्पन्न हुआ। बी. ए., एम. ए. की शिक्षा हिंदी साहित्य से उदय प्रताप कालेज वाराणसी में हुई।
एम. ए. की पढ़ाई समाप्त कर अभी पी. सी. एस. की तैयारी ही शुरू किया था कि 25 वर्ष की आयु में श्रीमान सूर्य नाथ सिंह और माता गायत्री देवी के बड़े पुत्र अजीत प्रताप सिंह के साथ विवाह सम्पन्न हुआ। जहाँ रजनी अजीत सिंह सृजन फार्मा स्यूटिकल प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी में आज भी डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं। इन्होंने माँ सुदामा देवी के गुजरने के बाद उनके गम में सन 1997 से कविता लिखने की शुरुआत की थी जो लिखने की आदत, कब शौक में बदल गया पता ही नहीं चला। दो बच्चे सृजन और विशेष की परवरिश, अपने कम्पनी के पद को सम्हालते हुए और परिवार में पुरानी मान्यताओं का निर्वहन,और आजीवन अंध विश्वास को मानने वाले विभिन्न कुरितियों के शिकार रुपी परिवेश में साथ रहकर नियमों का पालन करने के बाद भी इन्होंने अपने लिखने के शौक को बरकरार रखा।
“इन्हें नहीं पता कि इनकी लेखनी से निकले शब्दों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा पर ये बस इतना जानती हैं कि ये जिंदगी के गुजरे कुछ पलों का सच्चा एहसास है” इनकी लेखनी चलाने का उद्देश्य है पुरानी मान्यताओं और आधुनिकता के बीच की कड़ी को अपनाकर समाज में जीना, खुश रहना तथा दूसरो को खुशी बाँटना और अपनी संस्कृति का प्रचार प्रसार करना है। समाज को अपने अनुभव के आधार पर ये संदेश देना है कि करियर बनाते हुए पतिव्रता धर्म को निभाकर आज भी नारी आगे बढ़कर भगवान तक के सिहांसन को हिला सकती है। ऐसा रजनी सिंह की सुंदर कल्पना है इनकी पहली पुस्तक “जिदंगी के एहसास” दूसरी पुस्तक “शब्दों का सफर” कविताओं का संग्रह है। तीसरी पुस्तक”झरोखे से झाँकती जिंदगी” संस्मरण विधा में पब्लिश हो रही है।य
ये संस्मरण “मेरी और मेरी सहेली यामिनी की देवी माँ, उसकी माँ, उसके और मेरे पूर्वजों, उसके परिवार,समाज, गांव शहर और यामिनी के बीते जिंदगी के कुछ वो पल हैं जो यादों में सिमट कर रह गया और मेरे शब्दों में ढल पन्नों पर नयन जल स्याही बन बह गया।

ये पुस्तक एक दर्पण है

“झरोखे से झाँकती जिंदगी “ रजनी अजीत सिंह की तीसरी किताब है। इसकी कहानियाँ जहन में उसी तरह से विद्यमान है जैसे सागर में छुपे हुए अनमोल रत्न,अमृत और विष निकला है। बस मन रुपी सागर में लेखनी रुपी मंदराचल पहाड़ की मथानी से आत्म मंथन यानी समुद्र मंथन के बाद जिंदगी के कीरदार सामने आया है जिसको लिखने पढ़ने के बाद ही पता चलेगा कि किसके हिस्से में क्या आया है। ये पन्नों पर शब्दों से ऐसी सजती गयी हैं जैसे नयी नवेली दुल्हन आती है अनगिनत सपनों का भाव लिए दूसरे परिवार में सम्मिलित होती है। उसे नहीं पता होता है कि उसका परिवार कैसा है, कैसे रहना है, उसके इस घर का वर्तमान क्या है, भूत कैसा था, और भविष्य क्या होगा? बस एक खुशियों का खजाना अपने आप में समेटे हुए आ जाती है दूसरे के घर को सजाने का नया उमंग लेकर। जबकि नयी नवेली दुल्हन कभी पापा के आँखों की तारा तो कभी माँ के दिल का टुकड़ा हुआ करती थी। छोटे भाई – बहन के लिए पापा से बात मनवाने के लिए जादु की छड़ी जो छूते ही तुरंत पांसा पलट देती थी।
इस संस्मरण की कहानियों को लिखने के लिए मेरा मन कभी उत्साहित होता है, तो कभी हतोत्साहित, तो कभी भाव विभोर होकर अनगिनत खुशियों और गमों को समेटे हुए शब्दों से उन्मुक्त गगन में विचरण करना चाहती हैं। खुशी का एहसास कर जहाँ लेखनी उत्साहित होती है वहीं समाज के विभिन्न प्रकार की पीड़ाओं को देखकर बंया करते समय हतोत्साहित भी हो उठती है। क्योंकि लेखनी समाज के पीड़ितों के पीड़ाओं को लिखना तो चाहती है परंतु संस्मरण के रुप में सच्ची घटनाओं को प्रगट करने में लेखनी बार बार डरती और मरती है। जैसे कोई असहाय औरत या बालिका अंदर ही अंदर शोषण रुपी दर्द के कारण कुठां से ग्रसित हो गयी हो और समाज से लड़ना बिल्कुल मुश्किल हो जाता है। समाज के भेड़ियों को देखकर ऐसा लगता है जैस डरावना सपना देख लिया हो । जब तक उसे समाज में सजा नहीं मिल जाती है तब तक उसी डारवने सपनों से रुबरु होती रहती है। इस कहानी को उन्मुक्त गगन में शब्दों को लिए हुए उड़ान भरने के लिए के लिए पंख तो था पर परवाज को बुलंद होने के लिए नीले आसमान में उड़ान भरने के लिए हिम्मत और साहस की जरूरत थी। ये साहस बिना सरस्वती के वरदान का असम्भव सा था, परंतु यामिनी के रुह में छुपा शक्ति और मेरे ऊपर सरस्वती की कृपा दिन-रात यानी हर पल बरसती थी जिससे ये कहानी बन सबके सामने आ रही है।

नया साल दो हजार इक्कीस

चमकेंगे हम ऐसे इस साल में,
चमकते हैं जैसे सितारे आसमान में।
लिखना हमें है समाज और अपने आप को, अपने कहानी में।
देश और समाज को बचाना है आग की लपटों से,
खून के धब्बों से हर हाल में।
कुछ संकल्प लेकर कर गुजरने को नया साल आ गया।
जिंदगी में कुछ अँधेरा तो कुछ उजाला
यह नियति का खेल रहा है।
मिलतीं रहे खुशियाँ सबको हर हाल में,
दो चार बोल प्यार का सबसे
मिलता रहे ये मेरे सपनो का मेल रहा है।
खुशियों के उजालों को लिखूँ दूँ मैं शब्दों से
“जैसे जिंदगी के झरोखे से “
झाँक रहे खुशियों के पल हों।
देखो फिर कुछ संकल्प लेकर, कर गुजरने को
नया साल आ गया।
रजनी अजीत सिंह 1.1.2021

1- यामिनी और उसके परिवार का परिचय और उसके रुह को विनम्र श्रद्धांजलि 💐🌹🌺
एक लड़की थी जो कक्षा चार में पढ़ती थी जिसका नाम यामिनी था। उसका गांव संसाधनों के मामलें में बेहद ही पिछड़ा इलाका था। ये लड़की मेरी सहेली थी जो कक्षा चार में पढ़ती थी उसका गांव और मेरा गाँव और मेरा गाँव एक ही था जो सनसांधनो के मामले में बेहद ही पिछड़ा इलाका था। ये यामिनी आठ भाई बहनों के बीच पली बड़ी थी। सबसे बड़ा भाई आभूषण दूसरे नम्बर पर अंशिका और तीसरे नम्बर पर सुधांशिका चौथे नम्बर पर सन्तुष्ट और पांचवे नम्बर पर संतुष्टि और छठवे नम्बर पर मार्मीका और सातवे नम्बर पर सुरक्षा थी।
यामिनी के पिताजी और मेरे पिताजी सैनिक थे एक कैप्टन सीताराम सिंह तो दूसरे मदन राम सिंह सुबेदार मेजर थे। दोनों लोग एक साथ सर्विस करते थे इसलिए दोनों लोग शहर या तो चाइना पाकिस्तान के बावडर पर ही तैनात रहते थे। तो मेरी माँ सुदामा और यामिनी की माँ कृष्णा गांव में अपने बच्चों के साथ अकेली ही रहती थी। यामिनी की माँ चौथे नम्बर के बेटे सन्तुष्ट और छठे नम्बर पर मार्मीका और सातवें नम्बर की बेटी सुरक्षा को साथ लेकर रहती थी। यामिनी कक्षा चार तक मेरे साथ पढ़ी उसके बाद मैं बनारस आ गयी पढ़ने और वो गाँव रह गयी। उसकी और मेरी बात पत्र के माध्यम से होता था। हम लोग हर दिन का ब्योरा रात को पत्र लिखकर बताया करते थेऔर हफ्ता या पन्द्रह दिन बित जाये तो बैरन पत्र भेजा करते थे इसलिए कि बैरन छुड़ाने में उस समय सवा रुपया लगता था और हम लोगों की पाकेट मनी मात्र दस रुपये मिलता था तो पन्द्रह पन्द्रह दिन पर यदि बैरन छुड़ाते थे तो पांच रुपये खर्च हो जाते थे। यदि बातों का शिलशिला ज्यादा बढ़ चले तो दस रुपये पूरा बैरन छुड़ाने में ही चला जाता था तो महीने भर खर्चा के नाम पर आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया नतीजा ठन ठन गोपाल हो जाता था। मैं तो अपने पालक पिता के यहाँ रहती थी तो उनके यहाँ से खर्चा और मेरे छोटे भाई सन्तोष जो ट्रेजरी में थे उनसे भी मिल जाया करता था पर यामिनी को बस पाकेट खर्च दस रुपये से ही काम चलाना पड़ता था।
झरोखे से झाँकती जिंदगी या तो यामिनी के जिंदगी के इर्द-गिर्द घूम रही है या तो मेरे जिंदगी की गहन अनुभूतियाँ हैं। हम दोनों सखी थे तो हम दोनों ही पत्र और डायरी लिखने के शौकीन थे। फर्क इतना था कि वो कहानी लिख ब्यां कर जाती थी और मैं कविता लिख ब्यां कर जाती थी। आज के डेट में मैं कविता लिखती रही और मेरी दो बुक कविताओं की पब्लिश हो गई पहला “जिंदगी का एहसास और दूसरी बुक शब्दों का सफर। और यामिनी की जिंदगी कहीं समय से पहले काल के गाल में समा गया और बचा तो उसका मेरे पास पत्र जिसको की अपने संस्मरण के रुप में कहानी बनाकर लिखने की कोशिश की हूँ ताकि उसे और उसके स्वर्गवासी माता पिता का वर्णन कर याद कर सकूँ और यामिनी को समाज में नकाब पोश रिश्तों का आवरण हटा उसके कहानी को सामने ला उसके रुह को न्याय दिला सकूं और समाज में भेड़िया के रुप में जो अपने ही शोषण करते हैं उन्हें आगाह कर, यामिनी जैसे पीड़ित कई लड़कियों को न्याय पाने के काबिल बना सकूँ। यही कोशिश मेरी यामिनी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

शीर्षक – सूची
1- यामिनी की यादें
2-पूर्वजों का इतिहास
3-यामिनी का बचपन
4-यामिनी की माँ की यादें
5-गाथा विश्वास और अंधविश्वास की
6-गाथा शोषित और शोषण की

यामिनी की यादें

जिंदगी की यादें कभी पत्रों में आता है
कभी गीतों में आता है।
कभी ख्वाबों में आता है,कभी तस्वीरों में आता है।
कभी हकीकत बन ख्वबो-ख्यालो में आता है।
कभी लेखनी के जरिये कहानी बन आता है।
कभी जीवन में खुशी बन सिमट जाता,
कभी नैनो में बस जल छा जाता है।

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