हमारा समाज और शोषण भाग १

शोषण पर लिखे मेरे लेख मुझे नहीं पता समाज को प्रभावित भी करेगा या नहीं पर मेरी लेखनी “शोषण” शब्द से पीड़ित समाज को लिखने से रोक नहीं पायी। हमारे आस पास की घटनाओं को देखकर मन हमेशा अतृप्त रहता है कि मैं लेखनी के द्वारा समाज को कुछ संदेश नहीं दे पा रही। मन शोषण शब्द सुनते ही जब से होश सम्हाला तब से अब तक का चलचित्र सामने दिखने लगता है। मन का झंझावात कहता है काश मैं उस जगह पर होती तो ऐसा कानून बनाती जिससे शोषण करने वाले का खात्मा हो सके। चाहे वो शोषण जिस भी तरह का हो। परन्तु कानून व्यवस्था का लाभ उठा गलत मुकदमा दर्ज कर फसांने वाले की भी भरमार है जिसका उदाहरण नारी शोषण को लिया जा सकता है। अधिकतर यौन शोषण का शिकार या तो मजदूरी करने वाली या जिसका कोई सहारा नहीं होता था यानी बेसहारा औरतें और बाल्यावस्था का दामन छोड़ किसोरा अवस्था के तरफ कदम रखती बालिकाओं का होता है जिसे अपने शारीरिक विकास होने के बारे में भी भान नहीं होता था कि ऐसा परिवर्तन क्यों हो रहा है? आज मैं उस समाज के लोगों को पहले आभार प्रगट करती हूँ कि जिन्होंने विभिन्न शिक्षा के द्वारा बालिकाओं को जागरूक और सजग होने का पाठ पढ़ाया है जिससे काफी मात्रा में किसोरी शिक्षा के माध्यम से अच्छा और बुरा का फर्क करना सीख गयी हैं।

मैं अब उस समय की बात करना चाहूंगी जब शोसल प्लेटफार्म के द्वारा मनोरंजन का समाज में कोई साधन न था। यदि मनोरंजन का साधन था तो बस गीत गाने और तीज त्योहार पर बैठकर गपशप करना या मजाकिया रिश्तों में मजाक करना ही मात्र मनोरंजन का साधन होता था। जैसे देवर भाभी, नन्दोई सरहज, जीजा शाली का रिश्ता जिसमें लोग मजाक कर मनोरंजन करते थे मजाक कब शोषण बन जाता है पता भी नहीं चलता था।

ये मैं उन दिनों की बात कर रही हूँ जब सास अपने दमाद पर, माँ अपने बेटे पर, पत्नी अपने पति पर नारी होकर भी इस दर्द को अनदेखा कर आँख बंदकर विश्वास करती थी हालात तो आज भी वही है बस तब और अब में फर्क है तो बस इतना कि पहले शाली सरहजो और कमजोर औरत का शोषण होता था तो वो बोल नहीं पाती थीं आज कोई कोई हिम्मत दिखा विरोध करने का साहस दिखाने लगी हैं ।

इस पर लेखनी और लेखिका कुछ दर्द अपना बंया कहना चाहती है –

आखिर क्यों हार जाती है लेखनी शोषण रुपी गड़े हुए मुर्दे को उखाड़ने में?

क्य शोषण रुपी दबे हुए निष्क्रिय , स्थिर, अवशेषों को उकेर कर अपने आप को दर्द से निजात दिला पाती है लेखनी?

क्या जीत नहीं जाती लेखनी समाज के सामने उसका असली चेहरा सामने ला बिना किसी को बर्बाद किये?

क्या शांत, निःशब्द प्रकृति का चित्रण करने के लिए चलाई थी ये लेखनी?

क्या मासूम की जिंदगी के दर्द को ब्यां कर उसके दर्द से निजात दिला सकती है लेखनी?

क्या शोषण हुए जिस्म के घाव को मरहम की जगह जख्म को कुरेद कर हरा नहीं कर जाती है लेखनी?

क्या उदासीन शब्दों को भी जीवंत कर देती है लेखनी?

किसी ने कहा है छिपे हुए प्रतिभा को भी उड़ान भरने का काम करती है लेखनी।

पर मैं पूछती हूँ लेखनी से, क्या लेखनी में वो दम है जो शोषित को न्याय दिला सके अपने शब्दों से?

ये सत्य है न्याय दिलाना तो दूर जीवीकोपार्जन का दूसरा साधन न हो तो दो रोटी भी स्वाभिमान से नहीं दिला पाती है लेखनी।

और फिर बोटी नोचने के लिए शोषित को शोषण कर्ता के संमुख ला खड़ा करती है जिंदगी।

ऐसे में लेखनी लेखिका क्या करे? वो स्वछंद विचरण तो कर सकती है शब्दों से।

पर हर पल वह खुद टूट कर बहुत कुछ कह जाती है पन्नों पर अनगिनत सवालों का जवाब लिए शब्दों के रुप में विखरकर।

रजनी अजीत सिंह 1.9.2020

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