पतझड़ का मौसम जान सखी

पतझड़ का मौसम आया सखी, जो पुरातन पत्तों को झाड़ गया।
पर आस लगी फिर भी तरु की, जीवन डाली को थाम सखी,
पतझड़ का मौसम जान सखी।
पुरातन पत्ते टूट गये, मरकत के साथी छूट गये।
अटके विश्वास के तरु पर दो प्रीत पात,तुफानी पवन से लड़ करके,
जीवन डाली को थाम सखी, पतझड़ का मौसम जान सखी।
लुक छिपकर आयेंगी बहार सखी, तरु पर पल्लव भी आयेगा।
फल फूल सभी लग जायेगा, बदलते ऋतु के साथ,
मौसम भी बदल जायेगा।
प्रकृति के नियमों को जान, समय की यही है माँग सखी।
बसंत ऋतु फिर आयेगी, कू कू कोयल गायेगी,
फिर मधुर गीत सुनायेगी, जीवन में खुशियाँ छायेंगी।
पतझड़ का मौसम जान सखी, जीवन डाली को थाम सखी।
रजनी अजीत सिंह 9.9.2019

2 विचार “पतझड़ का मौसम जान सखी&rdquo पर;

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