जिदंगी में ऊँचा उठो

जिदंगी में इतने ऊँचे उठो कि दुनिया मरने के बाद भी याद करे।

देखो सारे रिस्तों को एक दृष्टि से, सींचित करो समता की भाव दृष्टि से।

जाति, धर्म, वेश की, काले – गोरे रंग अपने पराये के भेद की ज्वालाओं से जलते दुनियां में इतना शीतल बनो कि जितना मलय पवन है।

हर रिस्तों में इतना प्यार भर दो कि वर्तमान के साथ भविष्य भी सवांर लो।

अपनी लेखनी से ऐसा कुछ लिख जाओ कि नये रिस्तों के साथ पुराने रिस्तों में भी नूतन स्वर भर दो।

अपने शब्दों से जीने का वजह दो, हर रिश्तों में प्यार का रंग भर दो।

इतना मौलिक बनो की जितना स्वयं सृजन है।

अतीत से उतना ही याद कर सीख लो जितना जिंदगी जीने के लिए जरूरत हो।

जीर्ण – शीर्ण यादें और घातें मंजिल से कई कदम पीछे ले जाने के कारण है।

तोड़ो हर बंधन रुके न चिंतन गति, हर रिस्तों का सत्य चिरंतन धारा के शाश्वत प्रवाह में इतने दयावान बनों की जितना परिवर्तन है।

चाहत बस इतनी हर नर्क बने घर को स्वर्ग बनाना। अगर कहीं हो स्वर्ग उसे हर घर में लाना।

सूरज, चाँद, चाँदनी और तारे सब हैं साक्षी बन साथ हमारे।

हर कुरुप को दो रुप सलोना, ह्रदय से इतना सुंदर बने जितना सब पर आकर्षण पड़ती भारी है।

यही तो बात है रजनी का मन सब पर वारी है।

रजनी अजीत सिंह 7.3.2019

5 विचार “जिदंगी में ऊँचा उठो&rdquo पर;

टिप्पणियाँ बंद कर दी गयी है।