“जिदंगी के एहसास” पुस्तक के हुए साक्षात्कार के कुछ प्रश्न।

प्र01-मैं चाहता हूँ कि आप अपने पाठकों के साथ अपने बारे में कुछ सांझा करें।

उ0-मैं रजनी अजीत सिंह बनारस, (वाराणसी, काशी) की रहने वाली हूँ। इस शहर ने बहुत लेखको और कवियों को जन्म दिया है जो हिंदी साहित्य के लिए अनमोल धरोहर हैं। मैं सृजन फार्मा स्यूटिकल प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हूँ। मैं अपना काम अपने करने में विश्वास रखती हूँ। कल का काम आज और जो आज करना है वो तुरंत करके हटाने में विश्वास रखती हूँ क्योंकि कल सुबह कौन सी मुसीबत सामने होगी नहीं पता हमें। मुझे इसी पर कबीर दास का दोहा याद आ रहा है जिसे कहना चाहूंगी-

काल करे सो आज कर आज करे सो अब।

पल में परलय होगी बहुरी करेगी कब।।

अंत में यही कहना चाहूंगी “जो समय को पहचानता है, समय उसे पहचान देता है। समय को सही पहचानना ही समय का सदुपयोग है और हमें समय का सदुपयोग करने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए।”

प्र02-आप लिखने के शैली के इस विचार के साथ कैसे आये?

उ0-इस शैली में लिखने का अभिप्राय सभी को अपना संदेश पहुंचाना है। मैंने हिंदी साहित्य से एम. ए. किया है। जब मैं निराला,

सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा की रचनाओं को पढ़ती थी तो कठिन शब्दों का अर्थ समझने में काफी मसकत करनी पड़ती थी (अब आज की तरह गूगल का जमाना तो था नहीं।) तो मुझे लगा ऐसी कविता हो जो पढ़ते समझ में आ जाय जिसे कम पढ़े लोग भी समझ ले इस लिए हमने सरल शैली में यानी गद्यात्मक मिश्रित शब्दों को चुना और काव्य को तुकबंदी के माध्यम से कविता लिखना शुरू किया।

प्र03- आपको इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

उ0-जी मैंने ऐसे ही माँ के सर्गवास के बाद उनको खोने के गम में 1997 से कविता लिखना शुरू किया। उसके बाद डायरी देखने के बाद बच्चों ने वर्डप्रेस और यौरकोट पर ब्लॉग बना दिया जिस पर लिखने के बाद मैं फेसबुक, वर्डस्एप पर शेयर करने लगी। तब कितने लोग जो मोबाइल या आनलाइन पढ़ नहीं पाते थे तो हमने उन लोगों के लिए बुक पब्लिश कराने को सोची और लोगों तक मेरे विचार पहुँच सके तो ब्लू रोज पब्लिशर से बात किया और आज ये पुस्तक आपके सामने है।

प्र04-आपकी पुस्तक वास्तव में क्या बताती हैं?

उ0-मेरी पुस्तक मेरी जिंदगी का एहसास है जो काल्पनिक नहीं हकीकत की धरातल है। एक प्रकार से कह सकते हैं जीवन के विभिन्न झंझावात से गुजरने के बाद शब्द फूट पड़े हैं जो किताब में है। यदि आप पढ़ेगें तो समाज में अपने आस-पास अपने जीवन का एहसास कहीं न कहीं जरूर पायेगें। हमारी पुस्तक बताती है कि विभिन्न संघर्षों के बाद भी यदि जूनून हो तो क्षेत्र चाहे जो हो उसका सामना कर सफलता अर्जित कर सकते हैं।

प्र05-इस पुस्तक को लिखते समय आपके दिमाग में क्या चल रहा था?

उ0-जी कविता लिखती थी पर मेरी पुस्तक पब्लिश होगी ये एक सपना था जो मैं सरस्वती की कृपा मानतीं हूँ। इसलिए पुस्तक लिख रही हूँ ये दिमाग में आया ही नहीं बस मां सरस्वती की कृपा हुई और लाइन मिलता गया और आज 1997 से लिखा डायरी किताब के रूप में है। इसलिए मुझे यह कहना मुश्किल है कि किताब लिखते समय दिमाग में क्या चल रहा है।

प्र06- आप इस पुस्तक में कितना समय लगाते थे?

उ0-जी जिंदगी के एहसास बुक पब्लिश कराने हेतु यानी अपने सपना को पूरा करने हेतु हमने दिन रात एक किया यानी अपने दैनिक कार्यों को सम्पन्न करने के बाद हमने किताब के लिए एक दिन में 12घंटे तक भी समय लगाये हैं।

प्र07-क्या कोई पल आप किताब लिखने के विचार से पीछे हट गए थे।

उ0-हमनें तो अपना एहसास लिखा था ये किताब बनेगी पता ही नहीं था। हाँ जब पी. डी. एफ ओके हो गया तो मैं उसे कम से कम 15बार पढ़ा होगा कि समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। पीछे तो नहीं हटी पर मन असमंजस में अवश्य फंस गया था।

प्र02-आप अपनी तरफ से आने वाली आलोचना को कैसे सम्भालेंगे?

उ0- हिंदी साहित्य के दृष्टिकोण से देखा जाए तो आलोचना, समालोचना,समीक्षा तो आम बात है और जहाँ तक मेरे विचार को पूछा जा रहा है कि कैसे संभालेंगे आलोचना को तो मेरे विचार में कबीर दास का दोहा हिंदी साहित्य के लिए उपहार और मेरा विचार भी है। कबीर का दोहा-

निंनदक नियरे राखिये, आँगन कुटि छवाय।

बिन पानी, साबून बिना, निर्मल करे सुभाय।

इसका अर्थ है व्यक्ति को सदा चापलूसों से दूरी और अपनी निंदा करने वालों को अपने पास ही रखना चाहिए, क्योंकि निंदा सुनकर ही हमारे अंदर स्वयं को निर्मल करने के लिए साबुन पानी की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

प्र09-पुस्तक के प्रकाशन के दौरान प्रकाशक के साथ आपका अनुभव कैसा रहा है?

उ0-पुस्तक के प्रकाशन के दौरान राष्ट्रीय भाषा हिंदी होने से काफी परेशानी आयी पर पुस्तक के प्रकाशन के दौरान रजनी अजीत सिंह का अनुभव खट्टा कम मीठा ज्यादा रहा है।

प्र010-आप उभरते लेखकों की सलाह कैसे लेंगे?

उ0-हमने अभी तक हिंदी साहित्य में जितने कवियों को पढ़ा उससे बहुत कुछ सीखा है अब उभरते कवियों से आज के दौर में बदलते लोगों के विचारों को उनसे सीखना है ताकि पुरातन और आधुनिकता में समाजस्य स्थापित कर सके। क्योंकि सीखने की कोई उम्र नहीं होती है और हर इंसान से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है वो उम्र में छोटे हों या बड़े लेकिन उनका सलाह परमआवश्यक है।

धन्यवाद आपका

रजनी अजीत सिंह 3.12.2018

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