जिदंगी में “कुछ सवाल”

कुछ सवाल मैं अपने आप से करना चाहती हूँ।
तेरी खामोशी से परेशान हो जवाब भी खुद ही ढूंढना चाहती हूँ।
क्यों इतना अपनापन दे हक जताया, क्यों खोयी चेतना को फिर से जगाया?
क्यों मेरे अँधेरे जीवन में रौशनी फैलाया?
कहीं डायरी में शब्द सीमट रह गया होता तो अच्छा होता।
जब पढ़ना ही नहीं था जिदंगी के एहसास को,तो क्यों लिखने का विश्वास जगाया।
अब मैं अपने आप के सवालों से विखर रही हूँ।
सवाल का जवाब तुझसे पूछना चाहती हूँ, पर सवाल का जवाब न पाने से घूट – घूट कर जी रही हूँ।
कहना तो बहुत कुछ चाहती हूँ तुझसे, पर बेबस ओठों को सी रही हूँ।
क्यों ऐसा विश्वास है मन में कि एक फरिश्ता फिर इन ओठों पर खुशी के गीत सजा जायेगा।
रजनी अजीत सिंह 7.9.18
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