जिंदगी में “हाल मन का”

सच अजीब हाल है मन का भी,
सबकुछ कह देने के बाद भी,
ये मन असमंजस में रहता है।
हर हाल का जिक्र मन तुमसे करने को कहता है।
मन कहता है खो जाऊँ अतीत की परछाइयों में।
जब तुम्हारे अनोखे रिश्तों का खिस्सा लेकर सोचती हूँ
तो मेरा मन हँस पड़ता है।
जो बात न करूं तो मेरी विवशता आँसू बन बहने लगता है।
मेरी यादें, वादे, सपने, ख्वाहिशें, गिला, शिकवा – शिकायत,
सब प्यार के एहसास के आगे अर्थहिन लगने लगता है।
और अगले पल दूर होकर भी पास होने का अपनापन महसूस करने लगती हूँ।
अधूरी बातें, अधूरा परिचय, सब कुछ ब्यां कर जाने का अधूरा प्यार का एहसास,
इन आँखों के सकून के लिए ये मन जाने कहाँ कहाँ भागता है
और ये मन आँखों को भा जाने वाला जाने क्या क्या सपना दिखाता है।
सच अजीब हाल है मन का भी,
सब कुछ कह देने के बाद भी ये मन असमंजस में रहता है।
रजनी अजीत सिंह 5.9.18
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