जिंदगी में “सोच रही थी बैठ अकेली”

सोच रही मैं बैठ अकेली, कितना जीवन में सुख – दुःख झेली।
खुशियों के बीते पल से मैं उर के छाले सहलाती हूँ।
मैं अपना मन बहलाती हूँ!
नहीं खोजती मीठे बोल के मरहम,धीरज धर धर मैं बन गई कुछ निर्मम।
अपने उर के घावों को नैनो के जल से नहलाती हूँ।
मैं अपना मन बहलाती हूँ!
सह – सह कर जब आहत होती, तब मन से आह निकल जाती है।
मानुष का वो निर्मम छाती, तब क्यों नहीं फट जाती है।
मैं अपना मन बहलाती हूँ!
थक हार माँ के चरणों में, कुछ आस लगा गिर जाती हूँ।
अपने मन के दुर्बलता को फिर से सबल बनाती हूँ।
मैं अपना मन बहलाती हूँ!
रजनी अजित सिंह 14.8.18
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Collaborating with Rajni Singh

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6 विचार “जिंदगी में “सोच रही थी बैठ अकेली”&rdquo पर;

    1. जी आपने सही कहा। मैं हिंदी साहित्य से एम. ए. किया है तो निराला, जयशंकर प्रसाद और महादेवी वर्मा आदि की रचनाओं को पढकर ही लिखना सिखा है। हरिवंश राय बच्चन जी तो फेवरेट हैं तो उनकी लयबद्धता को अपने शब्दों में ढालने की कोशिश की है।

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