जिंदगी में “प्रिय प्राणेश का साथ”

जिंदगी बेनूर, बेरंग, गम का चादर ओढ़े था।
बेरंग – बेनूर जिंदगी ने जब प्रिय प्राणेश का हाथ थामा तो, उसके एक नजर पड़ते ही जिंदगी हर मोड़ पर हसीन हो गई।
बेजार सा था जिंदगी सूखे पत्तों की तरह,
प्रिय प्राणेश का साथ मिलते ही जिंदगी सदा बहार सी रंगीन हो गई।
माना बिखर गए थे कुछ सपने हसीन कुछ सालों के लिए।
जब एक दूसरे का प्यार ऐसा घुला की जिंदगी जीने की वजह भी मिल गई।
तोड़ दिया प्राणेश ने पिंजरा मेरा, जिसमें मैंने खुद को और लोगों ने मुझे कैद कर रखा था।
खोल दी पांव की बेड़ी मेरी और आजादी दे दी सारी, छू लो तुम उन्मुक्त गगन को शब्दों से अपने।
धन दौलत का घना बादल बिना ऋतु के बारिश सा बरस शांत सा हो जाता है,
तब हमने लेखनी चला शब्दों के मंजर का लुफ्त उठाया है।
जान लो सब अब हक नहीं माँ सरस्वती के दिये तौफे का तौहीन करने का।
महक उठी बगिया मेरी, जिंदगी के हर मोड़ पर, प्राणेश ने आत्म विश्वास जगाया गम हो या खुशी, हर हाल में जिंदगी को खूबसूरत बनाने का।
रजनी अजीत सिंह 28.8.18
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2 विचार “जिंदगी में “प्रिय प्राणेश का साथ”&rdquo पर;

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