जिंदगी में “व्याकुलता”

दर्द के व्याकुलता में मैंने ये राज जाना।
जो वजह मिली जीने की तुझे अपनो के बीच रिस्ता निभा ले जाने का,
वो बीच राहों में हवा का टकरा जाना था।
बातें कर ले जाती थी मन की सब अपना समझकर,
वो महज मन का सकून था भुलावा या छलावा ही था।
मेरे दर्द में भी सकून मेरे प्यार भरे एहसासों में है।
मैं जब सब कुछ भूलकर अपने एहसासों की डोर को जब भी तोड़ना चाहती हूँ।
तब माँ सपनों में तेरे मेरे रिश्तों की डोर और मजबूत कर जाती है।
पता नहीं ये पिछले जन्म का पुण्य है या प्रायश्चित करने के लिए ये एहसास दिला जाती है।
रजनी अजित सिंह 27.7.18
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