जिंदगी में “मोबाइल वरदान या अभिशाप”

कभी सपना हुआ करता था बिन तार बिन चिठ्ठी ही काश संदेश पहुँच जाते।
तब आया जिंदगी में टेलिफ़ोन जो आपस में बात कराये।
जब कुछ इमर्जेंसी होती मिलता न पी, सी, ओ, तो लगता काश झट कोई संदेश पहुँचाए, तब जीवन में आया पेजर।
और अब सपनो से परे जीवन में आ गया
“मोबाइल”
कोई गुजर जाये तो फौरन संदेश पहुँचाती है।
जो कभी न मिल पाए उसे विडियो कॉल कर मिलवाती है।
जो प्रेमी पहले एक पाती देने के लिए कितनी मसकत करते थे वो आज बेहिचक हर पल बतियाते हैं।
सबके जीवन में मोबाइल खुशियां बहुत लेआती है।
क्षण भर में क्लिक करते ही सारा ज्ञान बताती है।
पर आवश्यकता से अधिक चेटिंग अपने अपने काम छोड़कर बिना वजह भी मैसेज करने, बार-बार चेक करने की गंदी लत लगाती है।
मोबाइल काम-काज सब ठप कराती है
यही वजह है कि सगी माँ भी अपने बच्चों को भोजन बिना तरसाती है।
आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है।
यदि ऐसे मोबाइल का दुरुपयोग रहा तो यही वरदान अभिशाप भी बन जाती है।
रजनी अजित सिंह 27.7.18
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4 विचार “जिंदगी में “मोबाइल वरदान या अभिशाप”&rdquo पर;

  1. Bahut khub…….nishchit technology ne hamen bahut kuchh diya……magar prem hi chhin liyaa……ek kamre men chaar baithe hain…..magar saath nahi……..ek bas men aaju baaju do loga baithte they aur kuchh hi duri jaane par parichay ho jaataa thaa….ab to ek hi building men anjaane se rahte hain……..kaash ye technology naa hotaa to achchha tha…..ab aisaa mahsush ho raha hai.
    ham duniyan se jud gaye
    magar
    apno se dur ho gaye,
    ham utirn ho kar bhi
    anutirn ho gaye.

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