जिंदगी में कर्म फल की इच्छा।

आओ चले हम उस दुनिया में
कर्म – कुकर्म का जहाँ हो जाय तुरन्त हिसाब।
आओ चले उस समय में
जहाँ मिल जाय तुरंत पाप-पुण्य का फल।
निश्चित होता पाप का फल तो
जो तय ही नहीं की हमे मिलेगा
उसका दर्द नहीं होता।
सीमित होता यदि दुःख किसी का
तो सुख मिलने का भी आस होता।
निराश भरे इस जीवन में आशा का संचार होता।
परिचित होते बुरे कर्म के दुःख से
तो अपरिचित सुख के पीछे भागा न होता।
हर वस्तु में गति है तो स्थिर रहना मुश्किल होता।
जब सब में सहमति होता तो जग में विवाद नहीं होता।
जब होती चहूं ओर शांति तो अशांत मन नहीं होता।
हिम्मत होता कुछ अच्छा करने को
तो बुरा करने की हिम्मत न होता।
रजनी अजीत सिंह 1.6.18
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2 विचार “जिंदगी में कर्म फल की इच्छा।&rdquo पर;

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