माँ की ममता।

जिंदगी में माँ से शिकायत शब्दों से श्रद्धांजलि स्वरूप-

जाने से पहले कुछ तो कही होती, साथ न सही बातें तो साथ होती।

शिकायत भी नहीं कर सकती, कुछ खामियां मुझमें ही थी।
खामियों को सोचकर दिल परेशान है होता ।
जाने से पहले कुछ तो सोचा होता, शायद सोचा होता, तो जाने का अवसर नहीं आया होता।
ये अवसर तो आना ही था, रजनी के लिए अंधेरा बनकर।
अफशोश “जिदंगी” में “रात” कमी बनकर खलती रही, खली है, खलेगी , और खलती रहेगी।
जिस प्यार को अपना कहने के खातिर, भुलाया, ठुकराया, गंवाया है प्यार।
अब न प्यार ही रहा न तू ही रही।
जननी बनकर जब तू ही न समझ सकी रात को।
“रात “होकर भी अंधेरे में दिल के दीए को जला रौशनी है किया।
ताकी सब सुखी के साथ निद्रा में ही आराम का एहसास करे।
वर्ना ये आराम शब्द का एहसास किसने किया होता।
मां की रजनी
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