जिंदगी में कुछ अनकही सी बातों की यादें।

हर रोज अपने काम को खत्म कर तेरी यादों के झुरमुट में और कुछ अनकही सी बातों से परेशान हो जाती हूँ।
मैं तो बहुत कुछ कह जाती हूँ लेखनी से अपने दर्द को पर तुम्हें क्या दर्द है कभी बताने की कोशिश ही नहीं की और जितना मैं जानती हूँ वो बर्बाद दुनिया की वजह नहीं बन सकती।
मेरी लेखनी से निकले शब्द तो कितने को काल्पनिक तो कितनो को अपनी कहानी लगी। पर सच कहूँ तेरे शब्द मुझे बहुत घाव देते हैं बस यूँ समझ लो कहना भी मुश्किल और चुप रहना भी मुश्किल इस मुश्किल वक्त में क्या अपने कुछ शब्दों से मरहम लगा पाओगे। किसी ने क्या खूब मुहावरा बनाया है- भई गति सांप छुछुन्दर केरी उगलत बने न निगलत केरी।
इस गति से क्या मुझे निजात दिलाने की कोशिश करोगे या बस बड़ी बड़ी बातें करके दर्द को बढ़ाते ही जाओगे। मैंने इस हाल में भी मुस्कुराना सीख लिया है क्या जिंदगी में कुछ और भी सीखना हो तोड़ने सीखा जाना क्यों कि तेरी” रात “बहुत भोली है कुछ समझती नहीं कुछ समझती है तो सबकी खुशी के लिए अपनी खुशियों की बलि जो चढ़ाना सीख लिया है। जब-जब जी आँखों से गंगा की धारा बहने वाली होती है तो शब्दों को जोड़ने की कोशिश करती हूं ताकि दर्द को भूला सकूं। मैं क्या हर लिखने वाला यही करता है जब कुछ कर नहीं पाता तो शब्दों से ही
दर्द ब्यां कर जाता है चाहे समाज का हो या फिर अपना।
रजनी अजीत सिंह 15.4.18
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2 विचार “जिंदगी में कुछ अनकही सी बातों की यादें।&rdquo पर;

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