जिंदगी में रोज लिखते हैं।

लेखन अभिव्यक्ति भी कमाल की चीज़ होती है।
कुछ न कुछ छूटा ही रहता है रोज़।

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रोज लिखते हैं कविता शब्द कम पड़ जाता है।
भावनाओं को व्यक्त करने के लिए प्यार का एहसास कम पड़ जाता है।
प्यार बस महसूस किया जा सकता है उसे शब्दों से कहा नहीं जाता है।
हम ठहरे वक्ता हमसे चुप भी रहा नहीं जाता है।
दुश्मन ललकारे समर के लिए तो क्षत्राणी हूँ युद्ध के लिए तैयार रहती हूँ मुझे कायरों की तरह खामोश रहा नहीं जाता है।
दया, धर्म सबका निर्वाह करती हूं मगर अन्यायी ही न्याय का ढोंग रचाए तो मुझसे म्यान में तलवार रखा नहीं जाता है।
सीमा पर जब जवान मरते हैं तो दुश्मनों को भून देने का हौसला रखती हूँ शहीद भले हो जाऊं पर बढ़े कदम मुझसे पीछे हटाया नहीं जाता है।
तिरंगा ही आन, बान शानऔरजान है मेरा इसका कोई करे अपमान तो सर धड़ से अलग कर दूं चाहे कोई कितना भी अपना हो इस फर्ज को अदा करने में जान भले जाये, वन्दे मातरम कह लड़ने के सिवा मुझसे पिछे हटा नहीं जाता है।
रजनी अजीत सिंह 9.4.18

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2 विचार “जिंदगी में रोज लिखते हैं।&rdquo पर;

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