जिंदगी में मेरी चाहत।

ऐ जिंदगी मैंने तुझसे स्वाभिमान और त्याग समर्पण की भावना हो इसके सिवा कुछ मांगा नहीं।
बसर कर लूँ अपनी पूरी जिंदगी प्यार से इससे ज्यादा कुछ चाहा नहीं।
जिंदगी में है हमने हर रिश्ते को प्यार से निभाया कि रिश्ता हमारा कहीं टूट न जाए।
जिंदगी में न दौलत की चाहत न सौहरत की चाहत।
हर रिश्ते के नजर में समंदर की एक बूँद के जैसे मगर मेरी चाहत दुनिया में मेरी लेखनी कुछ अलग सीख दे जाए।
खुशी और हंसी बांटती हूँ बस खुशी से जीने की चाहत।
भले बन जाऊँ धूल का एक कंण भी मगर त्याग ओझल न हो जिंदगी से यही मेरी ख्वाहिश यही मेरी चाहत।
रजनी अजीत सिंह 7.4.18
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