जिंदगी में तुम बिन सब सूना।

खाली कमरा और हम हमारी संस्कृति।
संस्कार, रीति रिवाज़ बिना भारतीय संस्कृति का आंगन सूना।
तुम सब बिन सूना घर का आंगन।
सेज सूनी तुम बिन साजन माँग सूनी सिंदूर बिना।
बिन कंगना के कलाई सूनी, बिंदिया बिन माथा भी सूना।
बच्चों बिना घर आंगन सूना, त्याग बिना नर-नारी सूनी।
त्याग बिना हर धर्म है सूना, कर्म बिना भोजन की थाली सूनी।
परिश्रम बिन हर मंजिल सूना, सेवा बिन पुण्य भी सूना।
मात-पिता बिन तीर्थ सूना, वस्तु बिना खाली कमरा सूना।
खाली कमरा की घड़ी है बोले हरपल तुम चलते रहना, रुकना थक के कभी न तुम।
सांस बिना तन है सूना, घर आंगन हो या कुटुम्ब।
प्यार बिना हर जीवन सूना, रह जाता खाली रिश्ता, खाली कमरा और खाली हम।
रजनी अजीत सिंह 3.4.18

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