जिंदगी में खत्म होता अपनापन। 

धीरे-धीरे उर के बन्धन से, 

खत्म होता अपनापन। 

रिस्तों का नव बेड़ी बन्धन, 

सब कुछ भूले रिस्ता नूतन। 

रिश्तों के इस अपनापन में, 

कोई प्यार का फूल खिला दे। 

प्रेम भरे अपनापन से, 

पुलकित कर दो इस रजनी को। 

रिश्तों के नुपुर ध्वनि से, 

गुंजित हो जाये मेरा मन। 

तरल प्यार का धार बहा दे, 

मृदु रिश्तों में रजनी। 

भूले रिश्तों की स्मृति से, 

सिहर सिहर उठता मन मेरा। 

टूट पड़ते रिश्तों की डोर, 

फिर जोड़ने को मचल मचल जाता मन मेरा। 

सुन प्रिय भाई ये मैंने मन की बात कही है, 

इसे कहते हैं जिंदगी में अपनापन। 

              🌺🌺रजनी सिंह 🌺🌺
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