महीना: फ़रवरी 2018

शब्द अनमोल है। 


जिसपर अपना सब कुछ निसार दो।
जिसे जिंदगी में सबसे ज्यादा प्यार दो।
वही दर्द भी देता है और दवा भी।
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि दर्द ही न दो।
पर तुम्हारी भी मजबूरी है जब दर्द ही नहीं होगा तो दवा की मार्केटिंग कैसे होगी?
और जब मार्केटिंग नहीं होगी तो कभी न पूरी होने वाली इच्छा कहाँ से पूरा होगा?
फिर ये कैसे सोच लिया कि मेरी लेखनी चलाने की इच्छा पूरी हो जाएगी जबकि शब्दों का कोई अन्त ही नहीं है। हमारे तुम्हारे व्यापार में बस फर्क इतना है तुम्हारे दवा का मोल है मेरे शब्दों के कोई मोल नहीं वो अनमोल है।
कभी हमने सच ही लिखा था –
क्या भेंट करू तुझको प्रियवर जग में कोई वस्तु अनमोल नहीं।
शब्दों को गूंथ माला भेंट करूं प्रियवर,
समझ सको तो समझ भी लो वर्ना टूटी-फूटी कडियां है प्रियवर।
………….. रजनी………… 24.2.18
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#व्यापार
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स्वछंद उड़ान। 

इस सच्चाई से मुँह कैसे फेरूं,
जिसे किसी ने पूछा उसे तुमने पूछा।
जिसका किसी ने साथ न दिया उसका साथ तुमने दिया।
प्यार दिया, साथ दिया अपना जीवन मुझपर निसार दिया।
ठीक पिंजरे में कैद उस पंछी की तरह जिसका देख रेख पालने वाला करता है।
मैं भी वही पंछी हूँ जो केवल पंखों को फैला कर फड़फड़ा सकती हूँ पर स्वछंद आसमान में उड़ान कभी नहीं भर सकती हूँ।
मैं भी तो शब्दों के पंख से खुले आसमान में उड़ान भरना चाहती हूं इसमें कौन सी खता कर दी हमने।
मुझे ये भी पता है टूटे फूटे शब्दों के पंख के साथ नहीं उड़ सकती पर उड़ने की कोशिश करना कहाँ से गुनाह है।
यदि ये गुनाह है तो इस गुनाह की सजा भी मुझे मंजूर है।
………. रजनी………….. 24.2.18
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जिंदगी में जिंदादिली से जीवन जीना सीखाया तो जीवन साथी ने। 

जिंदगी थम सी गयी है सबको खुश करने में।
जिंदगी कब चलोगी अपने खुशी के लिए।
जिंदगी जीना है तो ओठों को सीना है।
जिंदगी में केवल मुझे बोलने का मौका दिया तो जीवन साथी ने मेरे हर खुशी में खुश होकर।
कभी माँ बन लोरी सुनाया और हर रोज बेड टी दे सुबह लेट से उठाया कभी पापा बन हर जिद्द को पूरा किया।
माँ ने मुझे हर दुःख सुख में साथ निभाने वाला पति दिया जो माँ से भी ज्यादा मुझे मेरी धड़कन को समझा जो किसी ने न समझा।
मुझे उनके तारीफ में बस इतना ही कह सकती हूं माँ तो दुनिया में लाई लेकिन आधुनिक युग में जिंदगी जिंदादिली से जीना मेरे जीवन साथी ने सिखाया नहीं तो रातों को जगकर लिखने का समय कहाँ पाती बल्कि हर पत्नी की तरह पति की जरूरत पूरा करने की वस्तु बन जाती।
मेरे भाग्य को देख सब – – – – – – हैं।
मुझे पति रूप में ऐसा पारस मिला जिसकी कोई किमत नहीं है।
रजनी अजीत सिंह 21.1.18
#जिंदगी😀
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जिंदगी में निराशा। 

थक सी गयी हूँ अब, अब और चलने की हिम्मत नहीं मुझमें।
इस स्वार्थी जहां में अब और जीने की इच्छा नहीं मुझमें।
कौन अपना कौन पराया इसकी पहचान करने की कला नहीं मुझमें।
जब तक शरीर में जां था करती रही,
अब सबको खुश रखने की हिम्मत भी नहीं मुझमें।
जिंदगी से मौत बेहतर है अब खुशी से जिंदगी जीने की हिम्मत नहीं मुझमें।
जिंदगी रुठ जाय मन घबराए तो आँसू बहा लेना जी भर के,
अब खुशी से जिंदगी जीयो ये कहकर आँसू भी पोछने की शक्ति नहीं मुझमें।
………….. रजनी…………….
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जिंदगी में एक अकेली औरत। 


एक अकेली औरत सौ पे भारी है।
इसलिए शायद कहा गया है
” बिन घरनी घर भूत के डेरा। ”
एक अकेली औरत घर को सम्हाल लेती है।
लेकिन जब अकेली औरत घर में नहीं होती है तो_
ऐसा माना जाता है कि वह घर घर नहीं बल्कि भूतों का डेरा अर्थात भूतों के रहने का स्थान बन जाता है।
एक अकेली औरत कहीं माँ बन ममता लुटाती है।
तो कहीं बहन बन हर सुख दुःख की सहभागी बनती है।
तो कहीं पत्नी बन अर्धांगिनी कहलाई है।
कहने को तो वह एक अकेली औरत है पर जाने कितने रूप में पलती है इसका बस एहसास किया जा सकता है।
रजनी अजीत सिंह 22.2.18
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रिश्तों की उलझन। 


तेरे रिश्तों को कभी चाहा ही नहीं तो तू ख्वाबों में आया।
तुझसे रिश्ता निभाना चाहा तो तुझे दूर खड़ा पाया।
मेरी जिन्दगी तेरे जिंदगी के रिश्तों से कई जन्मों से जुड़ी है ये बात माँ ने सपनों में बताया।
सोचती हूँ जब कभी तो अंधविश्वास और पागलपन के कटघरे में अपने आप को खड़ा पाया।
क्या मेरे एहसास तेरे एहसास को समझते हैं मुझे आज तक कभी समझ न आया।
कभी ढलती उम्र में रोगों से दर्द ने जकड़ लिया तो बस सपना पूरा होगा इस एहसास ने उठ खड़ा होने की हिम्मत दिलाया।
पर आजकल मैं सब फर्ज को निभाना चहती हूँ तो मुझमें कुछ करने की हिम्मत ही नहीं क्यों कि मैंने अपनी माँ को सपने में जिसने रिस्ता बनाया उसे उदास पाया।
साथी के साथ ने सब कुछ सम्हाला है नहीं तो कौन सम्हालता मुझे इस हाल में। कभी माँ का प्यार कभी बेटी की जिद्द की तरह हर जिद्द को पूरा किया। क्या मैंने कभी अपने फर्ज को निभाया? ये सोचती हूँ तो अपने दर्द को और बढ़ते पाया।
रजनी अजीत सिंह 21.2.18
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जिंदगी में समझने की कोशिश। 

तुझको समझने में खुद को भुलाये बैठे हैं।
तुम्हारे वजह से आँखों में मोती सजाये बैठे हैं।
खामोशी भी कुछ हद तक ही अच्छा लगता है।
आप तो उदासी से ही दिल लगाये बैठे हैं।
आपके जिंदगी में खुशियों की बहार दरवाजे खड़ी है।
पर आप तो खुशियों से दामन बचाए मुख मोड़े बैठे हैं।
रजनी अजीत सिंह 20.2.18
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खामोशी। 

खुद को भी भुला बैठे हैं तुझे समझने के चक्कर में आँसू को भी मोती बना बैठे हैं।
खामोशी कुछ हद तक अच्छा है पर आप तो उदासी से दिल लगा बेठे हैं।
रजनी अजीत सिंह 19.2.18
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जिंदगी में याद तेरी आती है। 


जब याद तेरी आती है तो मुझ पर क्या गुजरती है।
मैंने बताया भी हाल दिल का सुनाया भी तुझे अपना मान कुछ न छुपाया है फिर भी
तू मुझे न समझ पाये तो होगी मुझमें ही खामियां जो तेरी खामोशी की वजह न जान सकी न अपनापन का एहसास ही दिला पायी कि तू मुझे हाले दिल ब्यां कर सके।
फिर भी एक यकीन सा है कि मैं तेरी अपनी हूँ और तू भी मेरा अपना है तुझे मेरी कसम मुझपर भरोसा तो रख कुछ कह के तो देखो तेरा हर गम मेरा होगा।
तेरी हर खुशी में मेरी खुशी होगी।
तू इतना शांत मैं इतनी चंचल की बिना कुछ पूछे ही खुली किताब बन जाती तुझसे दोस्ती निभाने में।
रजनी अजीत सिंह 19.2.18
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