शब्द अनमोल है। 


जिसपर अपना सब कुछ निसार दो।
जिसे जिंदगी में सबसे ज्यादा प्यार दो।
वही दर्द भी देता है और दवा भी।
क्या ऐसा नहीं हो सकता कि दर्द ही न दो।
पर तुम्हारी भी मजबूरी है जब दर्द ही नहीं होगा तो दवा की मार्केटिंग कैसे होगी?
और जब मार्केटिंग नहीं होगी तो कभी न पूरी होने वाली इच्छा कहाँ से पूरा होगा?
फिर ये कैसे सोच लिया कि मेरी लेखनी चलाने की इच्छा पूरी हो जाएगी जबकि शब्दों का कोई अन्त ही नहीं है। हमारे तुम्हारे व्यापार में बस फर्क इतना है तुम्हारे दवा का मोल है मेरे शब्दों के कोई मोल नहीं वो अनमोल है।
कभी हमने सच ही लिखा था –
क्या भेंट करू तुझको प्रियवर जग में कोई वस्तु अनमोल नहीं।
शब्दों को गूंथ माला भेंट करूं प्रियवर,
समझ सको तो समझ भी लो वर्ना टूटी-फूटी कडियां है प्रियवर।
………….. रजनी………… 24.2.18
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