जिंदगी में तेरे सर सेहरा सजे। 

किस घड़ी किस नक्षत्र में तुझसे अपना रिश्ता बनाया।
तू समझ के भी मुझे न समझ पाया।
हर बार ही मान सम्मान गंवा तुझको पुकारा।
हर बार ही तुझपर प्यार और ममता लुटाया।
ठिकाना नहीं थी जिंदगी की मेरी फिर खुशियों को लेकर मेरे जिंदगी में आया।
ठिकाना कब का बदल चुका था उड़ते पंक्षी का।
मगर तेरे बातों से मिले एहसास और यादों को मन में अब भी सजाया।
मुझे पता है मुझे मिलना न तुझसे पर एक विश्वास सा है मन में तेरे सर सेहरा सजाये मुझे माँ दिखाये।
बड़े अरमान होते हैं माँ के की मेरे बेटे के सर सेहरा सजे।
और वो भाग्य शाली माँ होती है जिसे ईश्वर ये दिन दिखाए।
रजनी अजीत सिंह 29.1217
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