जिंदगी दो धारी तलवार। 

सम्मोहन के दो धारी तलवार चले तो जीत हार का प्रश्न कहाँ।
आवश्यकता ही विज्ञान की जननी विज्ञान भी दो धारी तलवार है।
क्षत्रीय कुल में जन्म लिया क्षत्राणी कहलाती हूँ। सीमा पर रक्षा और अपनी सुरक्षा के खातिर

  त्रिशूल, धनुष, करवाल और पिस्तौल चला बेआबरू करने वाले पर वार कर जाती हूँ। 

 मैं धरती की बेटी बनकर विजय पताका फहराती हूँ।

रजनी अजीत सिंह 

4 विचार “जिंदगी दो धारी तलवार। &rdquo पर;

  1. बहुत सुंदर और सटीक लिखा आपने।।आपकी कविता पढ़ अपनापन सा लगता है क्या अपनापन हो ही गया है।। एक शब्द के कई अर्थ होते हैं।।समझनेवाले अलग अलग ढंग से समझते है ।सभी स्वतंत्र हैं जिसको जैसी मर्जी समझे।।मल्लिक मोहम्मद जायसी के लिखे पद्मावती का विवाद। वे क्या सोचकर लिखे होंगे वही जाने।वे सोचे भी नही होंगे कि कभी ऐसा होगा।खैर हमसभी के साथ भी अक्सर ऐसा होता रहता है।बड़भागी होते हैं वे लोग जिसे कोई सलाह दे या उसकी लेखनी में कमी निकाल भुलसुधार करवाये वरना आज के लाईक और कमेंट्स के दौर में किसे पड़ी है सुधार करवाने की।मैं भाग्यशाली समझता हूं कि आप जैसे अच्छे लोग हमारे साथ हैं।मगर हमारी लेखनी के किसी दूसरे के पोस्ट पर विवाद का कारण बने और किसी अपने का दिल दुखे जो मेरे में निखार करवाने को लेकर कमैंट्स करता है तो मेरा भी दिल दुखना स्वाभाविक है। फिर हमें ऐसे विवाद से डर जरूर लगता है।आप बहुत अच्छे हैं और आपके बताये गए हिंदी ज्ञान से मुझे दो शब्दों का ही ज्ञान बढ़ा वह अतुल्य है और आशा करता हूँ कि सारी जिंदगी आप जैसे अपनों से कुछ न कुछ सीखूं।

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    1. धन्यवाद आपका जो आपने पढ़ा और सराहा। रह गयी विवाद की बात तो लेखनी की दुनिया में आलोचना समालोचना होती रहती है इससे डर जाय तो लेखनी चल ही नहीं पायेगी। जब तुलसीदास जैसे लोग नहीं बच पाये आलोचना से तो हम और आप कैसे बच सकते हैं। जैसे तुलसी दास ने सीता को पतिव्रता स्त्री मानकर रामचरितमानस में गुणगान किया जबकि किसी और ने उर्मिला को पतिव्रता मानकर उर्मिला पर पूरी पुस्तक लिख डाला क्योंकि उनके नजर में 14 साल पति से दूर रहकर अपने पति के आज्ञा का पालन किया तो उनके नजर में उर्मिला सीता से कहीं अधिक पतिव्रता लगी तो अपने अपने विचारों का खेल है।

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