जिंदगी चौराहे पर भाग 1 

[दगी चौराहे पर ] भाग 1

  ये रचना दो अर्थो को लिए हुए है – 

जिंदगी परआज के युवा पीढ़ी पर जो विभिन्न प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए तैयारी कर रहे हैं। 

जिंदगी चौराहे पर खड़ी है। 

रास्ते तो चारों तरफ है, पर एक पर चलना मुनासिब है। 

निगाहें तो चारों तरफ है, तब एक पर कैसे चला जाए। 

ऐ पथिक तू एक रास्ता चुन, क्यों कि चारों तरफ जाना संभव नहीं। 

समुद्र में तैरने वाले नदी से डरते हो। 

नदी को पार करने वाले तलाब से डरते हो। 

तलाब को तो पार करना सीखो। 

वर्ना नाले से भी डरोगे क्या? 

नाले से डरोगे तो जिन्दगी तुम से डर कर रुठ जाएगी। 

रूठे हुए को भी मनाना सीखो।

वर्ना जिंदगी तुम से डर कर रूठेगी। 

तो अपने को चौराहे पर खड़ा पाओगे। 

और जिंदगी चौराहे पर खड़ी होगी। 

तब पथ एक चुनना होगा। 

हे ईश्वर मेरे धर्मसंगी को एक रास्ता चुनना सीखा दो।  

जो आज मुझसे  रूठा है, उसे कल तो पथ पर मिला दो। 

ताकि मैं उसे एक रास्ता तो चुनना सीखा  दूं। 

जिंदगी बहुत बड़ी है दोस्त, चारों तरफ चलना अभी छोड़ दो। 

मेरा मशविरा है अभी एक रास्ता चूनो। 

ताकि एक मंजिल पालो। 

जब एक मंजिल मिल जाएगी तो चारों तरफ़ अलग – अलग दिशाओं में (अर्थात) हर दिशा में मंजिल बना लेना।
रजनी अजीत सिंह

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