जिंदगी में ख्वाब 22.9.17

मैं वो ख्वाब हूँ जो कभी पूरा न होता।

मैं वो दोस्त हूँ जो दोस्ती पर पल पल हूँ मिटती।

मैं वो हूँ बहन जो सपनो में भी खैरियत चाहती हूं।

मैं वो हूँ माँ जो तुझ में अपना बेटा खोजती हूँ।

जैसे माँ का नाम अनेक पर रूप एक ही है।

वैसे ही तुझसे रिश्ते अनेक पर एहसास रुपी प्रेम तो एक ही है।

क्या फर्क पड़ता है मै कौन हूँ।

कहाँ से आयी हूँ।

किस के लिए किस किस रूप में पलती हूँ।

जहाँ में तुझ से पहचान है ये क्या कम है जिंदगी जीने के लिए।

एहसास को एहसास ही रहने दो एक ही रिश्ते का कोई नाम न दो।

जब सब कुछ बात कर कहना होता है तो करीबी दोस्ती का हाथ बढ़ा दोस्त समझ लेती हूँ।

जब रक्षा करने का वादा चहता है तो बहन बन भाई समझ लेती हूँ।

जब जां से भी अजीज का भला चाहती हूं तो माँ बन बेटा समझ लेती हूँ।

रजनी अजित सिंह

15 विचार “    जिंदगी में ख्वाब 22.9.17&rdquo पर;

  1. क्या खूब लिखा है—-रिश्ते को बहुत ही सुंदरता से सहेजा वो कौन—?
    जीवन को त्याग और समर्पण बना दिया वो कौन,
    हर रिश्ते को हँसकर निभा दिया वो कौन—?
    जहाँ में तुझ से  पहचान है  ये क्या कम है जिंदगी जीने के लिए। 

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