~जिंदगी में मेरी ख्वाहिश है। 9.9.17 (5.55)

मेरी ख्वाहिश है कि मैं अपने भाई के लिए फरिश्ता बन जाऊँ।

अपने भाई से लिपट रो लूं तो मैं बच्ची बन जाऊँ।

अपने भाई के ओठों पे हंसी लाने के लिए,
ऐसा सद्विचार देना की मैं उसकी प्यार की खुशी की वजह बन जाऊं।

तेरे प्यार रूपी बातों को सोचती हूँ तो छलक उठती हैं मेरी आँखें।

तेरे बारे में न सोचूँ तो क्या मैं अकेली हो जाऊँ।

तेरे पारस रुपी गुंणो से वाकिफ हूँ लेकिन,

ये जरूरी नहीं की तेरी “दी “हर बार अच्छी बन जाये ।

तुझे खुशी देकर खुश रहना मुझे मंजूर है।

साथी और माँ को छोड़कर सब तो यही चाहते हैं कि मैं लौ पर नष्ट होने वाली पतंगा हो जाऊँ।

कविता लिखने से मन धीर है धरता,

नहीं तो मन ये तेरे किये कर्म को सोचकर खुशी के साथ थोड़ा परेशान है होता।

मगर जिस माँ ने मेरे और तेरे बीच रिस्ता जोडा है उसी के न्याय के अदालत में फैसला छोड़ देती हूँ।

🌺रजनी अजीत सिंह 🌺

11 विचार “~जिंदगी में मेरी ख्वाहिश है। 9.9.17 (5.55)&rdquo पर;

    1. अंसारी जी मैंने आपके पोस्ट पर कुछ सजेशन दिया और राय मांगी थी। आपने कमेंट हटा दिया या नेटवर्क प्राब्लम से गया नहीं है शो नहीं कर रहा है। क्या रिजन है पता नहीं चल पा रहा है।

      Liked by 1 व्यक्ति

  1. अति उत्तम रचना है दी। इसे पढ़कर हम फिर भावुक से हो गये हैं दी। हर भाई की यही कामना होती है कि उसकी दी खुश रहे। हँसती रहिए और खुश रहिए देखिएगा भाई के चेहरे पर भी मुस्कान आ जायेगी।

    पसंद करें

      1. उम्मीद करती हूं कि आपको अपनी बहन की खुशी के रिजन भी पता होगा और मेरे पोस्ट के माध्यम से मेरे विचार भी पता चला ही गया होगा। भगवान् आपकी प्रार्थना अवश्य स्वीकार करे। सभी की बहनों की भलाई इसी में है।

        पसंद करें

टिप्पणियाँ बंद कर दी गयी है।