हल षष्ठी की व्रत कथा (ललही छठ) 13.8.17)

हल षष्ठी की व्रत कथा 

ये ब़त ललही छठ के नाम से जाना जाता है। भारतीय संस्कृति के विभिन्न  त्योहार कौन – कौन से है? मैं बताती रहती हूँ ताकि भारत में मनाया जाने वाला त्योहार का महत्व पता चल सके और उसका हमारे जीवन में क्या महत्व है समझाने की कोशिश करती हूं। 

आज 13. 8.17 को ये व़त मनाया जाएगा। जिसकी जानकारी निम्नलिखित है – 

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता श्री बलरामजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन श्री बलरामजी का जन्म हुआ था। हल षष्ठी की व्रतकथा निम्नानुसार है…. 

प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी। उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका मन गौ-रस (दूध-दही) बेचने में लगा हुआ था। उसने सोचा कि यदि प्रसव हो गया तो गौ-रस यूं ही पड़ा रह जाएगा। 

यह सोचकर उसने दूध-दही के घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए चल दी किन्तु कुछ दूर पहुंचने पर उसे असहनीय प्रसव पीड़ा हुई। वह एक झरबेरी की ओट में चली गई और वहां एक बच्चे को जन्म दिया।

हल षष्ठी की व्रत कथा

वह बच्चे को वहीं छोड़कर पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई। संयोग से उस दिन हल षष्ठी थी। गाय-भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर उसने सीधे-सादे गांव वालों में बेच दिया।

×

उधर जिस झरबेरी के नीचे उसने बच्चे को छोड़ा था, उसके समीप ही खेत में एक किसान हल जोत रहा था। अचानक उसके बैल भड़क उठे और हल का फल शरीर में घुसने से वह बालक मर गया।

इस घटना से किसान बहुत दुखी हुआ, फिर भी उसने हिम्मत और धैर्य से काम लिया। उसने झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के चिरे हुए पेट में टांके लगाए और उसे वहीं छोड़कर चला गया।

कुछ देर बाद ग्वालिन दूध बेचकर वहां आ पहुंची। बच्चे की ऐसी दशा देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि यह सब उसके पाप की सजा है। 

वह सोचने लगी कि यदि मैंने झूठ बोलकर गाय का दूध न बेचा होता और गांव की स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट न किया होता तो मेरे बच्चे की यह दशा न होती। अतः मुझे लौटकर सब बातें गांव वालों को बताकर प्रायश्चित करना चाहिए।

×

ऐसा निश्चय कर वह उस गांव में पहुंची, जहां उसने दूध-दही बेचा था। वह गली-गली घूमकर अपनी करतूत और उसके फलस्वरूप मिले दंड का बखान करने लगी। तब स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ और उस पर रहम खाकर उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया।

बहुत-सी स्त्रियों द्वारा आशीर्वाद लेकर जब वह पुनः झरबेरी के नीचे पहुंची तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि वहां उसका पुत्र जीवित अवस्था में पड़ा है। तभी उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रह्म हत्या के समान समझा और कभी झूठ न बोलने का प्रण कर लिया

(समाप्त)

|आखिर क्या है कृष्ण के 16 हजार 108 रानियों का सच?

हल छठ (षष्ठी) | Hal Chatt (Sashti) Puja Vidhi | ऐसे करें हल छठ (षष्ठी) की पूजा | Boldsky

चूंकि बलराम का प्रमुख शस्त्र हल है इसलिए इसे हल छठ कहा जाता है। माना जाता है बलराम भगवान विष्णु की शैया के रूप में विराजमान शेषनाग के अवतार हैं। इस दिन ब्रज, मथुरा समेत समस्त बलदेव मंदिरों में धूमधाम से बलराम जयंती मनाई जाती है।

पूजा विधान

हल छठ के दिन प्रातःकाल स्नानादि के बाद पृथ्वी को लीपकर एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है, जिसमें झरबेरी, पलाश, गूलर, की एक-एक शाखा बांधकर बनाई गई हर छठ को स्थापित कर देते हैं। इसकी पूजा की जाती है। पूजन में सतनजा यानी गेहूं, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा और जौ सात प्रकार के अनाज का भुना हुआ लावा चढ़ाया जाता है। हल्दी में रंगा हुआ वस्त्र तथा सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के बाद कथा सुनी जाती है।

हल षष्ठी  

हल षष्ठी

विवरण

‘हल षष्ठी’ हिन्दू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित एक प्रमुख व्रत है। इस दिन व्रत करने का विधान है, जिसका बहुत महत्त्व है।

तिथि

भाद्रपद मासकृष्ण पक्षषष्ठी

ग्राह्य वस्तुएँ

बिना हल चले धरती का अन्न, शाक व सब्जियाँ

त्याज्य वस्तुएँ

‘हल षष्ठी’ पर गाय के दूध व दही का सेवन वर्जित माना गया है।

विशेष

‘हल षष्ठी’ को दाऊजी, मथुरा में ‘हलधर जन्मोत्सव’ का आयोजन बड़ी भव्यता के साथ किया जाता है।

संबंधित लेख

बलरामदाऊजी मन्दिर, मथुरा

अन्य जानकारी

‘हल षष्ठी’ को व्रत की छ: कथाओं को सुनकर आरती आदि से पूजन की प्रक्रियाओं को पूरा किया जाता है। इस दिन शिवपार्वतीगणेशकार्तिकेय और नंदी की पूजा का भी महत्त्व है।

हल षष्ठीभाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को कहा जाता है। यह हिन्दू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित एक प्रमुख व्रत है। ‘हल षष्ठी’ के दिन मथुरा मण्डल और भारत के समस्त बलदेव मन्दिरों में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई और ब्रज के राजा बलराम का जन्मोत्सव धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन गाय का दूध व दही का सेवन वर्जित माना गया है। इस दिन व्रत करने का विधान भी है। हल षष्ठी व्रत पूजन के अंत में हल षष्ठी व्रत की छ: कथाओं को सुनकर आरती आदि से पूजन की प्रक्रियाओं को पूरा किया जाता है।

ब़त पूजन

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को ‘हल षष्ठी’ पर्व मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान शेषनागद्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के रूप में धरती पर अवतरित हुए थे। बलराम जी का प्रधान शस्त्र ‘हल’ व ‘मूसल’ है। इसी कारण इन्हें ‘हलधर’ भी कहा गया है। उन्हीं के नाम पर इस पर्व का नाम ‘हल षष्ठी’ पड़ा। इसे ‘हरछठ’ भी कहा जाता है। हल को कृषि प्रधान भारत का प्राण तत्व माना गया है और कृषि से ही मानव जाति का कल्याण है। इसलिए इस दिन बिना हल चले धरती का अन्न व शाक, भाजी खाने का विशेष महत्व है। इस दिन गाय का दूध व दही का सेवन वर्जित माना गया है। इस दिन व्रत करने का विधान भी है। हलषष्ठी व्रत पूजन के अंत में हलषष्ठी व्रत की छ: कथाओं को सुनकर आरती आदि से पूजन की प्रक्रियाओं को पूरा किया जाता है।

संतान दीर्घायु व्रत

‘हल षष्ठी’ के दिन भगवान शिवपार्वतीगणेशकार्तिकेयनंदी और सिंह आदि की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। इस प्रकार विधिपूर्वक ‘हल षष्ठी’ व्रत का पूजन करने से जो संतानहीन हैं, उनको दीर्घायु और श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति होती है। इस व्रत एवं पूजन से संतान की आयु, आरोग्य एवं ऐश्वर्य में वृद्धि होती है। विद्वानों के अनुसार सबसे पहले द्वापर युग में माता देवकी द्वारा ‘कमरछठ’ व्रत किया गया था, क्योंकि खुद को बचाने के लिए मथुरा का राजा कंस उनके सभी संतानों का वध करता जा रहा था। उसे देखते हुए देवर्षि नारद ने ‘हल षष्ठी’ का व्रत करने की सलाह माता देवकी को दी थी। उनके द्वारा किए गए व्रत के प्रभाव से ही बलदाऊ और भगवान कृष्ण कंस पर विजय प्राप्त करने में सफल हुए थे। उसके बाद से यह व्रत हर माता अपनी संतान की खुशहाली और सुख-शांति की कामना के लिए करती है। इस व्रत को करने से संतान को सुखी व सुदीर्घ जीवन प्राप्त होता है। ‘कमरछठ’ पर रखे जाने वाले व्रत में माताएँ विशेष तौर पर पसहर चावल का उपयोग करती हैं।[1]

हलधर जन्मोत्सव

‘हल षष्ठी’ के दिन मथुरा मण्डल और भारत के समस्त बलदेव मन्दिरों में ब्रज के राजा बलराम का जन्मोत्सव आज भी उसी प्रकार मनाया जाता है। बलदेव छठ को दाऊजी में ‘हलधर जन्मोत्सव’ का आयोजन बड़ी भव्यता के साथ किया जाता है। दाऊजी महाराज कमर में धोती बाँधे हैं।

दाऊजी मन्दिरबलदेव

कानों में कुण्डल, गले में वैजयंती माला है। विग्रह के चरणों में सुषल तोष व श्रीदामा आदि सखाओं की मूर्तियाँ हैं। ब्रजमण्डल के प्रमुख देवालयों में स्थापित विग्रहों में बल्देव जी का विग्रह अति प्राचीन माना जाता है। यहाँ पर इतना बड़ा तथा आकर्षक विग्रह वैष्णव विग्रहों में दिखाई नहीं देता है। बताया जाता है कि गोकुल में श्रीमद बल्लभाचार्य महाप्रभु के पौत्र गोस्वामी गोकुलनाथ को बल्देव जी ने स्वप्न दिया कि श्याम गाय जिस स्थान पर प्रतिदिन दूध स्त्रावित कर जाती है, उस स्थान पर भूमि में उनकी प्रतिमा दबी हुई है, उन्होंने भूमि की खुदाई कराकर श्री विग्रह को निकाला तथा ‘क्षीरसागर’ का निर्माण हुआ। गोस्वामी जी ने विग्रह को कल्याण देवजी को पूजा-अर्चना के लिये सौंप दिया तथा मन्दिर का निर्माण कराया। उस दिन से आज तक कल्याण देव के वंशज ही मन्दिर में सेवा-पूजा करते हैं।

व्रत की विधि

  • व्रती को प्रात:काल स्नान आदि से निवृत्त हो जाना चाहिए।

  • इसके पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर गाय का गोबर लाएँ।

  • गोबर से पृथ्वी को लीपकर एक छोटा-सा तालाब बनाना चाहिए।

  • तालाब में झरबेरी, ताश तथा पलाश वृक्ष की एक-एक शाखा बांधकर बनाई गई ‘हरछठ’ को गाड़ दें। बाद में इसकी पूजा करें।

  • पूजा में सतनाजा (चनाजौगेहूँधान, अरहर, मक्का तथा मूँग) चढ़ाने के बाद धूल, हरी कजरियाँ, होली की राख, होली पर भुने हुए चने के होरहा तथा जौ की बालें चढ़ाएँ।

  • हरछठ के समीप ही कोई आभूषण तथा हल्दी से रंगा कपड़ा भी रखें।

  • पूजन करने के बाद भैंस के दूध से बने मक्खन द्वारा हवन करना चाहिए और पश्चात ओइसके कथा कहें अथवा सुनें।[2]

प्रार्थना मंत्र

गंगाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलेपर्वते।
स्नात्वा कनखले देवि हरं लब्धवती पतिम्‌॥
ललिते सुभगे देवि-सुखसौभाग्य दायिनि।
अनन्तं देहि सौभाग्यं मह्यं, तुभ्यं नमो नमः॥

अर्थात “हे देवी! आपने गंगाद्वारकुशावर्त, विल्वक, नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त किया है। सुख और सौभाग्य देने वाली ललिता देवी आपको बारम्बार नमस्कार है, आप मुझे अचल सुहाग दीजिए।”

विशेषता

  1. हल षष्ठी के दिन हल की पूजा का विशेष महत्व है।

  2. इस दिन गाय के दूध व दही का सेवन करना वर्जित माना गया है।

  3. इस तिथि पर हल जुता हुआ अन्न तथा फल खाने का विशेष माहात्म्य है।

  4. महुए की दातुन करना चाहिए।

  5. यह व्रत पुत्रवती स्त्रियों को विशेष तौर पर करना चाहिए।

  6. श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति और पुत्रों के दीर्घायु और सुख-सौभाग्य की कामना के लिए भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि को हलछठ व्रत-पूजा का विधान है। हलछठ का व्रत उत्तरभारत में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। द्वापर युग में भगवान कृष्ण के बड़े भाई के रूप में जन्मे बलराम के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में हलछठ मनाई जाती है। इसलिए इससे बलराम जयंती, ललई छठ या बलदेव छठ के नाम से भी जाना जाता है।

    आखिर क्या है कृष्ण के 16 हजार 108 रानियों का सच?

    हल छठ (षष्ठी) | Hal Chatt (Sashti) Puja Vidhi | ऐसे करें हल छठ (षष्ठी) की पूजा | Boldsky

    चूंकि बलराम का प्रमुख शस्त्र हल है इसलिए इसे हल छठ कहा जाता है। माना जाता है बलराम भगवान विष्णु की शैया के रूप में विराजमान शेषनाग के अवतार हैं। इस दिन ब्रज, मथुरा समेत समस्त बलदेव मंदिरों में धूमधाम से बलराम जयंती मनाई जाती है।

    पूजा विधान

    हल छठ के दिन प्रातःकाल स्नानादि के बाद पृथ्वी को लीपकर एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है, जिसमें झरबेरी, पलाश, गूलर, की एक-एक शाखा बांधकर बनाई गई हर छठ को स्थापित कर देते हैं। इसकी पूजा की जाती है। पूजन में सतनजा यानी गेहूं, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा और जौ सात प्रकार के अनाज का भुना हुआ लावा चढ़ाया जाता है। हल्दी में रंगा हुआ वस्त्र तथा सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के बाद कथा सुनी जाती है

    माता देवकी ने छठ का व्रत किया

    एक अन्य आख्यान के अनुसार द्वापर युग में माता देवकी ने छठ का व्रत किया था, क्योंकि खुद को बचाने के लिए मथुरा का राजा कंस देवकी की सभी संतानों का वध कर रहा था। देवर्षि नारद ने देवकी को हल षष्ठी व्रत करने की सलाह दी थी। उनके द्वारा किए गए व्रत के प्रभाव से ही बलराम और कृष्ण कंस पर विजयी हुए थे।

    यह भी है मान्यता

    हलछठ का व्रत करने वालों के बीच मान्यता है कि इस दिन ग्रामीण क्षेत्र में महिलाएं खेतों में पैर नहीं रखती है और इस दिन हल की पूजा की जाती है।

    व्रत करने वाले के लिए इस दिन गाय के दूध और दही का सेवन करना वर्जित माना गया है।

    इस दिन हल से जुता हुआ अन्न नहीं खाया जाता है। इस दिन वृक्ष पर लगे खाद्यान्न खाए जाते हैं।

    माना जाता है कि इस दिन व्रती को महुए की दातून श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति और पुत्रों के दीर्घायु और सुख-सौभाग्य की कामना के लिए भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि को हलछठ व्रत-पूजा का विधान है। हलछठ का व्रत उत्तरभारत में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। द्वापर युग में भगवान कृष्ण के बड़े भाई के रूप में जन्मे बलराम के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में हलछठ मनाई जाती है। इसलिए इससे बलराम जयंती, ललई छठ या बलदेव छठ के नाम से भी जाना जाता है।

    माता देवकी ने छठ का व्रत किया

    एक अन्य आख्यान के अनुसार द्वापर युग में माता देवकी ने छठ का व्रत किया था, क्योंकि खुद को बचाने के लिए मथुरा का राजा कंस देवकी की सभी संतानों का वध कर रहा था। देवर्षि नारद ने देवकी को हल षष्ठी व्रत करने की सलाह दी थी। उनके द्वारा किए गए व्रत के प्रभाव से ही बलराम और कृष्ण कंस पर विजयी हुए थे।

    यह भी है मान्यता

    हलछठ का व्रत करने वालों के बीच मान्यता है कि इस दिन ग्रामीण क्षेत्र में महिलाएं खेतों में पैर नहीं रखती है और इस दिन हल की पूजा की जाती है।

    व्रत करने वाले के लिए इस दिन गाय के दूध और दही का सेवन करना वर्जित माना गया है।

    इस दिन हल से जुता हुआ अन्न नहीं खाया जाता है। इस दिन वृक्ष पर लगे खाद्यान्न खाए जाते हैं।

    माना जाता है कि इस दिन व्रती को महुए की दातून श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति और पुत्रों के दीर्घायु और सुख-सौभाग्य की कामना के लिए भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि को हलछठ व्रत-पूजा का विधान है। हलछठ का व्रत उत्तरभारत में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। द्वापर युग में भगवान कृष्ण के बड़े भाई के रूप में जन्मे बलराम के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में हलछठ मनाई जाती है। इसलिए इससे बलराम जयंती, ललई छठ या बलदेव छठ के नाम से भी जाना जाता है।

    आखिर क्या है कृष्ण के 16 हजार 108 रानियों का सच?

    हल छठ (षष्ठी) | Hal Chatt (Sashti) Puja Vidhi | ऐसे करें हल छठ (षष्ठी) की पूजा | Boldsky

    चूंकि बलराम का प्रमुख शस्त्र हल है इसलिए इसे हल छठ कहा जाता है। माना जाता है बलराम भगवान विष्णु की शैया के रूप में विराजमान शेषनाग के अवतार हैं। इस दिन ब्रज, मथुरा समेत समस्त बलदेव मंदिरों में धूमधाम से बलराम जयंती मनाई जाती है।

    पूजा विधान

    हल छठ के दिन प्रातःकाल स्नानादि के बाद पृथ्वी को लीपकर एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है, जिसमें झरबेरी, पलाश, गूलर, की एक-एक शाखा बांधकर बनाई गई हर छठ को स्थापित कर देते हैं। इसकी पूजा की जाती है। पूजन में सतनजा यानी गेहूं, चना, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा और जौ सात प्रकार के अनाज का भुना हुआ लावा चढ़ाया जाता है। हल्दी में रंगा हुआ वस्त्र तथा सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है। पूजा के बाद कथा सुनी जाती है।

    हलछठ की कथा

    एक गांव में एक ग्वालिन रहती थी। वह गर्भवती थी और उसके प्रसव का समय समीप ही था। उसका दही-मक्खन बेचने के लिए घर में रखा हुआ था। तभी अचानक उसे प्रसव पीड़ा होने लगी, लेकिन उसने सोचा कि बच्चे ने जन्म ले लिया तो दही-मक्खन घर में ही रखा खराब हो जाएगा इसलिए वह उसे बेचने गांव में निकल पड़ी। रास्ते में उसकी प्रसव पीड़ा बढ़ गई तो वह एक झरबेरी की झाड़ी की ओट में बैठ गई और उसने वहां एक पुत्र को जन्म दिया। ग्वालिन को बच्चे से ज्यादा चिंता दूध बेचने की थी।

    बच्चे का पेट फट गया

    इसलिए वह बच्चे को कपड़े में लपेटकर झाड़ी में छोड़कर गांव की ओर चल दी। उस दिन संयोग से हल छठ थी इसलिए गांव में सभी को केवल भैंस का दूध-मक्खन चाहिए था, लेकिन ग्वालिन के पास तो गाय का दूध था। उसने पैसों के लालच में आकर सबसे झूठ बोलकर गाय के दूध को भैंस का बताकर बेच दिया। उधर जहां ग्वालिन ने बच्चे को झाड़ी में छुपाया था वहां समीप ही एक किसान खेत में हल चला रहा था। उसके बैल बिदककर खेत की मेढ़ पर जा चढ़े और हल की नोक बच्चे के पेट से टकरा जाने से बच्चे का पेट फट गया।

    बालक जीवित मिला

    किसान ने यह देखा और झरबेरी के कांटों से बच्चे का पेट सिलकर उसे वहीं पड़ा रहने दिया। ग्वालिन ने लौटकर देखा तो उसके होश उड़ गए। वह तुरंत समझ गई कि यह उसके पाप और झूठ बोलने का फल है। उसने गांव में जाकर लोगों के सामने अपने पाप के लिए क्षमा मांगी। ग्वालिन की दशा जानकर लोगों ने उसे माफ कर दिया और वह पुनः जब खेत के समीप पहुंची तो उसका बालक जीवित मिला।

    माता देवकी ने छठ का व्रत किया

    एक अन्य आख्यान के अनुसार द्वापर युग में माता देवकी ने छठ का व्रत किया था, क्योंकि खुद को बचाने के लिए मथुरा का राजा कंस देवकी की सभी संतानों का वध कर रहा था। देवर्षि नारद ने देवकी को हल षष्ठी व्रत करने की सलाह दी थी। उनके द्वारा किए गए व्रत के प्रभाव से ही बलराम और कृष्ण कंस पर विजयी हुए थे।

    यह भी है मान्यता

    हलछठ का व्रत करने वालों के बीच मान्यता है कि इस दिन ग्रामीण क्षेत्र में महिलाएं खेतों में पैर नहीं रखती है और इस दिन हल की पूजा की जाती है।

    व्रत करने वाले के लिए इस दिन गाय के दूध और दही का सेवन करना वर्जित माना गया है।

    इस दिन हल से जुता हुआ अन्न नहीं खाया जाता है। इस दिन वृक्ष पर लगे खाद्यान्न खाए जाते हैं।

    माना जाता है कि इस दिन व्रती को महुए की दातून करना चाहिए।

छत्तीसगढ़ का लोकपर्व-
हलषष्ठी (कमरछठ)

यह पर्व माताओं का संतान के लिए किया जाने वाला, छत्तीसगढ़ राज्य की अनूठी संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जिसे हर वर्ग हर जाति मे बहूत ही सद्भाव से मनाया जाता है।
हलषष्ठी को हलछठ, कमरछठ या खमरछठ भी कहा जाता है ।
यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। संतान प्राप्ति व उनके दीर्घायू सुखमय जीवन की कामना रखकर माताएँ इस व्रत को रखती है।
इस दिन माताएँ सूबह से ही महुआ पेड़ की डाली का दातून कर, स्नान कर व्रत धारण करती है।भैस के दुध की चाय पीती है।तथा दोपहर के बाद घर के आँगन मे, मंदिर-देवालय या गाँव के चौपाल आदि मे बनावटी तालाब (सगरी) बनाकर , उसमें जल भरते है।सगरी का जल, जीवन का प्रतीक है। तालाब के पार मे बेर, पलाश,गूलर आदि पेड़ों की टहनियो तथा काशी के फूल को लगाकर सजाते  है।सामने एक चौकी या पाटे पर गौरी-गणेश, कलश रखकर हलषष्ठी देवी की मुर्ती(भैस के घी मे सिन्दुर से मुर्ती बनाकर) उनकी पूजा करते है।साड़ी आदि सुहाग की सामग्री भी चढ़ाते है। तथा हलषष्ठी माता के छः कहानी को कथा के रूप मे श्रवण करते है।

इस पूजन की सामग्री मे पसहर चावल(बिना हल जुते हुए जमीन से उगा हुआ धान का चावल), महुआ के पत्ते, धान की लाई, भैस के दुध – दही व घी आदि रखते है।बच्चों के खिलौनों जैसे-भौरा, बाटी आदि भी रखा जाता है । बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों मे गेडी(हरियाली त्योहार के दिन बच्चों के चढ़ने के लिए बनाया जाता है) को भी सगरी मे रखकर पूजा करते है क्योंकि गेडी का स्वरूप पूर्णतः हल से मिलता जुलता है तथा बच्चों के ही उपयोग का है।

इस व्रत के बारे मे पौराणिक कथा यह है कि वसुदेव- देवकी के 6 बेटों को एक एक कर कंस ने कारागार मे मार डाला । जब सातवें बच्चे के जन्म का समय नजदीक आया तो देवर्षि नारद जी ने देवकी को हलषष्ठी देवी के व्रत रखने की सलाह दिया ।  देवकी ने इस व्रत को सबसे पहले किया जिसके प्रभाव से उनके आने वाले संतान की रक्षा हुई।

सातवें संतान का जन्म समय जानकर भगवान कृष्ण ने योगमाया को आदेश दिया कि माता देवकी के इस गर्भस्थ शिशु को खींच कर वसुदेव की बड़ी रानी रोहिणी के गर्भ मे पहुँचा देना जो इस समय गोकूल मे नंद-यशोदा के यहाँ रह रही है।तथा तुम स्वयं माता यशोदा के गर्भ से जन्म लेना ।

योगमाया ने भगवान के आदेश का पालन किया जिससे, देवकी के गर्भ से संकर्षण होकर रोहणी के गर्भ द्वारा जन्म लेने वाला संतान ही बलराम के रूप मे जन्म लिया ।उसके बाद देवकी के आठवें संतान के रूप मे साक्षात भगवान कृष्ण प्रकट हुए। इस तरह हलषष्ठी देवी के व्रत-पूजन से देवकी के दोनों संतानो की रक्षा हुई।

हलषष्ठी का पर्व भगवान कृष्ण व भैया बलराम से संबंधित है। हल से कृषि कार्य किया जाता है।तथा बलराम जी का प्रमुख हथियार भी है।बलदाऊ भैया कृषि कर्म को महत्व देते थे, वहीं भगवान कृष्ण गौ पालन को । इसलिए इस व्रत मे हल से जुते हुए जगहों का कोई भी अन्न आदि व गौ माता के दुध दही घी आदि का उपयोग वर्जित है।तथा हलषष्ठी व जन्माष्टमी एक दिन के अंतराल मे बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।
इस दिन उपवास रखने वाली माताएँ हल चले वाले जगहों पर भी नही जाती है।

इस व्रत मे पूजन के बाद माताएँ अपने संतान के पीठ वाले भाग मे कमर के पास  पोता (नये कपड़ों का टुकड़ा – जिसे हल्दी पानी से भिगाया जात) मारकर अपने आँचल से पोछती है जो कि माता के द्वारा दिया गया रक्षा कवच का प्रतीक है

पूजन के बाद व्रत करने वाली माताएँ जब प्रसाद-भोजन के लिए बैठती है। तो उनके भोज्य पदार्थ मे पसहर चावल का भात, छः प्रकार के भाजी की सब्जी(मुनगा, कद्दु ,सेमी, तोरई, करेला,मिर्च) भैस के दुध, दही व घी , सेन्धा नमक, महुआ पेड़ के पत्ते का दोना – पत्तल व लकड़ी को चम्मच के रूप मे उपयोग किया जाता है। बच्चों को प्रसाद के रूप मे धान की लाई, भुना हुआ महुआ तथा चना, गेहूँ, अरहर आदि छः प्रकार के अन्नो को मिलाकर बाँटा जाता है।

इस व्रत-पूजन मे छः की संख्या का अधिक महत्व है। जैसे- भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष का छठवाँ दिन,
छः प्रकार का भाजी , 
छः प्रकार के खिलौना,
छः प्रकार के अन्न वाला प्रसाद तथा
छः कहानी की कथा । 

5 विचार “हल षष्ठी की व्रत कथा (ललही छठ) 13.8.17)&rdquo पर;

      1. मैं आपकी बात से सहमत हूँ किन्तु विडम्बना यह भी है खामोशियो को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है तो इसलिए शब्दों का प्रयोग करना आवश्यक हो गया है।

        पसंद करें

टिप्पणियाँ बंद कर दी गयी है।