गणेश चौथ और गणेश वंदना (10.8.17)

आज गणेश चतुर्थी  का मेरा निर्जला उपवास है। ये उपवास कुवांरी लड़कियाँ भाई के लिए वहुला व़त और विवाहित अपने पुत्र के लिए रहती हैं। 

एक बुढ़िया थी। वह बहुत ही ग़रीब और अंधी थीं। उसके एक बेटा और बहू थे। वह बुढ़िया सदैव गणेश जी की पूजा किया करती थी। एक दिन गणेश जी प्रकट होकर उस बुढ़िया से बोले-
 ‘बुढ़िया मां! तू जो चाहे सो मांग ले।’
बुढ़िया बोली- ‘मुझसे तो मांगना नहीं आता। कैसे और क्या मांगू?’ 
तब गणेशजी बोले – ‘अपने बहू-बेटे से पूछकर मांग ले।’ 

तब बुढ़िया ने अपने बेटे से कहा- ‘गणेशजी कहते हैं ‘तू कुछ मांग ले’ बता मैं क्या मांगू?’ 
पुत्र ने कहा- ‘मां! तू धन मांग ले।’ 
बहू से पूछा तो बहू ने कहा- ‘नाती मांग ले।’ 
तब बुढ़िया ने सोचा कि ये तो अपने-अपने मतलब की बात कह रहे हैं। अत: उस बुढ़िया ने पड़ोसिनों से पूछा, तो उन्होंने कहा- ‘बुढ़िया! तू तो थोड़े दिन जीएगी, क्यों तू धन मांगे और क्यों नाती मांगे। तू तो अपनी आंखों की रोशनी मांग ले, जिससे तेरी ज़िन्दगी आराम से कट जाए।’

इस पर बुढ़िया बोली- ‘यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आंखों की रोशनी दें, नाती दें, पोता, दें और सब परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें।’ 

तुने तो हमें ठग दिया। फिर भी जो तूने मांगा है वचन के अनुसार सब तुझे मिलेगा।’ और यह कहकर गणेशजी अंतर्धान हो गए। उधर बुढ़िया माँ ने जो कुछ मांगा वह सबकुछ मिल गया। हे गणेशजी महाराज! जैसे तुमने उस बुढ़िया माँ को सबकुछ दिया, वैसे ही सबको देना।

गणेश चतुर्थी

अन्य नाम

गणेश चौथ, डण्डा चौथ

अनुयायी

हिंदू

उद्देश्य

गणेश जी के पूजन और उनके नाम का व्रत रखने का विशिष्ट दिन है।

तिथि

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी

धार्मिक मान्यता

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेश जी का जन्म हुआ था।

अन्य जानकारी

गणेश जी का यह पूजन करने से विद्या, बुद्धि की तथा ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति तो होती ही है, साथ ही विघ्न-बाधाओं का भी समूल नाश हो जाता है।

गणेश चतुर्थीहिन्दुओं का त्योहार है, जो भाद्रपदशुक्लचतुर्थी के दिन मनाया जाता है। वैसे तो प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थीगणेश के पूजन और उनके नाम का व्रत रखने का विशिष्ट दिन है। श्री गणेश विघ्न विनायक हैं। ये देव समाज में सर्वोपरि स्थान रखते हैं। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न के समय गणेश जी का जन्म हुआ था। भगवान गणेश बुद्धि के देवता हैं। गणेश जी का वाहन चूहा है। ऋद्धि व सिद्धि गणेश जी की दो पत्नियां हैं। इनका सर्वप्रिय भोग लड्डू हैं। प्राचीन काल में बालकों का विद्या-अध्ययन आज के दिन से ही प्रारम्भ होता था। आज बालक छोटे-छोटे डण्डों को बजाकर खेलते हैं। यही कारण है कि लोकभाषा में इसे डण्डा चौथ भी कहा जाता है।

कैसे मनाएँ

  • इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर सोनेतांबेमिट्टी अथवा गोबर की गणेश जी की प्रतिमा बनाई जाती है। गणेश जी की इस प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर, मुंह पर कोरा कपड़ा बांधकर उस पर स्थापित किया जाता है। फिर मूर्ति पर (गणेश जी की) सिन्दूर चढ़ाकर षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए।

  • गणेश जी को दक्षिणा अर्पित करके 21 लड्डूओं का भोग लगाने का विधान है। इनमें से 5 लड्डू गणेश जी की प्रतिमा के पास रखकर शेष ब्राह्मणों में बांट देने चाहिए। गणेश जी की आरती और पूजा किसी कार्य को प्रारम्भ करने से पहले की जाती है और प्रार्थना करते हैं कि कार्य निर्विघ्न पूरा हो।

  • गणेश जी का पूजन सायंकाल के समय करना चाहिए। पूजनोपरांत दृष्टि नीची रखते हुए चंद्रमा को अर्घ्य देकर, ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा भी देनी चाहिए।

  • इस प्रकार चंद्रमा को अर्घ्य देने का तात्पर्य है कि जहां तक संभव हो आज के दिन चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिए। क्योंकि इस दिन चंद्रमा के दर्शन करने से कलंक का भागी बनना पड़ता है। फिर वस्त्र से ढका हुआ कलश, दक्षिणा तथा गणेश जी की प्रतिमा आचार्य को समर्पित करके गणेश जी के विसर्जन का विधान उत्तम माना गया है।

  • गणेश जी का यह पूजन करने से विद्या, बुद्धि की तथा ऋद्धि-सिद्धि की प्राप्ति तो होती ही है, साथ ही विघ्न-बाधाओं का भी समूल नाश हो जाता है।

गणेश चतुर्थी की कथा

गणेश जी का पूजन सायंकाल के समय करना चाहिए। पूजनोपरांत दृष्टि नीची रखते हुए चंद्रमा को अर्ध्य देकर, ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा भी देनी चाहिए। 

एक बार भगवान शंकर स्नान करने के लिए कैलाश पर्वत से भोगावती नामक स्थान पर गए। उनके जाने के बाद पार्वती ने स्नान करते समय अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसे सतीव कर दिया। उसका नाम उन्होंने गणेश रखा। पार्वती जी ने गणेश जी से कहा- ‘हे पुत्र! तुम एक मुद्गर लेकर द्वार पर जाकर पहरा दो। मैं भीतर स्नान कर रही हूं। इसलिए यह ध्यान रखना कि जब तक मैं स्नान न कर लूं,तब तक तुम किसी को भीतर मत आने देना। उधर थोड़ी देर बाद भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिव जी वापस आए और घर के अंदर प्रवेश करना चाहा तो गणेश जी ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। 

यहाँक्रोधित होकर उसका सिर, धड़ से अलग करके अंदर चले गए। टेढ़ी भृकुटि वाले शिवजी जब अंदर पहुंचे तो पार्वती जी ने उन्हें नाराज़ देखकर समझा कि भोजन में विलम्ब के कारण महादेव नाराज़ हैं। इसलिए उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया और भोजन करने का निवेदन किया। तब दूसरी थाली देखकर शिवजी ने पार्वती से पूछा-‘यह दूसरी थाली किस के लिए लगाई है?’ इस पर पार्वती जी बोली-‘ अपने पुत्र गणेश के लिए, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है।’  

यह सुनकर शिवजी को आश्चर्य हुआ और बोले- ‘तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? किंतु मैंने तो अपने को रोके जाने पर उसका सिर धड़ से अलग कर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी।’ यह सुनकर पार्वतीजी बहुत दुखी हुईं और विलाप करने लगीं। उन्होंने शिवजी से पुत्र को पुनर्जीवन देने को कहा। तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर उस बालक के धड़ से जोड़ दिया। पुत्र गणेश को पुन: जीवित पाकर पार्वती जी बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने पति और पुत्र को भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन किया। यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को घटित हुई थी। इसलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है।गणेशजी की कथा :- 

एक बार ऋद्धि-सिद्धि पृथ्वी लोक का भ्रमण करती हुई भारतवर्ष के पाटलीपुत्र नामक नगर में पहुँची। वहां का वैभव देखकर उनकी आँखे खुली की खुली रह गई। वहां की समृद्धि का कारण जानने पर ज्ञात हुआ कि उस नगर के प्रत्येक घर  में गणेशजी की पूजा पूर्ण श्रद्धा के साथ की जाती है। भ्रमण के मध्य उनको एक अत्यंत जीर्ण शीर्ण घर दिखाई दिया। वह घर एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण का था। वे दोनों भिखारिनों का रूप धार कर पहुँची। उन दोनों को देखते से ही ब्राह्मण बोला, ” मैं गणेशजी का अनन्य भक्त हूँ, मैं आपके चेहरे के तेज और आभा को देखकर  पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूँ  कि आप दोनों भिखारिन नहीं हैं  वैसे भी इस नगर में मुझसे दरिद्र और कोई नहीं है। सच बताइए कि तुम दोनों कौन हो ? ” वे बोली, ” हे विप्रवर , पहले आप ये बताइए   कि गणेशजी के अनन्य भक्त होने के उपरान्त भी आपकी यह दशा क्यों है?” 

ब्राह्मण बोला, ” हे देवियों, मैं सोचता हूँ कि मेरी आस्था में ही कोई कमी है। मेरी दरिद्रता तो उनके प्रताप और आशीर्वाद से ही दूर हो सकती है। जिस दिन उनकी अनुकम्पा हो जाएगी उस दिन मैं भी समृद्ध हो जाऊंगा। अभी तो मैं उनकी कृपा  से संतुष्ट हूँ। वैसे मेरे पास इस समय देने को कुछ है नहीं।  तुम लोग कुछ देर पहले आती तो मैं अपने पास जो  था वउसमे से दे सकता था पर अब कुछ नही है। तुम दोनों को आशीर्वाद देना भी तुम लोगों का अपमान होगा क्योंकि तुम लोगों के  चेहरे इस बात को बता रहें हैं मैं तुमसे उच्च नहीं हूँ। अब रात्रि बहुत हो गई है अब मुझे  सोने दीजिए।  ” यह कह कर उसने दोनों को विदा कर दिया। वे दोनों अपनी यात्रा मध्य में ही छोड़कर गणेशजी के पास पहुंची और सब बात बताते हुए गणेशजी से ब्राह्मण की दरिद्रता दूर करने की अनुनय की। गणेशजी ने ब्राह्मण  को रातो रात समृद्ध बना दिया। सुबह ब्राह्मण समझ गया की यह सब गणेशजी की कृपा का ही फल है। उसको अब पका विश्वास हो गया कि वे भिक्षुणियाँ और कोई नहीं ऋद्धि-सिद्धि ही थीं।

हे गणेशजी महाराज जैसे उस ब्राह्मण की दरिद्रता को दूर कर समृद्ध किया वैसे ही अपने अनन्य भक्तों को समृद्ध बनाना। 

 अनुकरणीय सन्देश :-

  • संतोष और धैर्य का फल मीठा होता है। 

  • भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। 

  • किसी भी व्यक्ति को पूरा महत्व देना चाहिए चाहे वह कितना ही दरिद्र क्यों न हो। 

से मेरी हकीकत जुडने वाली है जिसको लिखने के लिए सूझबूझ के साथ कभी न रुकने वाली लेखनी चाहिए जैसे भागवत लिखते समय गणेश जी की लेखनी नहीं रुकीथी। 

मेरे लिखने में कोई विघ्न न आये इस लिए मैं वंदनागीत के माध्यम से करूगीं। क्योंकि जहां तक मैं जानती हूँ गणेश जी सब विघ्नों को हरने वाले हैं। और किसी भी कार्य का शुभ आरम्भ गणेश जी की वंदना से कीजाती है। 

                   पेश है दो गीत 

1.  सब देवों ने फूल बरसाये महाराज गजानन आये-2

देवा कौन है तेरी माता-2 और कौन है गोद खेलाए, महाराज गजानन आये। देवा पार्वती मेरी माता शंकर ने गोद खेलाए। महाराज गजानन आये।

देवा क्या है तेरी पूजा -2काहे का भोग लगाएं महाराज गजानन आए। 
देवा धूप दीप मेरी पूजा-2मोदक भोग लगाएं। महाराज गजानन आए। 

2.           गीत

देखो ब्रह्मा और विष्णु महेश निकले संकट काटन को श्री गणेश  निकले – 2। 

देखो राम की महिमा न्यारी है उनके साथ में जनक दुलारी हैं। 

उनके बाणों से रावण के प्राण निकले संकट काटन को श्री गणेश निकले। 

देखो ब्रह्मा की महिमा न्यारी है उनके साथ में सरस्वती माता है। उनके वाणी से वेदो का सार निकले। संकट काटन को श्री गणेश निकले। 

देखो शिवजी की महिमा न्यारी है। उनके साथ में गौरी भवानी हैं। उनकी जटा से गंगा की धार निकले। संकट काटन को श्री गणेश निकले।

देखो कृष्ण की लीला न्यारी है। उनके संग में राधा रानी है। उनके मुख से गीता का ज्ञान निकले। संकट काटन को श्री गणेश निकले।

देखो ब़ह्ममाऔर विष्णु महेश निकले संकट काटन को श्री गणेश निकले। 

देखो हनुमान की महिमा न्यारी है। उनके संग में अंजना माई है। उनके हृदय में सिया राम निकले। संकट काटन को श्री गणेश निकले

देखो तुलसी की महिमा न्यारी है उनके सामने भोजन की थाली है। उनके सामने शालिग्राम निकले। 

संकट काटन को श्री गणेश निकले। देखो ब़ह्ममाऔर विष्णु महेश निकले संकट काटन को श्री गणेश निकले। 

ये गीत लोक प्रचलित है कौन लिखा किसने बनाया और सबसे पहले किसने गाया कुछ अता पता नहीं है। एक बात बताना भूल गयी थी। जिसके पास टेप और कैसेट नहीं थे तो लिख कर ही गानों का कलेक्शन करना पड़ता था तो चुकी मुझे गीत गाने और कलेक्शन करने दोनो के शौक हैं इसलिए लिखकर डायरी मेंटेन करती हूँ। और एक बात बताऊँ मुझे तस्वीर का कलेक्शन करना अच्छा लगता है। मेरे पास 92साल पुरानी तस्वीर है जो मेरे बाबा दादी जी की है जो देखकर लगता है कि मेरे पूर्वज भी मेरी तरह शौकीन थे। वे तस्वीर ब्लैक एंड व्हाइट है जिसे मैं कहानी जहाँ सूट करेगा जरूर लगाउंगी अपने ब्लॉग के पोस्ट पर। 

नोट-जो माताएं, भाईऔर बहनें गाने के शौकीन हैं ओ लिख और गा सकते हैं मुझे कोई आपत्ति नहीं है। मुझे खुद के बनाये गानों पर भी कोई आपत्ति नहीं है तो ये तो लोक में प्रचलित गीत है। हां अगर कोई सी. डी बना कोई गायक गाता है तो  खुद के बनाए गानोंपर लिखने वाले लेखक यानी मेरा नाम होना चाहिए। 

दूसरे का नाम होने पर मुझे आपत्ति सदैव रहेगी। 

 इसी के साथ आपकी अपनी रजनी अजीत सिंह 

आगे कहानी भाग-3 पढें और बताएं मेरा कलेक्शन कैसा लगा? 

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