जिंदगी में एक भाई ऐसा भी जिसमें दोस्त और बेटे का झलक भी पाया हमने। 

एक कहानी ऐसे भाई की है जिसको मैंने महसूस किया। जो मेरे जिंदगी में बेटे, भाई, दोस्त का दर्जा उसे कब दे दिया मुझे खुद भी एहसास नहीं हुआ। इसी घटना को मैं कहानी का रूप दे संदेश देना चाहती हूँ कि आप किसी भी रिश्ते को मान भी सकते हो और रिस्ता सच्चा है तो मन से मनवा भी सकते हो। मेरा विचार है कि यदि आप सही हो तो अगले को भी इस सही रिश्ते का एहसास हो ही जाता है।

“भाई “21. जनवरी

अनोखा, अनजाना , बेगाना।

फिर भी अपना सा लगता “भाई”।

कभी भाई कभी बेटा कभी दोस्त की

झलक पायी है, रिस्ता तो कुछ भी नहीं।

फिर भी अपना सा लगता” भाई “।

मैंने कुछ कहा ही नहीं पर उसने मेरे मन के भावों को खूबसूरती से समझ लिया।

पता तो नहीं, मुझे कि किस जन्मों का पुण्य है मुझे तो इतना पता है,

जिसमें अपना भाई, बेटा, और दोस्त दिखा हमारा ये रिश्ता सदियों पुराना है।

उसने मेरी कविताओं को कुछ ऐसा पढ़ा और समझा कि एक दूसरे के सुख – दुःख शेयर हो गया और खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा।

अब तो मिलने की तमन्ना है बातों से भाई-बहन के अटूट रिश्तों में बंधना है।

कोई पास होकर भी अपना भाई नहीं और कोई दूर होकर भी अपना सा लगता “भाई”।

कोशिश रहेगी मरते दम तक इस अनोखे रिश्ते को निभाने की

पर उसका अपनापन या उसे जानने की मेरी भावुकता ही मजबूत डोर बनी रिस्ता निभाने में।

अब लगता है कृष्ण जैसे भाई का रिश्ता अपना।
बहुत कुछ सीखा, जाना, अब दूर तो है हमसे।

फिर भी अपना सा लगता “भाई”।

2.

दूसरी कविता जो मैंने उसके जन्म दिन पर लिखा।

जिंदगी ये कैसी मजबूरी?

न तुम भूले न हम भूले आओ दोनों मिलकर दुनिया में कुछ कर जायें।

पहचान तुम भी रहे होगे पहचान हम भी रहे।

पर पहचान को स्वीकार करने के बाद इस अटूट रिश्ते को निभाने की हिम्मत आ जाती है।

ये जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी है।

21जनवरी को तुम आये इस दुनिया में।

वर्डप्रेस जैसे पब्लिक प्लेस पर माँ ने तुमसा खूशबू से भरा एक और फूल आंचल में डाल दिया।

इस पर कुछ शब्द भी न कह सकूँ।

ये जिंदगी की कैसी मजबूरी।

तुम तो सब गुणों से भरे हुए कुछ रास्ता दिखाओ तुम्ही।

तुम अब राह न दिखा पावों दोस्त को दोस्ती में।

ये जिंदगी में दोनों पक्षों की कैसी मजबूरी?

एक भाई को बहन की कसम।

अब बहन के कसम भी न निभाओ तुम।

ये जिंदगी की कैसी मजबूरी?

एक माँ की तमन्ना है तेरे आये हुए दिन को कुछ आशीष दूं।

दो शब्द के द्वारा आशीष भी न दे सकूं।

जिंदगी में मुझे मेरी कैसी मजबूरी?

मजबूरी मजबूरी कैसी कैसी मजबूरी।

ये जिंदगी की कैसी मजबूरी?

मदर डे पर दुनिया को समझाने वाले लोग भरे पड़े।

उसके बाद भी माँ की पीड़ा न समझों।

ये बेटे की जिन्दगी में कैसी मजबूरी।

इस माँ के मन को कुछ आशा दिलावो ना।

अब आशा भी न दिला पाओ तुम।

ये जिंदगी में जिंदगी की कैसी मजबूरी।

अब माँ को, बहन को , इस दोस्त को।

माना की ये खून का रिश्ता नहीं माना रिश्ता है अपना।

इस रिश्ते को मान दे मान भी न निभावो तुम।

बेटे, भाई, दोस्त की।

ये जिंदगी में कैसी मजबूरी।

अपना पहचान देने के लिए गवाही कुछ न दे सकती।

कुछ अच्छा विचार तुम्हारे हैं जिसे याद दिलाती हूँ मैं।

इसे देख याद न आये तो फिर समझूं जो मेरी माँ है जिसने तुझ से रिश्ते बनाये।

उस माँ की जहां में मैं और मेरे भाई पर जिंदगी में कितनी बड़ी कृपा है।

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जन्म दिन की ढेर सारी बधाइयाँ।

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आज का दिन मुबारक हो।

आज का सुबहोशाम और रात मुबारक हो।

मिले जीवन में तुम्हें जो खुशी वो हर चीज मुबारक हो।

मिले हर तरफ कामयाबी ओ कामयाबी मुबारक हो।

“आशुतोष” तुम औढ़र दानी त्रिभुवन महिमा विदित बखानी।

सो तुम जानों प्रभु जी अंतर्यामी पुरवहूं मोर मनोरथ स्वामी।

कवन सो काज कठिन जग माहिं जो नहीं होई तात तुम पाहिं।

रजनी सिंह

हां तो अपने पवन भाई का लिखा कविता शेयर करती हूं जो मुझे प्यार से दी कहते और अपने को भाई कहलाना पंसद करते हैं।

Pkcd 1989के ब्लॉग से लिया है। जिसका नाम” सोमवार “है

हे ईश्वर आप तो सर्वज्ञाता हैं कृपया कुछ किजिये कुछ ऐसा की कोई चमत्कार हो जाये—-

उस सोमवार जैसा शीघ्र ही फिर इक सोमवार आए,

जब मैं अपनी राधा से मिलू और इस बार मेरी राधा अपने श्याम संग घर आये।

दूसरी कविता उनकी ये आँखें

आज भी सुबह और शाम को पुजा के समय उनके लिए प्रार्थना होती हैं,

आज भी ना जाने क्यूँ उनके लिए ये पागल आँखे रोती हैं।

वो कहते हैं कि चैंन से ये सोती हैं, उन्हें क्या पता कि

हर रात को जब तक उनकी यादें सीने पर सर ना रखें ये नहीं सोती हैं।

17 विचार “जिंदगी में एक भाई ऐसा भी जिसमें दोस्त और बेटे का झलक भी पाया हमने। &rdquo पर;

  1. दी आपको इसे एडिट करने की आवश्यकता नहीं थी। शायद आपने ध्यान नहीं दिया हमें दुख आपके लेख में जो दर्द हैं उसे पढ़कर दुख हुआ।

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    1. मुझे लगा मुझे कुछ शब्दों के अर्थ को चेंज करना चाहिए इसलिए किया। और जब मुझे जब माँ ने अच्छा रिस्ता दे दिया तो दुःख भरी यादें रखना मेरे मन को अच्छा नहीं लगा। और इसकी मूल प्रति भी पीछे के पोस्ट में सुरक्षित है।
      आप को बदला रुप कैसा लगा?

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  2. शीघ्र ही में अपनी भावनाओं को शब्दों का रूप देकर व्यक्त करने का प्रयास करूंगा। इक बार पुनः धन्यवाद दी। इक और बात कहना चाहता हूँ दी अपने बारे में शीघ्र ही बताऊंगा परंतु आप जो चाहें बह पूछ सकते हैं अपने भाई से ताकी वो पराया सा ना लगे आपको।

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  3. सत्य कहूँ तो दी आपकी इस पोस्ट को पढ़कर मैं ना मात्र भावुक सा हो गया हूँ बल्कि सच में मुझे शब्द नहीं मिल रहे हैं कि मैं इस समय जो अनुभव कर रहा हूँ कैसे व्यक्त करूँ। धन्यवाद दी मुझे अपने भाई के समतुल्य रखने के लिए। धन्यवाद दी मुझे अपने लेखनी में स्थान देने के लिए। धन्यवाद दी मेरे लिए इतने सुंदर विचार रखने के लिए।

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    1. पवन जी ये कविता मैंने बहुत पहले लिखा था और किसी और के लिए लिखा था परंतु इसमें कोई शक नहीं कि जिसके लिए लिखी वह भाई न बन सका वल्कि भाई रुप में उस खाली जगह को आपसे ही भरने की उम्मीद है। ऊपर भाई शिर्षक के ऊपर तारीख लिखा होगा कब का लिखा है हमने।

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      1. मुझे क्षमा किजियेगा दी ना जाने क्यूँ लगा कि ये मेरे बारे में हैं कोई बात नहीं दी मैं इसी में खुशी हूँ जो मेरी दी ने मेरी रचनाओ को अपनी लेखनी में स्थान दिया। इक सत्य कहूँ दी आपके इस रचना को पढ़कर पहले बहुत खुशी हुई कि आपने इतना कुछ लिखा मेरे बारे मैं परंतु आपके कमेंट को पढ़कर उतना ही दुख का अनुभव हो रहा है क्योंकि अगर मैं सही हूँ तो कोई ऐसा था जिसे आप अपने भाई की तरह मान देते थे जिन्होंने कुछ ऐसा किया जिससे आपको दुःख लगा हो। कुछ ऐसा ही पीड़ा का अनुभव हो रहा है आपकी रचना में। मुझे नहीं पता दी की मैं उस रिक्त स्थान को भर पाऊंगा या नहीं। मैं उस योग्य हूँ या नहीं। मैं मात्र इतना प्रयास करूंगा कि मैं अपनी दी के आशाओ पर खरा उतर सकूँ। मैं कामना करूँगा की ईश्वर मुझमें इतना सामर्थ्य दे की आपके खुशी की वजह बन सकूँ।

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        1. जानते भाई जब आप का कमेंट पढी तो मुझे दुःख हुआ कि अनजाने में दुःख पहुंचा दिया तो मैं रचना का डेट देखी तो 22 जनवरी था और आपका 21जनवरी को जन्म दिन था और मैं डायरी पर 21जनवरी को लिखी थी इसलिए आप को मेरा भाई बनाना था सो आप पर ही सेट करवा दिया माँ ने। अब मैं एडिट कर आपके ऊपर सेट कर देती हूँ ताकि आपकी खुशी दे सकूं।

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    2. और हाँ ये धन्यवाद करने की आवश्यकता नहीं ये तो वर्डप्रेस पर लाइक कमेंट करने और पाने की फारमेल्टी है जिसको निभाना जरूरी भी और मजबूरी दोनों ही है।

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    1. बस फुर्सत के पल मिल गया तो पुरानी डायरी से कुछ शेयर कर गुजरने वाले पल की यादें ताजा कर लिया है। धन्यवाद आपका प्रोत्साहन देने के लिए।

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