नागपंचमी के दिन उज्जैन का नाग चंद्रेश्वर मंदिर का महत्व (28.7.17)

उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर : क्यों खुलता है सिर्फ साल में एक दिन

   

हिंदू धर्म में सदियों से नागों की पूजा करने की परंपरा रही है। हिंदू परंपरा में नागों को भगवान का आभूषण भी माना गया है। भारत में नागों के अनेक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक मंदिर है उज्जैन स्थित नागचंद्रेश्वर का,जो की उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर की तीसरी मंजिल पर स्थित है। 

इसकी खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि  नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं।
नागचंद्रेश्वर मंदिर में  11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है।
पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।

 

सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी। तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया। 
लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है। इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है। 

यह मंदिर राजा भोज के द्वारा निर्मित है जिनके हम वंशज हैं। माँ कहानी में बताया करती थी। नाग पंचमी से मेरी बचपन की घटना और कहानी याद आ गयी। हमारे गांव में एक निर्भय बाबा सुभे दायी का मंदिर है। जहाँ नागपंचमी के दिन पूरा गाँव पूजा करता है। ऐसा माना जाता है कि निर्भय बाबा सुभे दाई की मृत्यु नाग नागिन के काटने से हुआ है परन्तु मृत्यु के समय नाग नागिन से इन लोगों को आशिर्वाद प्राप्त हुआ था। और मृत्यु उपरांत मंदिर का निर्माण किया गया है। जहाँ केवल नाग नागिन का ही स्वरुप है। यदि सांप या विछी दिखाई देता है तो बस इतना कहा जाता है “हे निर्भय बाबा सुभे दाई घर का हो तो भाग जाय वन का हो तो बंधा जाय” कह देने मात्र से वाकई में सांप या विछी या तो भाग जाते हैं या बंधा के अंधे हो के खड़े हो जाते हैं। ये कोई कहानी नहीं है।  मेरी माँ ने ये वाक्य बचपन में मंत्र स्वरूप याद कराया था जिससे हमें जहाँ भी सांप या विछी दिखता था तो हम लोगों ने प्रत्यक्ष अनुभव किया है ऐसा कहकर। 

ये मंदिर बलिया जिला और  यूपी और विहार के बावडर राजा भोज द्वारा बसाया गया भोजपुर जिला के निकट गांव शिवपुर दीयर में  आज भी स्थित है। 

ये कहानी हमारे गाँव अर्थात “रजनी सिंह” के गांव की है जो मेरा जन्म भूमि है। 

तो अब नागचंद्रेश्वर की आगे की कहानी पढें। 
यह मंदिर काफी प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए। लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं।

 

नागपंचमी पर वर्ष में एक बार होने वाले भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए शनिवार रात 12 बजे मंदिर के पट खुलेंगे। रविवार नागपंचमी को रात 12 बजे मंदिर में फिर आरती होगी व मंदिर के पट पुनः बंद कर दिए जाएंगे। 
नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है। 

 

नागपंचमी पर्व पर बाबा महाकाल और भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की गई है। इनकी कतारें भी अलग होंगी। रात में भगवान नागचंद्रेश्वर मंदिर के पट खुलते ही श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी होगी।

 

नागपंचमी को दोपहर 12 बजे कलेक्टर पूजन करेंगे। यह सरकारी पूजा होगी। यह परंपरा रियासतकाल से चली आ रही है। रात 8 बजे श्री महाकालेश्वर प्रबंध समिति द्वारा पूजन होगा। 

               🐍     रजनी सिंह 🐍

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