महीना: जून 2017

Power of positivethought

आज मैंने कहीं से पढा बस ज्ञान के उद्देश्य से वर्डप्रेस ब्लॉग पर डाला है किसका लिखा मुझे नहीं पता। लेकिन इस कहानी से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। □

*आज इस पोस्ट को पढ़कर सारी ज़िन्दगी की टेंशन खत्म हो जायेगी*।
*बस धैर्य ओर शांति से पढ़े*।
*POWER OF POSITIVE THOUGHT*
*एक व्यक्ति काफी दिनों से चिंतित चल रहा था जिसके कारण वह काफी चिड़चिड़ा तथा तनाव में रहने लगा था। वह इस बात से परेशान था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है, किसी ना किसी रिश्तेदार का उसके यहाँ आना जाना लगा ही रहता है, 
*इन्ही बातों को सोच सोच कर वह काफी परेशान रहता था तथा बच्चों को अक्सर डांट देता था तथा अपनी पत्नी से भी ज्यादातर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा चलता रहता था*।
*एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और बोला पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करा दीजिये, वह व्यक्ति पहले से ही तनाव में था तो उसने बेटे को डांट कर भगा दिया लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका गुस्सा शांत हुआ तो वह बेटे के पास गया तो देखा कि बेटा सोया हुआ है और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी है। उसने कॉपी लेकर देखी और जैसे ही उसने कॉपी नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के टाइटल पर पड़ी*।
*होमवर्क का टाइटल था* *********************
 *वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगतीं लेकिन बाद में वे अच्छी ही होती हैं*।
*इस टाइटल पर बच्चे को एक पैराग्राफ लिखना था जो उसने लिख लिया था। उत्सुकतावश उसने बच्चे का लिखा पढना शुरू किया बच्चे ने लिखा था* •••
● *मैं अपने फाइनल एग्जाम को बहुंत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये बिलकुल अच्छे नहीं लगते लेकिन इनके बाद स्कूल की छुट्टियाँ पड़ जाती हैं*।
● *मैं ख़राब स्वाद वाली कड़वी दवाइयों को बहुत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये कड़वी लगती हैं लेकिन ये मुझे बीमारी से ठीक करती हैं*।
● *मैं सुबह – सुबह जगाने वाली उस अलार्म घड़ी को बहुत धन्यवाद् देता हूँ जो मुझे हर सुबह बताती है कि मैं जीवित हूँ*।
● *मैं ईश्वर को भी बहुत धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतने अच्छे पिता दिए क्योंकि उनकी डांट मुझे शुरू में तो बहुत बुरी लगती है लेकिन वो मेरे लिए खिलौने लाते हैं, मुझे घुमाने ले जाते हैं और मुझे अच्छी अच्छी चीजें खिलाते हैं और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मेरे पास पिता हैं क्योंकि मेरे दोस्त सोहन के तो पिता ही नहीं हैं*।
*बच्चे का होमवर्क पढने के बाद वह व्यक्ति जैसे अचानक नींद से जाग गया हो। उसकी सोच बदल सी गयी। बच्चे की लिखी बातें उसके दिमाग में बार बार घूम रही थी। खासकर वह last वाली लाइन। उसकी नींद उड़ गयी थी। फिर वह व्यक्ति थोडा शांत होकर बैठा और उसने अपनी परेशानियों के बारे में सोचना शुरू किया*।
●● *मुझे घर के सारे खर्चे उठाने पड़ते हैं, इसका मतलब है कि मेरे पास घर है और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से बेहतर स्थिति में हूँ जिनके पास घर नहीं है*।
●● *मुझे पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है, इसका मतलब है कि मेरा परिवार है, बीवी बच्चे हैं और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूँ जिनके पास परिवार नहीं हैं और वो दुनियाँ में बिल्कुल अकेले हैं*।
●● *मेरे यहाँ कोई ना कोई मित्र या रिश्तेदार आता जाता रहता है, इसका मतलब है कि मेरी एक सामाजिक हैसियत है और मेरे पास मेरे सुख दुःख में साथ देने वाले लोग हैं*।
*हे ! मेरे भगवान् ! तेरा बहुंत बहुंत शुक्रिया ••• मुझे माफ़ करना, मैं तेरी कृपा को पहचान नहीं पाया।*
_*इसके बाद उसकी सोच एकदम से बदल गयी, उसकी सारी परेशानी, सारी चिंता एक दम से जैसे ख़त्म हो गयी। वह एकदम से बदल सा गया। वह भागकर अपने बेटे के पास गया और सोते हुए बेटे को गोद में उठाकर उसके माथे को चूमने लगा और अपने बेटे को तथा ईश्वर को धन्यवाद देने लगा*।_
*हमारे सामने जो भी परेशानियाँ हैं, हम जब तक उनको नकारात्मक नज़रिये से देखते रहेंगे तब तक हम परेशानियों से घिरे रहेंगे लेकिन जैसे ही हम उन्हीं चीजों को, उन्ही परिस्तिथियों को सकारात्मक नज़रिये से देखेंगे, हमारी सोच एकदम से बदल जाएगी, हमारी सारी चिंताएं, सारी परेशानियाँ, सारे तनाव एक दम से ख़त्म हो जायेंगे और हमें मुश्किलों से निकलने के नए – नए रास्ते दिखाई देने लगेंगे।*

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*अगर आपको  बात अच्छी लगे तो उसका अनुकरण करके जिन्दगीको खुशहाल बनाइये*.
मैं बस इतना कहना चाहूंगी कहानी अच्छा लगे तो जीवन में अम्ल करना चाहिए । मुझे आपके लाइक कमेंट की चाहत नहीं चाहत है तो बस खूबसूरत खुशियों से भरी जिंदगी की। 


             सबकी खुशियों से भरी जिंदगी की आशा में 

                      रजनी सिंह 

फादर्स डे का महत्व18.6.17

वैसे आज के दिन फादर्स  डे मना  रहे हैं। वे उसके लिए है जो  दूर  है या किसी कारण से बात  नहीं हो पाती है तो इसीलिए इसी बहाने  याद कर लेते हैं  लोग। मेरा मानना है मदर्स डे, फादर्स  डे प्रत्येक दिन होना  चाहिये। मदर्स डे, फादर्स  डे इज इवरी डे। 

माँ – बाप के त्यागो  को हम  एक दिन मना, 

अपना  फर्ज अदा कर  सकते  नहीं । 

पूरा जीवन अर्पण कर  भी उनका कर्ज अदा कर  सकते  नहीं। 

 इसी  लिए कहती है रजनी 

हर  दिन माँ – बाप का गोद  और उनसे हमें प्यार मिले। 

हर  दिन माँ – बाप को सम्मान मिले   और  हर  दिन माँ – बाप का  दिन मने। 

               कविता 

जिसके पास माँ – बाप नहीं उसका दर्द।

जिसने   दुःख ही दुःख देखा वो सुख की कीमत क्या जाने। 

धूप में जलते पांव है जिसके वो छांव की कीमत क्या जाने। 

जिसके मां-बाप पास में हैं माँ-बाप दूर होने की कीमत क्या जाने। 

जिस सिर पर बाप का हाथ नहीं वो बाप के होने की कीमत क्या जाने। 

      साथ हैप्पी फादर्स  डे। 

       माँ  बाप की सेवा  में उपस्थित 

                      रजनी सिंह 

भाई   भाई का प्रेम। 

ये कहानी पढ़कर मुझे   अच्छा लगा था।  आज के इस दौर में  ऐसा भाई मिल जाय तो धरती पर ही परिवार में स्वर्ग लगने लगे।  और भाई  भाई कटुता समाप्त   हो जाय।

कलियुग  का  लक्ष्मण

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” भैया, परसों नये मकान पे हवन है। छुट्टी (इतवार) का दिन है। आप सभी को आना है, मैं गाड़ी भेज दूँगा।”  छोटे भाई लक्ष्मण ने बड़े भाई भरत से मोबाईल पर बात करते हुए कहा।

         ” क्या छोटे, किराये के किसी दूसरे मकान में शिफ्ट हो रहे हो ?”

      ” नहीं भैया, ये अपना मकान है, किराये का नहीं ।”

         ” अपना मकान”, भरपूर आश्चर्य के साथ भरत के मुँह से निकला।

        “छोटे तूने बताया भी नहीं कि तूने अपना मकान ले लिया है।”

      ” बस भैया “, कहते हुए लक्ष्मण ने फोन काट दिया।

         ” अपना मकान” ,  ” बस भैया ”  ये शब्द भरत के दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रहे थे।

           भरत और लक्ष्मण दो सगे भाई और उन दोनों में उम्र का अंतर था करीब  पन्द्रह साल। लक्ष्मण जब करीब सात साल का था तभी उनके माँ-बाप की एक दुर्घटना में मौत हो गयी। अब लक्ष्मण के पालन-पोषण की सारी जिम्मेदारी भरत पर थी। इस चक्कर में उसने जल्द ही शादी कर ली कि जिससे लक्ष्मण की देख-रेख ठीक से हो जाये।

                प्राईवेट कम्पनी में क्लर्क का काम करते भरत की तनख़्वाह का बड़ा हिस्सा दो कमरे के किराये के मकान और लक्ष्मण की पढ़ाई व रहन-सहन में खर्च हो जाता। इस चक्कर में शादी के कई साल बाद तक भी भरत ने बच्चे पैदा नहीं किये। जितना बड़ा परिवार उतना ज्यादा खर्चा। 

            पढ़ाई पूरी होते ही लक्ष्मण की नौकरी एक अच्छी कम्पनी में लग गयी और फिर जल्द शादी भी हो गयी। बड़े भाई के साथ रहने की जगह कम पड़ने के कारण उसने एक दूसरा किराये का मकान ले लिया। वैसे भी अब भरत के पास भी दो बच्चे थे, लड़की बड़ी और लड़का छोटा।

                मकान लेने की बात जब भरत ने अपनी बीबी को बताई तो उसकी आँखों में आँसू आ गये। वो बोली, ”  देवर जी के लिये हमने क्या नहीं किया। कभी अपने बच्चों को बढ़िया नहीं पहनाया। कभी घर में महँगी सब्जी या महँगे फल नहीं आये। दुःख इस बात का नहीं कि उन्होंने अपना मकान ले लिया, दुःख इस बात का है कि ये बात उन्होंने हम से छिपा के रखी।”

          इतवार की सुबह लक्ष्मण द्वारा भेजी गाड़ी, भरत के परिवार को लेकर एक सुन्दर से मकान के आगे खड़ी हो गयी। मकान को देखकर भरत के मन में एक हूक सी उठी। मकान बाहर से जितना सुन्दर था अन्दर उससे भी ज्यादा सुन्दर। हर तरह की सुख-सुविधा का पूरा इन्तजाम। उस मकान के दो एक जैसे हिस्से देखकर भरत ने मन ही मन कहा, ” देखो छोटे को अपने दोनों लड़कों की कितनी चिन्ता है। दोनों के लिये अभी से एक जैसे दो हिस्से  (portion) तैयार कराये हैं। पूरा मकान सवा-डेढ़ करोड़ रूपयों से कम नहीं होगा। और एक मैं हूँ, जिसके पास जवान बेटी की शादी के लिये लाख-दो लाख रूपयों का इन्तजाम भी नहीं है।”

           मकान देखते समय भरत की आँखों में आँसू थे जिन्हें  उन्होंने बड़ी मुश्किल से बाहर आने से रोका। 

          तभी पण्डित जी ने आवाज लगाई, ” हवन का समय हो रहा है, मकान के स्वामी हवन के लिये अग्नि-कुण्ड के सामने बैठें।”

               लक्ष्मण के दोस्तों ने कहा, ” पण्डित जी तुम्हें बुला रहे हैं।” 

          यह सुन लक्ष्मण बोले, ” इस मकान का स्वामी मैं अकेला नहीं, मेरे बड़े भाई भरत भी हैं। आज मैं जो भी हूँ सिर्फ और सिर्फ इनकी बदौलत। इस मकान के दो हिस्से हैं, एक उनका और एक मेरा।”

          हवन कुण्ड के सामने बैठते समय लक्ष्मण ने भरत के कान में फुसफुसाते हुए कहा, ” भैया, बिटिया की शादी की चिन्ता बिल्कुल न करना। उसकी शादी हम दोनों मिलकर करेंगे ।”

                 पूरे हवन के दौरान भरत अपनी आँखों से बहते पानी को पोंछ रहे थे, जबकि हवन की अग्नि में धुँए का नामोनिशान न था ।
भरत जैसे आज भी

मिल जाते हैं इन्सान

पर लक्ष्मण जैसे बिरले ही

मिलते  इस जहान में। 

आप को कहानी कैसी  लगी?  भाई  भाई के प्रेम की। क्या आप  ऐसा  भाई देखे  हैं  अपने आस पास यदि हाँ तो आप समझो स्वर्ग को देख  लिया है। क्योंकि इस धरती पर ही स्वर्ग और नरक दोनों है। 

                  रजनी सिंह 


 माँ का रूप अनेक शक्ति एक (16.6.17)

आज थोड़ा मन परेशान और थोड़ा सा विचलित भी है ऐसा लगता है जैसे कुछ छूट रहा हो या मुझसे जुड़ा हुआ कोई व्यक्ति या इंसान परेशानी में हो मुझे ऐसा फिल हो रहा है अर्थात अभास हो रहा है मातरानी जाने अनजाने मुझसे जुड़े हर प्राणी को सकुशल रखे। मैं माता रानी का एक गीत लिखती हूँ शायद मन धीर धरे या सुकून मिले। 

 

जबहि मंदिर वा के खुलेला केंवाड़ हो मंदिर वा में  देवी जी के होला जय-जयकार। – 2

जब मईया पहिरेली पीला चुनरिया हो-2

शीतला का रूप धरके करे जग कल्याण हो मंदिर वा में देवी जी के होला जयकार हो – 2

जब मईया पहिरेली लाली चुनरिया हो – 2

दुर्गा  का रूप धरके करे उपकार हो – 2

मंदिरवा में देवी जी के होला जय जयकार हो-2

जब मईया पहिरेली गुलाबी चुनरिया हो-2

लक्ष्मी के रूप धरके करे धन दानहो।मंदिरवा में देवी जी के होला जय जय कार हो।-2

जब मईया पहिरेली श्वेत चुनरिया हो। – 2

सरस्वती का रूप धरके करे विद्या दान हो-2

जब मईया पहिरेली काली चुनरिया हो। – 2

काली का रूप धरके करे दुष्ट संघार हो –  2

मंदिरवा में देवी जी के होला जय जयकार हो-2

क्षमा चाहूंगी ये काली माँ काला कपड़ा पहनती हैं पर किसी सेवक के भक्ति से प्रसन्न होकर लाल चुनरी धारण कर ली थी उपकार करने के लिए लेकिन लोगों को ये सौम्य रूप पसंद नहीं आया और काली चुनरी पहनने पर मजबूर कर दिया और माँ को दुष्टों का संघार करने पर विवश कर दिया इसलिए मूर्ति और चुनरी का हठ योग के द्वारा तहस नहस कर दिया। 

जैसी करनी वैसी भरनी। 

अपनी नईया पार उतरनी। 

ये गीत मेरे माँ द्वारा गाया गया है इसलिए भोजपुरी शब्दों का टोन लिए हुए है। 

           कुछ भोजपुरी शब्दों का अर्थ 

इसमें धरेली  शब्द का अर्थ है रूप बदलना। 

पहिरेली का अर्थ है वस्त्र बदलना यानी पहनना। 

खुलेला का अर्थ ओपन होना। 

किवाड़ का अर्थ  दरवाजा फाटक से है। 

होला का अर्थ जयकार लगाना होता है। 

पाठकों से उम्मीद करती हूं कि शब्दों के अर्थ से इस गीत को समझ पायेंगे। 

        ये गीत कैसा लगा? अवश्य बताऐं। 

                रजनी सिंह 


मैं,  मैं हूँ। (15.6.17)

::स्त्री का शपथपत्र::

मैं मैं हूँ । मैं ही रहूँगी।
मै नहीं राधा बनूंगी,

मेरी प्रेम कहानी में,

किसी और का पति हो,

रुक्मिनी की आँख की

किरकिरी मैं क्यों बनूंगी

मै नहीं राधा बनूँगी।
मै सीता नहीं बनूँगी,

मै अपनी पवित्रता का,

प्रमाणपत्र नहीं दूँगी

आग पे नहीं चलूंगी

वो क्या मुझे छोड़ देगा

मै ही उसे छोड़ दूँगी,

मै सीता नहीं बनूँगी।
मै न मीरा ही बनूंगी,

किसी मूरत के मोह मे,

घर संसार त्याग कर,

साधुओं के संग फिरूं

एक तारा हाथ लेकर,

छोड़ ज़िम्मेदारियाँ

मैं नहीं मीरा बनूंगी।
यशोधरा मैं नहीं बनूंगी

छोड़कर जो चला गया

कर्तव्य सारे त्यागकर

ख़ुद भगवान बन गया,

ज्ञान कितना ही पा गया,

ऐसे पति के लिये

मै पतिव्रता नहीं बनूंगी

यशोधरा मैं नहीं बनूंगी।
उर्मिला भी नहीं बनूँगी

पत्नी के साथ का

जिसे न अहसास हो

पत्नी की पीड़ा का ज़रा भी

जिसे ना आभास हो

छोड़ वर्षों के लिये

भाई संग जो हो लिया

मैं उसे नहीं वरूंगी

उर्मिला मैं नहीं बनूँगी।
मैं गाँधारी नहीं बनूंगी

नेत्रहीन पति की आँखे बनूंगी

अपनी आँखे मूंदलू

अंधेरों को चूमलू

ऐसा अर्थहीन त्याग

मै नहीं करूंगी

मेरी आँखो से वो देखे

ऐसे प्रयत्न करती रहूँगी

मैं गाँधारी नहीं बनूँगी।
मै उसीके संग जियूंगी,

जिसको मन से वरूँगी,

पर उसकी ज़्यादती

मैं नहीं कभी संहूंगी

कर्तव्य सब निर्वाहुंगी

बलिदान के नाम पर

मैं यातना नहीं संहूँगी

मैं मैं हूँ। मै ही रहूंगी।

ये कविता पढ़कर मुझे एक नारी की अलग पहचान प्रतीत होता है जो काविले तारीफ है। आप पढ़कर बताना न भूलें कि कैसी लगी। कलयुग में भी एक नयी पहचान कायम कर सकती है नारी। बिना किसी के अनुसरण किये पतिब़ता बन मिशाल कायम कर सकती है नारी। और शायद पुराने ख्यालों को बदल अच्छे विचारों के साथ आ सकती है आज की नारी। आज की अच्छी और ऐसी विचारों वाली नारियों को मेरा तहे दिल से सलाम।

इस कविता को देखते हुए आज तुलसी दास की चौपाई झूठी प्रतीत होती है।

ढ़ोल गंवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी।

ये कविता कलयुग की रचना है। इसलिए द्ववापर, त्रेता, सत्युग से जोड़कर आलोचक न बने केवल भाव को समझने का प्रयास करें।

धन्यवाद।

रजनी सिंह

हौसला 13.6.17

जब टूटने लगे हौसले तो बस ये याद रखना।

बिना मेहनत के हांसिल तख्तो ताज  नहीं होते। 

मेहनत करने वाले कभी निराश नहीं होते। 

ढूंढ ही लेते हैं खुद अंधेरे में मंजिल अपनी। 

जुगनू  रौशनी के कभी मोहताज नहीं होते।

                    मेरा मानना है यदि जी जान लगाकर परिश्रम कर सफलता को अपना जूनून बना ले तो सफलता एक दिन कदम चूमती ही है। 

                   रजनी सिंह 

जिंदगी में खास  दिन, 12.6.17(12जून 1985)

🌻🌹जिंदगी के हसीन पल💐🌹

आज का दिन मुबारक हो।

आज की सुबह मुबारक हो।

आज की तारीख मुबारक हो।

आज की साल मुबारक हो।

आप आयीं हमारे आंगन में बहार आ गई।

आप को अपने परिवार में आज के दिन बहार मुबारक हो।

आज मेरी प्यारी बहन I. F. S. (इंडियन फॉरेस्ट सर्विस, भारतीय वन सेवा में चयनित) रूचि कर जन्म सन1983में मेरे बनारस आने के दो साल बाद और माँ पापा के जिंदगी में 10 साल के इन्तजार के बाद, मंदिर, मस्जिद ,गुरुद्वारा, चर्च में, यानी हर चौकठ पर सजदे करने के बाद हमारे परिवार में खुशियां और हमारे जिंदगी में बहार लेके आयी। शेष कहानी जिंदगी की कहानी जीवन में गीत, गानों, तस्वीरों, कविताओं के साथ कहानी अपने जमाने की भाग 10 में।

आज के दिन आपके साथ आपकी प्यारी दी

रजनी