देवीमाँ में विश्वास और माँ की ममता और बेटे की फरमाइश पूरा करने की कहानी 28.10. 2007

एक माँ थी जिसके दो बेटे हैं। वो माँ एक दिन अपने छोटे बेटे को दूध रोटी खिला रही थी तो ऐसे ही स्वभाव बस माँ ने बेटे से पूछा बेटा तुम किससे प्यार करते हो तो उसने जवाब में कहा मैं जाइलो से प्यार करता हूँ, फिर दोबारा पूछा तो बेटा बोला कार्पियो (स्कार्पियो) से प्यार करता है और तीसरी बार विशु बोला पापा गाड़ी से प्यार करता है चौथी बार बोला नाना गाड़ी से प्यार करता हूँ फिर कुछ देर बाद बोला नाना गाड़ी से नहीं पापा गाड़ी से प्यार करता हूँ। आप को बता दूँ इस बच्चे का उम्र मात्र दो साल 10 महीने का था। इस बच्चे का जन्म 20 अप्रैल 2007में हुआ था। इस छोटी सी उम्र में गाड़ी से इतना लगाव था  कि सड़क पर जाती गाड़ियों को कुछ को छोड़कर सभी गाड़ियों के नाम बता देता था। 

               फिर दोबारा माँ ने अपने बेटे से पूछा विशु क्या लेने जाएगा? तो बेटा बोला विशु साइकिल लेने जाएगा। 

        उसी दिन माँ बाहर जब बेटा खेलने गया था संयोग बस विशु को देखने बाहर गई तो विशु ( सामने के मकान में एक लड़की रहती थी जो फस्ट में पढ़ती थी जिसका नाम प्रियल था।) आयुषी के साइकिल के बराबर में खड़ा कर दीदी दीदी चिला रहा था तभी वो लड़की प्रियल अपनी साइकिल लेने आ गई। विशु के माँ ने उत्सुकता बस देखने के लिए कि बेटा विशु  दो पहिए वाली छोटी साइकिल चला पा रहा है कि नहीं उसकी माँ ने उस लड़की से  साइकिल मांगी। वे दे नहीं रही थी फिर भी उसकी माँ ने विशु को बैठाया तो विशु दो पहिया की छोटी साइकिल चला लिया। फिर उस लड़की ने अपनी साइकिल ले ली और विशु उदास मन से अपने तीन पहिया के स्कूटर वाली साइकिल से ही धक्का दे दे चलाने लगा। 

अभी अपने बेटे के उदास चेहरे को देखकर माँ कुछ सोच ही रही थी कि बगल में मामी और दीदी मेरे बगल के मकान से आ रही थी तो मामी ने विशु के माँ से कहा बेचारे का पैर दर्द करने लगता होगा इसको दूसरी साइकिल दिला देती। विशु की माँ ने बुझे मन से कहा हां दो चार दिन में दिला दुंगी। 

               विशु के पापा की छोटी सी दवा की कम्पनी है। 

                   अब इधर दिवाली का खर्चा, बड़े बेटे का जाड़े के स्कूल का कपड़ा, स्कूल के पार्टिसिपेट की फीस आदि अनेकों खर्चे थे जिसके कारण वह माँ अपने पति से संकोच बस खुलकर कुछ कह नहीं पा रही थी। फिर भी माँ की अनतर्रातमा पता नहीं क्यों बेचैन हो गया और एक विवश माँ से रहा नहीं गया और अपने पति को फोन लगा दिया। और जिस बात से पत्नी डर कर कह नहीं पा रही थी वही हुआ और पति ने कहा तुम हर चीज के लिए भावुकता में आ जाती हो अगले हफ्ते दिला दुंगा। लेकिन मेरा भावुक मन एक दिन भी इन्तजार कर सका क्योंकि अगले दिन बृहस्पति वार था शायद शनि वार और बृहस्पति वार को लोहा नहीं खरीदा जाता है। विशु की माँ आज भी नहीं जानती कि भावुकता का मतलब सही है या गलत पर उसकी माँ वाकई में भावनाओं में बह जाती है ये तो वो भी अच्छी तरह जानती थी। 

          अब विशु की माँ का मन विशु के मुंह से निकली बोली की विशु साइकिल लेने जाएगा + मामी की बात +उससको उसकी साइकिल को चलाना आदि बातों ने एक माँ को भावना में बहकने पर मजबूर कर दिया और उसकी माँ ने ठान ली की साइकिल दिलाऊंगी। फिर माँ ने अपने बड़े बेटे से कहा चलो बेटा अपना पिटारी खोलती हूँ देखूं कितना रुपये हैं। अब बड़ा बेटा बोला मेरा मेला देखने के लिए जो पैसा मिला था वो पैसा विशु के साइकिल में लगा दो। और बड़े बेटे को बाक्स लेना था तो माँ बोली तुम्हारा बाक्स तो बड़ा बेटा बोला बाद में ले लेंगे। और उसे याद नहीं था कि उसका पैसा तो मूवी देखने में खत्म हो गया था। जब माँ ने याद दिलाया तो बोला आह! काश! मूवी न देखा होता तो मैं वो पैसा विशु के साइकिल खरीदने के लिए दे पाता। 

             उन दोनों का आपस में प्यार देख माँ अपनी देवी माँ से प्रार्थना की कि हे माँ बचपन का यही प्यार बड़े होने पर भी कायम रहे जो दुनिया में मिशाल बन सामने आये। एक माँ का सपना ये सपना देवी माँ जरूर पूरा करेगी ऐसा एक माँ का अपनी देवी माँ पर विश्वास था आगे देवी माँ की जो मर्जी। 

फिर अन्ततःकुछ पैसा माँ का और कुछ पैसा विशु के पापा का मिलाकर उसी दिन माँ ने साइकिल खरीद दिया। उस माँ को आज बहुत ही खुशी हुई कि विशु अनजाने में भी जो बोला उस लाचार माँ ने पूरा किया। या यूं कहें कि माँ की इच्छा उसकी देवी की सहायता और आशीर्वाद से अपने बच्चे को को साइकिल दिला दी। 

उसकी माँ ने अपनी देवी माँ से कहा हे माँ मेरी विनती है आपसे यदि मैं जिंदा हूँ तो तुम्हारा हाथ सदा सिर पर है जो कभी भी इस माँ का काम न रुकने दिया न कमी खलने दी। यदि मैं न भी रहूँ इस दुनिया में तो मेरे बच्चों और मेरे पति पर हमेंशा अपना हाथ उनके सर पर रखना। और उन पर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखना। उस विशु की माँ लिखने बैठी थी साइकिल दिलाने का डेट और इतना कुछ लिख बैठी। 

अन्त में ये माँ अपने बच्चों और पति से यह कहना चाह रही थी कि इस कलिकाल में भी सच्ची आस्था हो तो चाहे वह माँ हो या देवी माँ जरूर पूरा करती है। और देवी माँ सच्ची आस्था के लिए पूर्ण रूप से विश्वास होना जरूरी है। इस विश्वास की बड़ी कठिन परीक्षा होती है। जो इस विश्वास को बनाए रखता है वही देवी माँ का कृपा पात्र बनता है। 

उस माँ को यह नहीं पता कि उसके बच्चे कैसे होंगे लेकिन ये जरूर पता था कि उसके पति का विश्वास बहुत जल्दी डगमगाने लगता है। पर ये माँ हमेशा यही सोचती है कि उसकी देवी माँ  जो भी करेगी भले के लिए ही करेगी क्योंकि वह अन्तर्यामी है इस विश्वास के साथ हर सुख दुःख सह लेती है कि इसमें भी भलाई होगा। और अन्ततःउस माँ को देवी माँ विश्वास का फल अच्छा ही मिलता है। 

                 विशु की माँ को डायरी लिखना बहुत ही अच्छा लगता था। अब माँ को लिखते लिखते रात के 12बजकर 30 मिनट हो गए थे इसलिए इस माँ ने लेखनी को विश्राम दे दिया और कहानी खत्म कर देवी माँ का स्मरण कर सोने चली गई।

                       रजनी सिंह 

                   28.6.17

                     8बजकर 30मिनट

 

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