घर अकेला हो गया 

आज मैं मुनव्वर राना की शायरी शेयर करती हूं जो शायद पढकर अच्छा लगे। 

           शायरी से मुहब्बत करने वाले हर आदमी के नाम। 

ऐसा लगता है कि जैसे खत्म मेला हो गया, 

उड़ गई आंगन से चिड़िया घर अकेला हो गया। 

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जब भी कश्ती मेंरी सैलाब में आ जाती है, 

माँ दुआं करते हुए ख्वाब में आ जाती है। 

रोज मैं लहू से उसे खत लिखता हूँ, 

रोज उंगली मेरी तेजाब में आ जाती है। 

दिल की गलियों से तेरी याद निकलती ही नहीं, 

सोहनी फिर इस पंजाब में आ जाती है। 

रात भर जागने का शिला है शायद, 

तेरी तस्वीर- सी महताब में आ जाती है। 

एक कमरे में बसर करता है सारा कुनबा, 

सारी दुनिया दिल-ए – बेताब में आ जाती है। 

जिंदगी तू भी भिखारिन की रिदा ओढ़े हुए, 

कूचा – ए रेशम ओ कमख्वाब में  इ जाती है। 

दुःख किसी का हो छलक उठती हैं मेरी आँखें। 

सारी मिट्टी मेरे तलाब में आ जाती है। 



27 विचार “घर अकेला हो गया &rdquo पर;

        1. अब समझ आया देवी माँ ने आप को गुरु क्यों बनाया। मुझे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है पर साधन और उस समय आर्थिक समस्याओं के कारण पढ़ने की इच्छा पूरी नहीं हो पाई थी अब आप का साथ मिलेगा तो ये शौक भी पूरा हो जाएगा।

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        2. कुछ एक को छोड़कर या हो सकता है मुझे याद नहो किताब में सब लिखा है। जो आपने लिंक भेजा समय मिलने पर रिलेटेड पोस्ट भी पढूंगी। एक बार फिर से धन्यवाद अभय जी।

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        3. वाह अभय जी आपने तो पढ़ने के लिए मुझे इतने राइटर के लिंक दे दी। मैं बहुत ही खूश हूँ कि इसकी अभिव्यक्ति न शब्दों से कर सकती हूं न करना चाहती हूँ
          ये वही बात हो जाएगी सूरज को दीया दिखाने जैसा।

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            1. अभय जी मैं अभय नहीं कह सकती मेरी माँ ने सिखाया है जैसे दाल में घी और ब़ेड में मखन लगाने से स्वाद बढ़ जाता है वैसे ही नाम के साथ जी लगाने से नाम की गरिमा बढ़ जाती है।

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