~ सदाबहार (24.4.17)

सदाबहार वृक्ष सा कुछ जीवन अपना बन जाता। 
कभी इस जीवन में पतझड़ का मौसम ना आता। 

चाहे धूप मिले या छांव मिले वर्षा सा प्यार फुहार मिले। 

सुख दुःख की चाह नहीं होता, आंसू और गम भी ना होता। 

मान मिले अपमान मिले इसका परवाह नहीं होता। 

सदाबहार वृक्ष सा कुछ जीवन अपना बन जाता। 

चाहे कुछ भी हो जाए बस प्यार ही प्यार हम बांटे।

नफरत करने वाले की परवाह नहीं होता। 

चेहरे से खुशियां ही झलके उदासी की जगह नहीं होता। 

सदाबहार वृक्ष सा कुछ जीवन अपना बन जाता। 

फल फूल भले ना दें पांए तरु के शीतल छांव में   सदा विश्राम मिले थकान की जगह नहीं होता। 

सदाबहार वृक्ष सा कुछ जीवन अपना बन जाता। 

                            रजनी सिंह 

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