वसंती हवा 

 वसंती हवा हूँ 

वही, 

हां वही जो 

धरा का वसंती सुसंगीत मीठा 

गुंजाती फिरी हूँ, 

वही, 

हां वही जो 

सभी प्राणियों को 

पिला प्रेम – आसव जिलाए हुए हूं, 

कसम रूप की है 

कसम प्रेम की है 

कसम इस हृदय की 

सुनो बात मेरी, 

बड़ी बावली हूँ 

अनोखी हवा हूँ 

बड़ी मस्तमौला, नहीं कुछ फिकर है 

 बड़ी ही निडर हूँ 

जिधर ही चाहती हूं 

उधर घूमती हूं 

मुसाफिर अजब हूं 

न घर – बार मेरा 

न उद्देश्य मेरा  

न इच्छा किसी की 

न आशा किसी की 

न प्रेमी 

न दुश्मन 

जिधर चाहती हूं उधर घूमती हूं 

हवा हूं, 

हवा में वसंती हवा हूँ 

जहां से चली मैं 

जहां को गयी मैं 

शहर, गांव, बस्ती 

नदी, रेत, निर्जन  

हरे खेत, पोखर 

झुलाती चली मैं, 

झुमाती चली मैं, 

हंसी जोर से मैं 

हंसी सब दिशाएं

हंसे लहलहाते 

हरे खेत सारे 

हंसी चमचमाती 

भरी धूप प्यारी 

वंसती हवा में 

हंसी सृष्टि सारी 

हवा हूं,  

हवा में 

वसंती हवा हूं। 

केदारनाथ अग्रवाल जी की कविता से यह बात तय होता है कि ज्ञानी का आचरण परम मुक्त है। वह हवा की तरह ही मुक्त है। स्वच्छंद है हवा की भांति ज्ञानी। वसंत की स्वच्छंद हवा की भांति। उसपर न कोई रीति है, न कोई नियम,  न कोई अनुशासन। 

16 विचार “      वसंती हवा &rdquo पर;

    1. अरे अजय जी ये मेरी रचना नहीं है मैं अनुमान नहीं अनुभव ओशो की किताब पढ़ रही थी उसमें था। कभी जो अच्छा लगता है तो लिख देती हूँ ताकि दूसरे भी पढ़ सके। ध्यान दीजिएगा मेरी कृति में मेरा नाम और जिस दिन लिखती हूँ उस दिन का डेट होता है। मुझे ज्यादा कुछ पता नहीं है क्या ब्लॉग पर अपना लिखा ही लिखते हैं क्या? यदि ऐसा कोई पाबंदी हो तो बताइएगा आगे से नहीं लिखूंगी और जो लिख चुकी हूं उसको डिलीट कर दूँ। मैं पहले डायरी मेंटेन करती थी और अब जो अच्छा कुछ लगता है तो ज्ञान के लिए ब्लॉग पर लिख देती हूँ। बेहिचक बताइएगा दीदी को सलाह मांग रही हूं जो केवल अपनो से मांगी जाती है।

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