~ माँ (15.1.12)

ये एक भक्त  की लड़ाई है जिसके पास जन्म देने वाली माँ नहीं है वो केवल देवी माँ को ही अपना मां मानता है। और दूसरा पक्ष केवल स्वार्थ बस माँ को जिसने जन्म दिया है उसको मानता है। मैं तो दोनों को ही निःस्वार्थ मन से महान मानती हूँ। आपक किसको महान मानते हो? पढकर जरूर बताइएगा। 

माँं, माँ शब्द हमको भी प्यारा है।  
मां शब्द मेरी भी पूजा है, माँ शब्द तुम्हारी भी पूजा है तो तकरार किस बात की प्यारे। 

तकरार इस बात की प्यारे, कि तुम्हारी माँ जन्म देने वाली है। 

और हमारी माँ जगत जननी है। 

तुम्हारी माँ तुमको माने है, हमारी माँ सारे जगत को माने है। 

तुम्हारी माँ तुमको इस लिए प्यारी की वो तुमको बस माने। 

हमारी माँ हमको इसलिए प्यारी, क्योंकि वो सारे जगत को माने। 

और जब वो सारे जगत को माने, तो वो तुमको भी माने। 

क्यों कि जगत में तुम भी आते हो प्यारे। 

अरे तुम्हें ही महान बना देती हूँ। 

अब तुम ही बता दो की हमारी माँ महान है जगत को मानने वाली। 

या तुम्हारी माँ महान हुई जो केवल जन्म देने वाली को माने है। 

तकरार तकरार है तो इन्कार क्यों करते हो? 

जब तुम्हारी माँ केवल तुम्हारी माँ है। 

तो महान बनाकर भूल से ही सही जगत जननी क्यों बनाते हो। 

जब महान बनाओगे तो तुम्हारी माँ जगत जननी बन जाएगी। 

और जब जगत जननी बन जाएगी तो वो मेरी माँ बन जाएगी। 

और जब वो मेरी माँ बन जाएगी तो तुम्हारी माँ तुम से छिन जाएगी। 

जो तुम्हारे लिए दुःख का कारण होगा। 

तुमने तो हर रिस्ता छोड़ा है अब माँ को छोड़ोगे क्या? 

अब इतना तो बता दो अब किससे जुड़ोगे माँ को छोड़कर? 

                    रजनी सिंह 

15 विचार “~ माँ (15.1.12)&rdquo पर;

  1. वाह माँ-सी, आपकी बात पर एक बात कहूँगी,

    माँ के रूप अनेक, मुझे तो पापा में भी माँ की झलक दिखती है,
    माँ वो है जो पत्थर को भी अपनी ममता से कोमल बना देती है,
    हाँ जग जननी भी मेरी माँ हैं, जिसने जन्म दिया वह भी माँ है,
    जिसने जीना सिखाया, हर वह इन्सान में मुझे माँ दिखती हैं |

    जीना सिखाने से मतलब है कि वह चाहे आप हो माँ-सी या मेरी अध्यापिका, मेरे बहन-भाई और दोस्त, हर इन्सान नें ममता होती है, माँ का अंश होता है | बाकी मुझे जिन्दगी की इतनी समझ नहीं, कहीं गलत हूं तो टोक दीजीएगा |😊

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    1. तुमने सही कहा माँ तो माँ है यदि अपने पराए का भेद छोड़ सबका भला चाहती है तो वही माँ जन्म देने वाली ही जगत जननी बन जाती है और यदि केवल जन्म देने के नाम पर अपने बच्चे के खुशी के लिए दूसरे के बच्चों के खुशी का गला घोंट देती है वह तो माँ होकर भी मां नहीं होती।

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  2. आपने तो असमंजस में डाल दिया…….माँ को तजु या तज़ु सत्य को दोनों ही हमारे प्रिये है सुनो,……..माँ को तजु तो सत्य हमारी जायेगी…..सत्य को ना तजूँ तो माँ हमारी जायेगी…..माँ को तजु या तज़ु सत्य को दोनों ही हमारे प्रिये है सुनो,अब आपही बताओ मैं क्या करूँ, कुछ बता दो जतन.. कुछ बता दो जतन।

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