वेदना 

ये कविता मैने कही पढ़ा है और भूल न जाऊँ इस लिए लिख रही हूँ। शायद आप लोगों को पढ़कर अच्छा लगेगा-

गीत गाने दो मुझे तो, वेदना को रोकने को। 

चोट खाकर राह चलते होश के भी होश छूटे। 

हाथ जो पाथेय थे, ठग-ठाकुरो ने रात लूटे। 

कण्ठ रुकता जा रहा है, आ रहा है काल देखो। 

भर गया है जहर से, संसार जैसे हार खाकर।  

देखते हैं लोग लोगों को सही परिचय न पाकर। 

बुझ गई है लौ पृथा की, चल उठो फिर सींचने को। 

9 विचार “               वेदना &rdquo पर;

      1. दी कल मैंने वादा किया था कि आपकी कविता को अवश्य पढ़ुगा उसे ही खोज रहा था तभी ये पोस्ट मिली। इक भाई दी को किया वादा कैसे भूल जाता पर दी आपके सुझाये कविता को खोज नहीं पाया ।

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        1. जिंदगी की यादें पुराने गीत, गानों, तस्वीरों और कविताओं के साथ कहानी अपने जमाने की भाग 12 में भी लिखा है आपने लाइक तो किया है। शायद ध्यान नहीं दिया है आपने।

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