~ जिंदगी में माँकोश्रद्धांजलि

जाने से  पहले कुछ तो  कही होती, 

साथ न सही बातें तो साथ होती।  

शिकायत  भी नहीं कर  सकती, 

कुछ खामियां  मुझमें ही थी। 

खामियों  को  सोचकर दिल परेशान है होता । 

जाने  से पहले कुछ तो सोचा होता, 

शायद सोचा  होता, तो जाने का अवसर  नहीं आया होता। 

ये अवसर  तो आना ही था, रजनी  के लिए अंधेरा बनकर। 

अफशोश “जिदंगी” में “रात” कमी बनकर खलती रही, 

खली है, खलेगी  , और खलती रहेगी। 

जिस प्यार को अपना कहने के खातिर, भुलाया, ठुकराया, गंवाया है प्यार। 
अब न प्यार ही रहा न तू ही रही। 

जननी बनकर जब तू ही न समझ सकी रात  को। 

“रात  “होकर भी अंधेरे में दिल के दीए को जला रौशनी है किया। 
ताकी सब सुखी के साथ निद्रा में ही आराम का एहसास करे। 

वर्ना ये आराम शब्द का एहसास किसने किया होता। 

                               मां की

                                               रजनी 

12 विचार “~ जिंदगी में माँकोश्रद्धांजलि&rdquo पर;

    1. ये सन 97की लिखा है और पहली कविता भी माँ के स्वर्गवास के बाद ही लेखनी चलाना सीखा है और देवी सरस्वती का वरदान मिला और जीने का सहारा भी मिला गौरव जी। धन्यवाद।

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